अपराध नियंत्रण
अपराध नियंत्रण के संदर्भ में संस्कार की प्रासंगिकता
अपराध एक विश्वव्यापी समस्या है। अपराध समाज को हानि पहुंचाने के साथ ही राष्ट्रीय छवि को भी धूमिल करता है। सनातन संस्कृति में संस्कार को केंद्र में रख कर अपराधों को नियंत्रित करने का लक्ष्य दिखाई देता है। मानवीय दोषों का परिहार करने के लिए संस्कारों का प्रावधान किया गया। मनोवृत्तियों का शोधन करना, सद्गुणों का बीजारोपण कर मनुष्य जीवन का यथोचित निर्माण करना संस्कार पद्धति से ही संभव है। संस्कारों की कमी को आपराधिक घटनाओं में बढ़ोतरी का प्रमुख कारण मानना कोई अत्युक्ति नहीं। समाज के मानदंडों के विपरीत मार्ग -वैचारिक अथवा क्रियात्मक- पर चलना समाज को नकारात्मक रूप से प्रभावित करता है। समाज के मानकों एवं मूल्यों की अवमानना असामाजिक गतिविधियों का कारण है। संस्कार पद्धति द्वारा सामाजिक विकास की प्रक्रिया में सकारात्मकता लाकर अपराध को नियंत्रित किया जा सकता है।
विचलित करने वाले अपराधों का बढ़ना स्वस्थ समाज का लक्षण नहीं। ऐसे कृत्य सामाजिक/ राष्ट्रीय गति को भी बाधित करते हैं। शिक्षा की कमी, निर्धनता जनित समस्याएं, भ्रष्टाचार में लिप्तता, नशा वृत्ति के कारण दिशाहीनता, नशा के लिए धन की आवश्यकता, कठोर कानून के अभाव में बेखौफ होना, रोजगार की कमी होना, द्वेष- विद्वेष में वृद्धि आदि अपराध के मूल में अवस्थित हैं। संस्कारों की उपेक्षा के फलस्वरुप नैतिक स्तर का घटता हुआ ग्राफ इस दूषित वृत्ति को हवा दे रहा है।
ध्यातव्य है कि अपराधों का प्रभाव दूरगामी होता है। अपराध कालांतर में पश्चाताप का कारण बन सकता है, जीवनपर्यन्त मानसिक क्लेश दे सकता है। आपराधिक गतिविधियों के कारण सामाजिक, आर्थिक, वाणिज्यिक, रक्षण प्रणाली, कानून प्रणाली आदि में प्रयुक्त आर्थिक भार भी विकास को अवरूद्ध करता है। इस प्रकार अपराध सामाजिक गुणवत्ता को दुष्प्रभावित करते हैं। यह एक गंभीर प्रकरण है। सामाजिक व्यवस्था की दृष्टि से इसके नियंत्रण के उपायों पर मंथन आवश्यक बन जाता है। अस्तु, अपराध के कारणों पर विचार करने से संज्ञान में आता है कि व्यक्ति दोषपूर्ण मानसिकता के प्रभाव में सामाजिक नियमों का उल्लंघन करता हुआ अपराध की ओर प्रवृत्त होता है। भौतिक लालसाओं को पूरा के लिए संपन्न युवाओं में भी अपराध वृत्ति देखी जा सकती है। परिवार की आपराधिक पृष्ठभूमि/ गलत संगति का प्रभाव/ जुआ की लत/ नशीली दवाओं का सेवन/ परिश्रम के बिना धनागम की अभिलाषा जैसे अनेक कारण उन्हें अपराध की ओर मोड़ रहे हैं। समृद्ध जनों की भी भ्रष्टाचार में संलिप्तता कोई अचंभे की बात नहीं। शिक्षण संस्थानों में अध्ययनरत किशोर भी क्रोध/ आवेश/ अहंकार के कारण अपराधों को अंजाम देते हुए देखे जा सकते हैं। यही नहीं, असामाजिक तत्वों के प्रभाव/ परिवार के नकारात्मक वातावरण/ आर्थिक दशा में प्रतिकूलता के कारण बाल जगत में भी समाज विरोधी कार्यों की परिणति कोई अपवाद नहीं। बाल अपराधों का फलना- फूलना एक संवेदनशील प्रकरण है। अपराध की भयावह परिणति से अनजान कम आयु के बच्चों की भी अपराध में संलिप्तता स्तब्धकारी है।
