Bhartiya Parmapara

पहली तूलिका, पहली कहानी: भारत के प्रागैतिहासि...

भारत की शैल चित्रकला अपने आप में अनूठी है। यह प्रागैतिहासिक काल से ही मानवीय मनो भावों को प्रकट करने का माध्यम रही है। मध्य प्रदेश के भीमबेटका शैलाश्रयों से लेकर महाराष्ट्र, उत्तराखंड और तेलंगाना तक, यह शैल चित्रकला हमें हजाारों वर्ष पुरानी मानव सभ्यता की कहानियाँ सुन...

भक्ति का सच्चा अर्थ: मंदिरों से आगे, मानवता क...

मंदिर की घंटियों की मधुर गूंज जब किसी नगर की सुबह का आलोक बन जाती है तो लगता है जैसे मनुष्य ने अपनी आत्मा को ईश्वर से जोड़कर जीवन की पहली सांस ली हो। किन्तु, यही नगर जब सामूहिक प्रार्थना की गूंज से भर जाता है और उसी गूंज के बीच किसी भूखे बच्चे का रुदन, किसी मजदूर की ह...

नारी: परिवार की कुशल प्रबंधक — भारतीय संस्कृत...

भारतीय संस्कृति में नारी को ‘शक्ति’ कहा गया है। वह सृजन की स्रोत, प्रेम की प्रतीक और संतुलन की संवाहिका है। यदि कहा जाए कि परिवार नामक संस्था की धुरी नारी ही है, तो यह कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। नारी न केवल जीवन को जन्म देती है, बल्कि उसे दिशा, अनुशासन और स...

तुलसीदास की दृष्टि में नारी शक्ति, प्रकृति, अ...

नारी शक्ति, प्रकृति, अग्नि और समय: तुलसीदास की दार्शनिक दृष्टि में 
तुलसीदास द्वारा रचित रामचरितमानस सरल अवधी भाषा में काव्य रूप में लिखा गया एक अद्भुत ग्रंथ है, जो न केवल श्रीराम के चरित्र, आदर्शों और मर्यादा का अमृतमय वर्णन करता है, बल्कि भारतीय संस्कृति, धर...

रामायण महाभारत के युद्ध बनाम आधुनिक युद्ध

भारत की प्राचीन युद्ध परंपरा रामायण और महाभारत जैसे महाकाव्यों में परिलक्षित होती है, जहाँ युद्ध को धर्म और नीति का साधन माना गया है। इसके विपरीत, 20वीं एवं 21वीं सदी के युद्ध मुख्यतः राजनीतिक सत्ता, भू-सामरिक प्रभुत्व एवं आर्थिक संसाधनों के नियंत्रण हेतु लड़े गए हैं&...

सामाजिक संकट एवं सांस्कृतिक अवसाद की ओर बढ़ते...

समाज का सबसे गहरा संकट तब जन्म लेता है, जब उसकी सबसे मूल इकाई - परिवार अपने ध्येय और दायित्व को विस्मृत करने लगती है। आज यह स्थिति हमें समाज में दृष्टिगोचर हो रही है। भारतीय जीवन-दृष्टि में परिवार केवल एक सामाजिक संरचना मात्र नहीं है, वरन् वह एक जीवंत, स्पन्दनशील और आ...

सच कहने का साहस है.. सलीका है कविता

कविता, पद्य की सबसे खूबसूरत विधा है और दिल तक पहुँचने की सबसे अच्छी अभिव्यक्ति भी। कविता तुकांत और अतुकांत दो तरह से लिखी जा सकती है। बातचीत की खूबसूरत अभिव्यक्ति ही कविता है। नारी का श्रृंगार, प्रकृति का सौंदर्य, प्रेम की अनुभूति, फूल का खिलना और महकना, बच्चे का खिलख...

पहलगाम हमला: जब इंसानियत को धर्म से तोला गया

पहलगाम की गोलियाँ: धर्म पर नहीं, मानवता पर चली थीं 
कश्मीर के पहलगाम में हाल ही में हुआ आतंकी हमला सिर्फ एक गोलीबारी नहीं थी—यह एक ऐसा खौफनाक संदेश था जिसमें गोलियों ने धर्म की पहचान पूछकर चलना शुरू किया। प्रत्यक्षदर्शियों की मानें तो आतंकियों ने पहले पर...

श्रम बिकता है, बोलो... खरीदोगे?

श्रम बिकता है, बोलो ..... खरीदोगे..? (ऐसा बाजार जहां रोज लगता है मेहनतकशों का मेला) 
भारत में जिस गति से जनसंख्या बढ़ रही है उतनी ही गति से बेरोजगारी भी बढ़ी है। हालात ऐसे बदतर हैं कि डिग्रीधारी युवकों को चपरासी तक की नौकरी भी नसीब नहीं हो पा रहीं है तथा भारत...

पर्यावरण संकट बढ़ रहा है—अब बदलाव हमारी ज़िम्...

मैंने अपने पिछले आलेख में बता दिया था कि अगर धरा न होती तो हमारा अस्तित्व ही नहीं होता। अब जब इस पर गहनता से विचारें तो सबसे पहले  यह मानना ही पड़ेगा कि जीवन के लिये आवश्यक ऑक्सीजन, पानी व अन्य सभी सामग्रियां यहां सहजता से उपलब्ध है अर्थात इस धरा पर सभी आधारभूत स...

अहंकार का अंधकार | व्यक्तित्व और समाज पर प्रभ...

अहंकार एक ऐसी मानसिक प्रवृत्ति है, जो व्यक्ति को अपनी श्रेष्ठता का अनुभव कराती है और दूसरों से खुद को ऊँचा दिखाने के लिए उसे हर कदम पर प्रेरित करती है। यह ऐसा भाव है, जो किसी भी व्यक्ति को अपनी कमजोरी को छिपाने और अपनी छवि को बनाए रखने के लिए किसी भी हद तक जा सकता है।...

अन्न का दुरुपयोग – दिखावे की संस्कृति में बर्...

अन्न शरीर की मुख्य आवश्यकता है। इससे शरीर पुष्ट होता है और शरीर को ऊर्जा मिलती है। अन्न की प्रकृति का भी अपना प्रभाव है। कहावत है- 'जैसा खाओ-अन्न वैसा बने मन'। पेट भरने के लिए ही संसार चल रहा है। किसी को जरूरत लायक पूर्ति चाहिए तो कोई संग्रहण में जुटा हुआ है। बावजूद इ...

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