Bhartiya Parmapara

क्या वास्तव में “बी प्रैक्टिकल” होना ज़रूरी है?

जीवन के ढंग 

जब मन घोर निरीहता से जूझ रहा होता हो, उन क्षणों में भी परमात्मा की सुधि लिए बिना हृदय को जरा सा भी चैन न आए यह प्रेम नहीं तो और क्या ही होगा?  
आज मैं न कोई स्वास्थ्य चर्चा पर बात करूंगा न किसी सामाजिकता पर आज मैं हृदयवादी होना चाहता हूं अपने मर्म की बात कहना चाहता हूं, अपने ईश का गुणगान करना चाहता हूं।

हां निस्संदेह मैं यह स्वीकार करता हूं कि मैं बुद्ध नहीं बन सकता, पर मीरा बनने से किसने रोका है। इस यथार्थ वादी दौर में जब पुरुषों को उनके प्राकृतिक भाव से वंचित कर देने की होड़ मची हुई है उस क्षण में भी जो पुरुष रोना जानता है वही असली मानवीयता को जीवित रखे हुए है। इस दौर में जब लोग बी प्रैक्टिकल बी प्रैक्टिकल के नारे लगाते है और कहते रहते है कि प्रैक्टिकल बनो तो निश्चित ही वे चाहते हैं कि भावहीन बनो, और इसके पीछे कुछ विशेष सार्थक उद्देश्य भी नजर नहीं आता है, बस उपभोक्तावादी संस्कृति के दौर में नए नए क्रेज को अपनाते हुए युवा इसे बड़ी उपलब्धि की तरह समझते हैं। पर मैं यह नहीं कहूंगा कि "बी प्रैक्टिकल"।

तुम बेशक यह नारे लगाओ मगर ध्यान रहे कि बी प्रैक्टिकल कहते कहते ऐसा न हो कि तुम्हारे अंतस का अस्तित्व ही समाप्त हो जाए। एक जीवित मनुष्य के भीतर निहित भाव ही उसका शृंगार होता है। विडंबना यह है कि कठोर होने के तर्क वही देते हैं जिसने सहजता के गुण को ठीक से जाना नहीं, और हम उन्हीं के बहकावे में आकर अपने जीवन में जहां फूल खिलने चाहिए वहां कांटो को आश्रय देने लगते है। हमें इस भ्रम में डाल दिया जाता है कि भावहीन होना मजबूती व बहादुरी का प्रतीक है। मगर दुखद है कि मनुष्यता उसी भ्रम में फंसती जा रही है।

यह ध्यान रहना चाहिए किउस क्षण तुम खुद को किसी निहायती क्रूर व्यापारी की तरह पाओगे, क्योंकि मर्म का सौदा दुनिया का सबसे अप्रत्याशित कृत्य है। और कठोर बनने के होड़ में  यह इतनी जल्दी हो जाएगा कि हमें पता ही नहीं चलेगा, कि हम  कब अपने भीतर के प्रेम करुणा, और आध्यात्मिकता के कुंए को भौतिकता और कठोरता की मिट्टी डालकर पाट चुके होंगे। 
हम मनुष्यों को समझना चाहिए कि एक मूक पौधे भी हमारे भाव को समझते हैं, उनमें भी गुण होता है करुणा और क्रोध का बोध करने का। सत्य ही है न कि प्रेम से मारा गया थप्पड़ भी कोई स्नेहयुक्त स्पर्श लगता है जबकि क्रोध और घृणा से किया गया स्पर्श भी किसी थप्पड़ से कम नहीं होता। एक भावहीन मनुष्य ठीक किसी कब्र की भांति ही होता है, जिस पर न तो प्रेम के फूल चढ़ाए जा सकते हैं, और न ही अपनेपन का दीप जलाया जा सकता है।

अंततः मैं यही कहना चाहता हूं कि सुखद जीवन जीने के लिए बी प्रैक्टिकल जैसी भ्रामक परिस्थिति लाने की बिल्कुल आवश्यकता नहीं है, जहां हम भावशून्य हो जाएं। चूंकि हमारा शरीर तो पहले से ही भौतिक है, सारे विचार और क्रियाएं लगभग भौतिकता को ही केंद्र में लेकर घटित होती हैं। तो यह प्रैक्टिकल जीवन जीने के लिए अलग से हाथ पांव मारने की आवश्यकता थोड़ी है। यह तो स्वतः ही घटित होगा किसी व्यवहार की भांति, अंतस की ऊर्जा से।

                                    

                                      

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