Bhartiya Parmapara
बच्चों को लौटा दो बचपन – आधुनिक पालन-पोषण पर एक प्रेरक विचार

बच्चों को लौटा दो बचपन – आधुनिक पालन-पोषण पर एक प्रेरक विचार

अधिकांश अभिभावकों ने आज बच्चों का बचपन अपनी अभिलाषाओं के तहत रौंद दिया है साथ ही इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का भी इसमें पूरा योगदान है। परिवर्तन संसार का नियम है किंतु परिवर्...

खुशियों के दीप – उम्मीद और संघर्ष की एक भावनात्मक दीपावली कहानी

खुशियों के दीप – उम्मीद और संघर्ष की एक भावनात्मक दीपावली कहानी

दीपावली जैसे जैसे करीब आ रही थी गेंदा का दिल बैठे जा रहा था, तीन वर्षों से अभावों के चलते वह अपने प्राणो से प्रिय बच्चों को मिठाई खिलाने में भी असमर्थ थी। चिं...

पितृपक्ष की एक भावनात्मक कथा | Pitru Paksha

पितृपक्ष की एक भावनात्मक कथा | Pitru Paksha

"राघव ! तुम तो माँ की तस्वीर को ऐसे निहार रहे जैसे सचमुच मां तुम्हें देख रही हो ..."

गीता, माँ भले ही मुझसे दूर है पर मैं उनका आशीर्वाद हर पल अपने साथ महसूस करता हू्ं, और न जाने क्यों पितृप...

दोस्त – एक प्रेरणादायक कहानी सच्ची दोस्ती और आत्मविश्वास की | भारतीय परंपरा

दोस्त – एक प्रेरणादायक कहानी सच्ची दोस्ती और आत्मविश्वास की | भारतीय परंपरा

पूरा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा, देखते ही देखते भूमि के अगल बगल में ऑटोग्राफ लेने वालों का ताता लग गया आज तो उसका यह पहला ही शो था, और पहले ही प्रोग...

परवरिश - माँ के आत्मचिंतन की कहानी

परवरिश - माँ के आत्मचिंतन की कहानी

मन आत्मग्लानि से लबरेज था धिक्कार है ऐसे मातृत्व पर, आज स्वयं पर ही क्रोध आ रहा था। आँखों से अविरल अश्रुधारा प्रवाहित हुए जा रही थी। मैं अवि को और वे मुझे सजल नैनों से...

सावन की सौगात

सावन की सौगात

"अरी ओ रत्ना, आसमान में बादल देखो कैसे बरसने को बेताब हो रहे है, अबकी तुम्हारे कानों के झुमके घड़वा दूंगा, तुम भी चलना सूनार के और अपनी पसंद से ही बनवा लेना। श...

अपेक्षा - एक लघुकथा

अपेक्षा - एक लघुकथा

गर्मी की छुट्टियां लगते ही अनु का मन बचपन के गलियारों में पहुंच जाता। मायके में कितनी निश्चिंतता रहती है यह सोचते हुए उसके मुख पर मुस्कान बिखेर गई और मॉं के ह...

दुआ - लघुकथा

दुआ - लघुकथा

चिलचिलाती धूप में जैसे ही सिंग्नल की लाल बत्ती जली मन ही मन‌ मैं बड़बड़ाई कभी गोद में लेटी परी को देखती तो कभी सिंग्नल को। कल रात से परी का बुखार कम हो ह...

एक चुटकी गुलाल - लघुकथा

एक चुटकी गुलाल - लघुकथा

मम्मा मम्मा क्या पापा होली पर हमारे साथ रंग खेलने भी नहीं आयेंगे भगवान जी को बोलिये ना मेरे पापा को चार दिन तो छुट्टी दे, ढाई साल की परी रंगोत्सव मनाने के लिए...

समर्पण

समर्पण

स्वधा आज स्वयं को परी लोक से उतरी किसी अप्सरा से कम नहीं आंक रही थी, आज कॉलेज में आकर्षण का केंद्र वहीं थी, और पता है दीदी श्रीधर ने आज उसे पूरे सौ गुलाब दिये और कितने...

ह्रदय परिवर्तन

ह्रदय परिवर्तन

नववर्ष के स्वागत में पूरा शहर रोशनी की जगमगाहट में चमचमाता नजर आ रहा था जैसे आसमां में सितारे जड़े होते है बिल्कुल उसी तरह सर्द की ठिठुरती गहन रात में यह रोशन...

खुशबू

खुशबू

प्रकृति के सौंदर्य की अद्भुत छटा बिखेरते ऊंचे-ऊंचे नील गगन से मिलने की चाहत रखते पर्वत, सूर्योदय के समय झील का स्वर्णिम किरणों में एकरूप हो सुनहरी चुनर में सं...

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