साइबर जगत में अपराध के मूल में दुर्भावना ही प्रतीत होती है। महिला जगत में किए गए एसिड अटैक, यौन अपराध, अपहरण, लिव इन रिलेशनशिप में किए गए बलात्कार/ बर्बरता का कारण बेरोजगारी नहीं, अशिक्षा भी नहीं, कदाचित् संस्कारों की कमी ही है।
शिक्षा में संस्कारों को प्राथमिकता न दिया जाना भी अपराध के पनपने का कारण है। इसमें कोई संशय नहीं कि संस्कारों की उपेक्षा से समाज विरोधी विचारों को प्रश्रय मिलता है। वर्तमान में बच्चे- युवा हों अथवा वृद्ध, संस्कारों की क्षीणता दिखाई दे रही है। पारिवारिक द्वेष- विद्वेष, विवाद, हिंसा, बलात्कार, नशा आदि संस्कारहीनता के दुष्परिणाम हैं।
जीवन में समस्याओं का आना अस्वाभाविक नहीं। संस्कारों के सुप्रभाव में संस्कारी व्यक्ति का रुझान अपराधों की ओर बढ़ने की बजाय समस्याओं का निदान ढूंढने में होता है। विशिष्ट तथ्य तो यह है संस्कार व्यक्ति को भय के कारण नहीं, प्रत्युत् नैतिक आधार पर शासनिक नीतियों के प्रति सचेत करते हैं, सामाजिक नियमों में विश्वास जगाते है।
व्यक्ति के विचार, क्रियाकलाप संस्कारों के अनुरूप होते हैं। संस्कार मनोभावों को सकारात्मक रूप से परिवर्तित करने वाली प्रणाली है। संस्कार मनोवैज्ञानिक स्तर पर अपराधों के प्रति निरोधात्मक कार्यवाही करते हैं। सामाजिक नियमों के साथ सामंजस्य बिठाने में अनुकूलता लाते हैं। जीवन मूल्यों के प्रति सजग कर सही दिशा में संचालित करते हैं। संस्कारों का उद्देश्य चारित्रिक गुणों का विकास करना है। दुर्गुणों को निराकृत करना और सद्गुणों का समावेश करना है। संस्कार पद्धति नैतिकता, संवेदना, सद्भाव, सहयोग, उदारता आदि उच्च भावों का समावेश करती है। संस्कार सदाचरण की पद्धति है जिसके माध्यम से सामाजिक, सांस्कृतिक, आध्यात्मिक मूल्यों का विकास होता है।
अपराधी परिवार का ही एक सदस्य होता है। अतः अपराधों की रोकथाम में परिवार/ समाज की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता। परिवार संस्था का यह दायित्व है कि नई पीढ़ी को संस्कारित कर अपराध वृत्ति से दूरी बनाने के लिए सक्रिय हो। इस ओर परिजनों के रचनात्मक सहयोग/स्नेह और स्वीकृति में सकारात्मक परिवर्तन लाने की क्षमता होती है। परिवार द्वारा संस्कारित व्यक्ति के कदम गलत दिशा देखकर ठिठक जाते हैं। माता- पिता और शिक्षक के समवेत प्रयास व्यक्ति में उत्तम गुण सृजित कर संस्कारित करते हैं। किंतु यह एक सच्चाई है कि अपराध से जुड़े हुए माता- पिता अपनी संतान को इससे कदाचित् न तो दूर रख पाते हैं और न ही इसके दूरगामी दुष्प्रभावों से सावधान कर पाते हैं। वर्तमान में कठोर कानूनों के पश्चात भी अपराधों में भारी बढ़ोतरी हो रही है। उल्लेखनीय तथ्य है कि दंडात्मक प्रक्रिया अपराध को रोकने में सहायक तो है किंतु उस
