Bhartiya Parmapara

विश्व भू-अलंकरण दिवस: भारतीय संस्कृति और रंगो...

भारतीय संस्कृति में धरती को ‘माता’ कहा गया है—“माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः।” इस भावना का मूर्त रूप हमें ‘भू-अलंकरण’ की परंपरा में दिखाई देता है। घर के आँगन, मंदिर के द्वार, उत्सवों और पर्वों पर भूमि को रंगों, फूलों, चावल, आ...

किताबें: हमारी सबसे सच्ची और ईमानदार मित्र |...

23 अप्रैल, सन 1995 को पहली बार 'पुस्तक दिवस' मनाया गया , जबकि इसकी नींव तो 1923 में स्पेन में पुस्तक विक्रेताओं द्वारा प्रसिद्ध लेखक मीगुयेल डी सरवेन्टीस को सम्मानित करने हेतु आयोजन के समय ही रख दी गई थी। आप की जानकारी के लिये 23 अप्रैल वाला दिवस साहित्यिक क्षेत्र में...

बसंत ऋतु में होली – फागुन, प्रकृति और रंगों क...

बसंत ऋतु में प्रकृति नटी अपने संपूर्ण सौंदर्य के साथ इठलाने लगती है। संपूर्ण सृष्टि में सरलता व्याप्त हो जाती है एवं रचनात्मक प्रक्रियाएं प्रारंभ हो जाती हैं। ऋतुराज वसंत का स्वागत करने फागुन दौड़ा चला आता है। ऐसा लगता है बावरा हो बौंरा गया हो और मस्ती के आलम में इतरा...

संवाद संस्कृति और बाल मनोविज्ञान – बच्चों को...

हाल ही में दिल्ली के एक 16 वर्षीय किशोर द्वारा आत्महत्या की दुखद घटना समाज में संवादहीनता की बढ़ती समस्या की ओर गंभीर संकेत देती है। यदि शिक्षक, माता-पिता या परिवार के सदस्य बच्चों की बातों को धैर्यपूर्वक सुनें और संवाद का खुला वातावरण बनाएं, तो ऐसी अनेक घटनाओं को रोक...

प्राचीन भारतीय ज्ञान परम्परा एवं संस्कृत कथा...

एक वैदिक उक्ति है— “आ नो भद्राः क्रतवो यंतु विश्वतः”—अर्थात सभी दिशाओं से विचारों को आने दो। हर युग की अपनी ऐतिहासिक सीमा में तर्कसम्मत विचारों की खोज हुई है। उनका संबंध मानव-स्मृतियों के साथ-साथ नए-नए स्वप्नों से भी रहा है। भारतीय साहित्य में...

लोकतंत्र और भारतीय ज्ञान परंपरा | वैदिक जड़ें...

वैदिक संस्थाएँ: सभा और समिति 
वैदिक काल में सभा (वृद्धजनों की परिषद) और समिति (सामान्य जनसभा) जैसी संस्थाएँ सामूहिक निर्णय का माध्यम होती थीं। ये प्रारंभिक लोकतांत्रिक स्वरूप थे, जहाँ नीतिगत विमर्श होता था। इस प्रकार लोकतांत्रिक मूल्यों की जड़ें वैदिक काल में...

अध्यात्म और विज्ञान का समन्वय: आज की आवश्यकता...

भारत विज्ञान और अध्यात्म—दोनों क्षेत्रों में सदैव श्रेष्ठ रहा है और विश्व गुरु कहलाया है। आज वैज्ञानिक युग के बदलते संदर्भ में हमें अध्यात्म और विज्ञान की व्याख्या करते हुए दोनों के अंतःसूत्रों को पहचानना होगा और उन मूल्यों व परंपराओं को जन-जन तक पहुँचाना होगा,...

2026: समय की देहरी पर जागरण का वर्ष | चेतना,...

नए वर्ष का आगमन अक्सर केवल एक क्षणिक उत्सव की तरह दिखता है, पर वास्तव में वह समय के गहरे प्रवाह में वह बिंदु है जहाँ बीता हुआ वर्ष अपनी थकान छोड़कर विलीन हो जाता है और नया वर्ष अपने अनाम भविष्य के साथ हमारे सम्मुख उपस्थित होता है। 2026 की देहरी पर खड़े होकर यह प्रश्न...

वीर बाल दिवस 26 दिसंबर | साहिबजादा जोरावर सिं...

सिखों के दसवें गुरु गोविंद सिंह जी के 9 जनवरी 2022 के प्रकाश पर्व के अवसर पर हमारे देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनके दो छोटे साहिबजादों की लासानी शहादत को याद करने के लिए 26 दिसंबर को वीर बाल दिवस घोषित किया था और उसी के अनुरूप गृह मंत्रालय ने सरकारी गजट में अध...

भारतीय नववर्ष क्यों मनाया जाता है??

1 जनवरी से प्रतिवर्ष अँग्रेजी नववर्ष प्रारंभ हो जाता है। यह अंग्रेजों के द्वारा हमें दी गयी एक कुप्रथा है, जो हमारी मानसिक दासता का प्रतीक है। यह सत्य है कि विश्व ने इसे अपना लिया है और हम आज अपने अधिकांश कार्य इसी वर्ष के अनुसार करने के लिए बाध्य हैं, परंतु हमें यह न...

जीवन की बाँसुरी: कठिनाइयों को सरलता से जीतने...

हे गुरुवर! अब मुझे नहीं रहना है इस संसार में। बालक ने संत से रूठे स्वर में अपना विचार प्रगट किया। 
किन्तु बालक! बगीचे की देखभाल कौन करेगा और जिस लक्ष्य से तुम यहाँ आए हो उसे पूर्ण किए बिना कैसे जा सकते हो?  संत जी अपने मस्तक पर चिंता की लकीरें बनाते हुए ब...

उत्तर भारत में पराली जलाना: किसानों और पर्याव...

पराली जलाने की आग में झुलसता उत्तर भारत : समाधान किसानों और पर्यावरण दोनों के हित में 
हर वर्ष अक्टूबर–नवंबर के महीनों  में पंजाब और हरियाणा के खेतों से उठने वाला धुआँ दिल्ली सहित पूरे उत्तर भारत की साँसें रोक देता है। पराली जलाना क...

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