Bhartiya Parmapara

प्रदूषण और निजी वाहनों का बढ़ता प्रभाव

प्रदुषण या पर्यावरण - चुनाव करे 

 

वर्तमान समय में हम सभी को ज्ञात है कि प्रदूषण हमारे पर्यावरण और स्वास्थ्य के लिए एक चुनौती बन गया है परंतु जाने अनजाने हम यह भूल जाते हैं कि यह चुनौती हमारे समक्ष है इसलिए हम इससे उबरने की लिए पुरजोर प्रयास नहीं कर रहे हैं। किसी भी चुनौती का सामना हम सफलता पूर्वक तब ही कर पाएंगे जब हम उसके कारण का गहन चिंतन करेंगे। बढ़ते प्रदूषण का एक मुख्य कारण है निजी वाहनों का अत्यधिक प्रयोग। छोटी दूरी जिसे चलकर या सार्वजनिक वाहन से तय किया जा सकता है वहां भी हम निजी वाहन का प्रयोग कर रहे हैं। शहरों में वाहनों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में हर साल लाखों नई गाड़ियां सड़कों पर आती है परंतु 60% से अधिक गाड़ियां छोटी दूरी के लिए प्रयोग की जाती है। आज के युग में मनुष्य अपनी सुविधा को सर्वोपरि समझता है व सुविधा की आड़ में होने वाले नुकसानों को भूल बैठता है।


यह बढ़ता चलन केवल सुविधा का मामला नहीं है बल्कि प्रदूषण के बढ़ते स्तर का प्रमुख कारण बनता जा रहा है। वाहनों से निकलने वाली गैस वातावरण में घुलकर विष का कार्य करती है। यह दूषित वायु न केवल हमारे वातावरण के लिए हानिकारक है बल्कि उससे अत्यधिक हमारे स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक है। छोटी दूरी पर निजी वाहनों का प्रयोग हमारे ईंधन जैसे संसाधन में कमी का भी बड़ा कारण है। परंतु जैसा हम सभी जानते हैं हर समस्या का समाधान होता है उसी प्रकार इस गंभीर समस्या का बहुत सरल सा समाधान यह है कि हम छोटी दूरी को पैदल या सार्वजनिक वाहन से तय करें। अब समाधान में भी समस्या यह है कि कई दिग्गज जनों को यह लगता है कि सार्वजनिक वाहन में बैठने से उनकी प्रतिष्ठा धूमल हो जाएगी परंतु ऐसी सोच का कोई समाधान नहीं है यदि व्यक्ति की प्रतिष्ठा बड़ी गाड़ी में बैठने से ही है तो शायद नीदरलैंड के प्रधानमंत्री मार्क रूठे साइकिल से अपने ऑफिस नहीं जाते। हमें जरूरत है अपनी सोच बदलने की और सही चुनाव करने की। अपनी क्षण भर की सुविधा के लिए हम हमारे स्वास्थ्य, पर्यावरण व आने वाली पीढ़ी के साथ खिलवाड़ ना करें अपितु सही कदम उठाकर अपने वर्तमान व आने वाली पीढ़ी के भविष्य को उज्जवल बनाएं।

लेखिका - नेहा नजवानी जी, इंदौर   
 

                                     

                                       

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