के उन्मूलन में कदाचित् संस्कार भी कम प्रभावी नहीं होते। संस्कारों में व्यक्ति को सन्मार्गगामी बनाकर आपराधिक गतिविधियों से बचाने का सामर्थ्य होता हैं। सुधारात्मक विद्यालय, बाल गृहों, बाल क्लब, पालक गृह आदि में बाल अपराधियों की मनोवृति का संस्करण इस दिशा में आशान्वित कर सकता है। मनोचिकित्सा द्वारा उनकी धारणाओं में सकारात्मक परिवर्तन की संभावनाएं दिखाई देती हैं।
संस्कार व्यक्ति को श्रेष्ठ दिशा में प्रवृत्त और गलत दिशा से निवृत्त कर आपराधिक वृत्ति पर अंकुश लगाते हैं। यही नहीं, संस्कार आपराधिक मनःस्थिति का शोधन कर सृजनशीलता की ओर गतिशील करते हैं। आचार पक्ष को संयमित बनाने, व्यवहार को संतुलित रखने, दिग्भ्रम के मध्य दिशादर्शन में संस्कारों की महती भूमिका है। इनका व्यक्ति के ऊपर गहरा प्रभाव देखा जाता है। संस्कार व्यक्ति को नैतिकता के प्रति प्रतिबद्ध बनाते हैं। संस्कार बाह्य- आभ्यंतर परिष्करण द्वारा सामाजिक बदलाव की योग्यता रखते हैं, सामाजिक मूल्यों के प्रति गंभीर बनाते हैं, मानवमात्र के प्रति संवेदनशील बनाते हैं, स्वच्छंदता/उच्छंªखलता से विमुख करते हैं।
महिला- अपराध कम करने के लिए संस्कार सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाने का आग्रह करते हैं। संस्कार व्यक्ति में बल- बुद्धि- विवेक उत्पन्न कर अपराध की ओर मुड़ने नहीं देते।
संस्कार सद्गुणों की श्रृंखला है। यथा- स्वाध्याय बुरे साहित्य से दूरी बनाकर अपराध की ओर बढ़ने वाली प्रवृत्ति के कारणों को ही निर्मूल करता है। सौहार्द सामुदायिक सद्भावना को जगाता है। सामाजिक अपेक्षाओं के अनुकूल आचरण नियमों के उल्लंघन से बचाता है। संयत जीवन, संतोषी प्रवृत्ति, दायित्वों का अवबोध, मानवीय मूल्यों का विकास, सही गलत की पहचान, नारी के प्रति उचित व्यवहार, सब संस्कारों से आते हैं। गलत तथ्यों को नकारने तथा श्रेष्ठ दिशा की ओर बढ़ने का बल संस्कार ही देते हैं।
वस्तुतः संस्कार सांस्कृतिक देन हैं जो आतंकवाद, धोखाधड़ी, गबन जैसे अपराधों को कम कर सामाजिक व्यवस्था में सहायक बन सकते हैं। यद्यपि अपराध नियंत्रण के लिए कानून व्यवस्था है, दंड विधान है तथापि अपराध वृत्ति में कमी लाने के लिए संस्कार पद्धति आशान्वित करती है। ध्यातव्य है कि माता-पिता की असमर्थता की दशा में शिक्षक वर्ग का विशेष दायित्व बन जाता है।
लेखिका - प्रो कनक रानी जी, पूर्व अध्यक्ष संस्कृत विभाग, आर्य महिला स्नातकोत्तर महाविद्यालय, शाहजहांपुर (उ.प्र.)

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