Bhartiya Parmapara

खिचड़ी: ढाई हजार साल पुराना भारतीय व्यंजन, स्वाद, परंपरा और इतिहास के साथ


खिचड़ी पुराण - मकर संक्रांति के अवसर पर 

14 जनवरी मकर संक्रांति के दिवस हुए स्वागत से मैं अभी तक अभिभूत हूँ। "अतिथि देवो भव" की परम्परा का पालन करते हुए प्रत्येक घर में मेरे स्वागत की तैयारियाँ थी। उनका स्वागत देख कर ऐसा लगा जैसे मेरे आने की उन्हें लम्बे समय से प्रतीक्षा थी। सभी ने बड़े प्रेम से मेरा स्वागत किया और मेरे गुणगान करते हुए सेवन किया। अपने मित्रों से भी मेरी मुलाकात हुई, मटर बहन, चाचा टमाटर, तथा कोथ-वीर सिंह से, जब तक पके नहीं तब तक आपस में बैठकर अपना सुख दुख बाँटते रहें, मुझे लगा एक मित्र मेरा और मिल जाता मगर उसे लेट आने की आदत पड़ गई है, क्योंकि उसे महसूस होता है मेरे बिना काम नहीं चलेगा, जी हाँ मैं जीरे चन्द्र की बात कर रहा हूँ। जीरे चन्द्र आये, वही अकड़ वही शान वही शौकत, क्योंकि मेरा मित्र सदा उनके साथ रहता है। वह है घृतचन्द्र, उसकी सुगंध कि उसकी अकड़ का कारण है। आया हेलो हाय की और अपने स्थान पतीले में चला गया। मुझे ऐसा लगा जैसे हमारा संयुक्त परिवार टूटने के कगार पर है, लोग अब मेरे मित्रों से ज्यादा लगाव नहीं रखते। खैर कोई बात नहीं जब परिवार बढ़ता है तो यह समस्याएं आती ही है।

हमें याद आया कानपुर का गंगा किनारा जहाँ मिट्टी की हॉडी में कंडों की आग में धीरे-धीरे लोग पकाते हैं। धीरे-धीरे पकाने कारण मुझे ज्यादा कष्ट भी नहीं होता और मैं सेवन करने वाले को प्रसन्न कर देती हूँ तथा अपने दोस्तों से अच्छी तरह से घुलमिल जाती हूँ। हम लोग फिर अलग-अलग शरीर एकआत्मा वाली बात नहीं रहती हम सब एक आत्मा ही बन जाते।

मैं अपने को सौभाग्यशाली मानती थी, इस दिन महीनों से बंधन में रखी गई बिचारी बुलबुल मेरा सेवन कराकर स्वतंत्र छोड़ दी जाती है। सुनो भाइयों तथा बहनों मुझे पकाना भी एक कला है जो हर व्यक्ति नहीं जानता। मैं और मेरे दोस्त चावल को मिलाकर कुकर में डालकर सीटियां लगा दी। लो मैं हो गई तैयार। मगर जरा सोचो जिसकी संस्कृति घुलमिल जाने की है इतनी जल्दी कैसे घुलमिल सकती है। जब मैं लोगों के सामने सेवन के लिए जाती हूँ, ताने सहती हूँ। यह कोई खिचड़ी है दाल अलग पानी अलग चावल अलग सब अपने-अपने रास्ते पर जा रहे हैं। मगर ऐसे जल्द बाजो को मैं कैसे समझाऊं। लोगों ने कुछ ज्यादा सुनाया था मथानी ली और कुकर में चला दी लो घुट गई खिचड़ी। मैं वर्तमान समय की डिश तो हूं नहीं जिसे मास्टर शेफ ने बनाया हो , ईजाद किया हो। मेरा इतिहास सुनोगे तो चौंक जाओगे, मैं करीब ढाई हजार वर्ष से भारत में रहती हूँ। कई युग तथा दशक बीत गए, मैं अपना अस्तित्व बचा के रखे हूँ। मुझे सर्वप्रथम "संत गोरखनाथ जी" ने भूखे के भक्तों को खिलाने के लिए मुझे बनाया था। आज भी उस स्थान पर खिचड़ी का मेला लगता है। उन्हीं की कृपा से मैं धन्य हो गई।

देश में ही नहीं विदेश में रहने वाले लोग भी मेरे स्वाद का गुणगान करते हैं। ग्रीक राजदूत सेल्यूकस ने लिखा हिंदुस्तान में चावल और दाल का मेल बहुत पसन्द किया जाता है। सन 1950 में भारत आए मोरक्को के सैलानी इब्नबतूता मेरी तथा मेरी सहयोगी के स्वाद की प्रशंसा की थी। रूसी यात्री ने भी मेरे स्वाद का गुणगान किया था। मुगलकालीन समय में भी मेरे नाम और मेरे स्वाद की प्रसिद्धि थी। आप लोगों को जानकारी है ही सम्राट अकबर के नवरत्न थे। उनमें बीरबल उन्हें ज्यादा पसंद थे, कारण बीरबल मुझे बनाने के विशेषज्ञ थे और सम्राट अकबर को मैं बहुत पसंद थी, क्योंकि पाक-कला भी है एक कला जितना ज्यादा समय लगता है उतनी ज्यादा सुंदर होती। अकबर के पुत्र जहांगीर सम्राट भी मेरे स्वाद के कायल थे। अकबर के सलाहकार अब्दुल खान-खाना मुझे विभिन्न प्रकार से बनाते थे उन्होंने मुझे आईने अकबरी में मुझे स्वादिष्ट बनाने की विधि तथा सात प्रकार लिखे हैं।

अब तो आप सभी लोगों को मेरी विशेषताएं तथा मेरी महत्ता का ज्ञान हो गया होगा। मैं विशिष्ट तथा ऐतिहासिक व्यंजन मास्टर शेफ को मुझे अब व्यंजनों में शामिल करना पड़ेगा। मेरी ऐतिहासिकता का परिचय देने वाले लखनऊ नवाब का एक हिस्सा सुनाती हूँ। एक नवाब थे बिल्कुल सीकियाँ पहलवान उन्होंने एक बावर्ची रखा था जो 5 सेर घी में एक पाव मुझे बनाता था। ताकि नवाब असली पहलवान बन जाए। आपको एक गोपनीय बात और बताता हूं इस बावर्ची की तनख्वाह उस समय 1000 अशरफीयाँ थी। मेरी विशेषता है- “मैं सभी धर्मों का आदर करती हूं, धर्म के प्रति मेरी आस्था रहती है।“

मैं कितनी सौभाग्यशाली हूं भगवान जगन्नाथ का विशिष्ट प्रसाद मैं ही हूँ। मेरा स्वाद लेने से पहले जरा सावधान शनिवार को मेरा स्वाद मत लेना कहा जाता है, शनि महाराज नाराज हो जाते हैं। शेष दिनों में मेरी सखी सहेलियों के साथ आप मेरे स्वाद का आनंद ले। मेरी सखियां, अचार, पापड़, दही और घी मेरा इंतजार करती ही रहती हैं।

 

 

                                    

                                      

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