डॉ विक्रम साराभाई - भारतीय आंतरिक्ष कार्यक्रमों के जनक
ज्ञान, संस्कार और आदर्श की भूमि 'भारत', एक ऐसी पावन धरा, जहाँ जन्मे अनेकों महाविभूतियाँ आज विश्वभर के लिए प्रेरणा के स्तोत्र है। ऐसे ही एक दिग्गज हैं, डॉ. विक्रम साराभाई। प्रख्यात उद्योगपति अम्बालाल साराभाई के बेटे विक्रम अम्बालाल साराभाई (12 अगस्त 1919 – 30 दिसम्बर 1971) एक भौतिक व खगोल वैज्ञानिक के के अलावा एक अच्छे उद्योगपति थे। अपने जीवन में उन्होंने शुरुआती शिक्षा गुजरात कॉलेज अहमदाबाद से की परन्तु बाद में उच्च शिक्षा के लिए 1937 में कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय, इंग्लैंड गए। 1945 में कैंब्रिज से पी.एच.डी करने के पश्चात उन्होंने 1947 में "ट्रॉपिकल लैटिट्यूड्स में कॉस्मिक रे इन्वेस्टिगेशन" पर एक शोध प्रस्तुत किया जिसके चलते उन्हें विद्यावाचस्पति की उपाधि [पीएचडी] प्राप्त हुई। आप की जानकारी के लिये बता दें कि कैम्ब्रिज से लौटने के बाद उन्होंने 'इन्डियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस, बैंगलोर में नोबेल पुरस्कार विजेता सी वी रमन के देखरेख में अपना शोध पूरा किया और वहीं उनका परिचय महान परमाणु वैज्ञानिक होमी जहांगीर भाभा से हुआ। यहाँ यह जान लें कि ये जहांगीर भाभा ही थे जिन्होंने मशहूर नृत्यांगना मृणालिनी स्वामीनाथन से उनका परिचय कराया जो बाद में उनकी अर्द्धांगिनी बनीं।
विक्रम साराभाई ने सौर तथा अंतरग्रहीय भौतिकी में अनुसंधान के नए क्षेत्रों के सुअवसरों की कल्पना की थी। वर्ष 1957-1958 को अन्तर्राष्ट्रीय भू-भौतिकी वर्ष (आई जी डब्ल्यू) के रुप में देखा जाता है। साराभाई द्वारा अन्तर्राष्ट्रीय भू-भौतिकी वर्ष [आई जी डब्ल्यू] के लिए भारतीय कार्यक्रम एक अत्यन्त महत्वपूर्ण योगदान रहा। एक भौतिक विज्ञानी और खगोलशास्त्री होने के नाते उन्होंने अंतरिक्ष अनुसंधान की शुरुआत की और भारत में परमाणु ऊर्जा विकसित करने में मदद की। उन्हें भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम का जनक माना जाता है। एक महान संस्थान निर्माता होने के नाते, उन्होंने विविध क्षेत्रों में कई संस्थानों की स्थापना में मदद की। भौतिक जीवन में उन्होंने कई संस्थानों की स्थापना की, जिनमें विश्वविख्यात इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गनाइजेशन (इसरो) के अलावा कुछ सर्वाधिक जानी-मानी संस्थाओं के नाम इस प्रकार हैं-
1] भौतिकी अनुसंधान प्रयोगशाला (पीआरएल), अहमदाबाद
2] भारतीय प्रबंधन संस्थान (आईआईएम) अहमदाबाद
3] सामुदायिक विज्ञान केन्द्र; अहमदाबाद
4] दर्पण अकादमी फॉर परफार्मिंग आर्ट्स, अहमदाबाद
5] विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र, तिरुवनन्तपुरम
6] अंतरिक्ष अनुप्रयोग केंद्र, अहमदाबाद
7] फास्टर ब्रीडर टेस्ट रिएक्टर (एफबीटीआर) कलपक्कम
8] वैरीएबल एनर्जी साईक्लोट्रोन प्रोजक्ट, कोलकाता
9] भारतीय इलेक्ट्रानिक निगम लिमिटेड (ईसीआईएल) हैदराबाद
10]भारतीय यूरेनियम निगम लिमिटेड (यूसीआईएल)
भारत का अन्तरिक्ष कार्यक्रम 1962 में भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष अनुसंधान समिति (इन्कोस्पार) की स्थापना के साथ शुरू हुआ, जिसे बाद में 1969 में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के रूप में बदल दिया गया। इस कार्यक्रम में विक्रम साराभाई का बहुत महत्वपूर्ण योगदान है, इसी कारण से इन्हें "भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम का जनक" माना जाता है। यहाँ यह जान लेना हम सभी के लिये आवश्यक है कि इसरो ने अन्तरिक्ष विज्ञान,अनुप्रयोग और अनुसंधान के क्षेत्र में सक्रिय योगदान देने वाले पत्रकारों को मान्यता देने और पुरस्कृत करने के लिए अंतरिक्ष विज्ञान, प्रौद्योगिकी और अनुसंधान में “विक्रम साराभाई पत्रकारिता पुरस्कार” की घोषणा की है।
साराभाई संस्थानों के निर्माता और संवर्धक थे और भौतिकी अनुसंधान प्रयोगशाला (पीआरएल) उस दिशा में पहला कदम था। विक्रम साराभाई ने 1966-1971 तक भौतिकी अनुसंधान प्रयोगशाला [पी आर एल] में सेवारत रहे। वह परमाणु ऊर्जा आयोग के अध्यक्ष भी थे। उन्होंने अहमदाबाद के अन्य उद्योगपतियों के साथ मिलकर भारतीय प्रबंधन संस्थान [आईआईएम], अहमदाबाद के निर्माण में प्रमुख भूमिका निभाई। 1971 में दिल का दौरा पड़ने से उनका रात में सोते समय देहांत हो गया और मृत्यु के समय एक पुस्तक खुली हुई उल्टी इनके सीने पर पायी गई थी। जिससे यह स्पष्ट होता है कि वे अन्त समय तक कितने सक्रिय रहे। डॉ. विक्रम साराभाई की उपलब्धियों के कारण भारत सरकार ने उन्हें 1966 में पद्म भूषण और 1972 में मरणोपरांत पद्म विभूषण से सम्मानित किया। मरणोपरांत 1974 में सिडनी स्थित अन्तर्राष्ट्रीय खगोल विज्ञान संघ ने निर्णय लिया कि 'सी ऑफ सेरेनिटी' पर स्थित बेसल नामक मून क्रेटर अब साराभाई क्रेटर के नाम से जाना जाएगा। भारतीय डाक विभाग द्वारा उनकी मृत्यु की पहली बरसी पर 1972 में एक डाक टिकट जारी किया गया।
अन्त में आप सभी को बता दें कि आज हम सभी उन्हें भारतीय अन्तरिक्ष कार्यक्रमों के जनक के रूप में याद करते हैं और सम्मान देते हैं।

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