Bhartiya Parmapara

वैदिक होली की परंपरा और विज्ञान

हिन्दुओ का वैदिक कालीन पर्व है होली 

वैदिक सनातन संस्कृति एक ऐसा विशाल वट वृक्ष है, जिसकी शाखाओं - प्रशाखाओं के रूप में संस्कृति के विभिन्न रंगों की झलक मिलती है। इसमें विभिन्न पर्वों का महत्व, ज्ञान-विज्ञान एवं प्राकृतिक परिवेश के रूप में दृष्टिगोचर होता है। हमारे ऋषि - मुनियों ने समाज के सर्वोत्तम एवं श्रेष्ठ भविष्य के लिए प्रकृति को ही आधार माना है। प्रकृति जब अपना बासी पन परे हटाकर नया कलेवर ग्रहण करती है, तब उसका रूप, रंग और यौवन निखरता है। मौसम में वासंती पवन बहने लगता है, जीव-जंतुओं में नव उमंग-उत्साह जाग्रत हो उठता है। पीले और मुरझाए पत्ते वृक्षों से गिरकर नई कोंपलें और नए पत्ते आते हैं। यह ऋतुराज वसंत आने की आहट है। फाल्गुन आ गया अर्थात होली ने द्वार पर दस्तक दी है।

होली हिंदुओं का वैदिक कालीन पर्व है। होली के इस पर्व को यौवनोत्सव, रंगोत्सव, मदनोत्सव, वसंतोत्सव, दोलयात्रा तथा शिमागा के रूप में भी मनाए जाने की परंपरा है।

होली का आदिकालीन स्वरूप - 


वैदिक कालीन होली की परंपरा का उल्लेख अनेक ग्रंथों में मिलता है। जैमिनी मीमांसा दर्शनकार ने अपने ग्रंथ 'होलिकाधिकरण' नामक प्रकरण में होली की प्राचीनता को स्थापित किया है। विंध्य प्रदेश के रामगढ़ नामक स्थान से प्राप्त 300 ईसापूर्व के शिलालेख में फाल्गुन पूर्णिमा को मनाए जाने वाले इस उत्सव का उल्लेख मिलता है। महर्षि वात्स्यायन ने अपने 'कामसूत्र' नामक ग्रंथ में ' होलाक' उत्सव का वर्णन है, जिसमें ढाक के पुष्पों के रंग से तथा चंदन - केसर आदि सुगंधित द्रव्यों से होली खेलने की परंपरा बताई गई है।

प्राचीन काल में होली की अग्नि में हवन के समय वेदमंत्र 'रक्षोहणं बल्गहणम' के उच्चारण का विधान है। होली का वर्णन सातवीं शताब्दी के संस्कृत नाटककार और कन्नौज के महाराज हर्षवर्धन ने अपने नाटक ग्रंथ 'रत्नावली' में किया है। वहाँ होली का नाम 'वसंतोत्सव' है। इस नाटक में राजा उदयन अपने किले पर खड़े होकर सारी प्रजा को विभिन्न रंगों से होली खेलते हैं। लोग प्रमुदित होकर  एक-दूसरे पर सुगंधित जल डालते हैं। पहली शताब्दी के आसपास प्राकृत भाषा में लिखी 'गाहा सतसई 'में होली 'फाल्गुनोत्सव' है, जिसमें नदी किनारे एकत्र युवक - युवतियाँ एक - दूसरे पर बिना किसी भेदभाव के नदी का जल तथा कीचड़ उछाल रहे हैं। ध्यान देने वाली बात है कि जब 'गाहा सतसई' की होली खेली जा रही थी, तब वात्स्यायन महर्षि ने 'कामसूत्र' में सुवसंतक, उदकक्ष्वेडिका और अभ्युषखादिका जैसे उत्सवों की चर्चा कर रहे थे। इसमें 'सुवसंतक' संभवतः वर्तमान में मनाए जाने वाली 'वसंत पंचमी' है। 'उदकक्ष्वेडिका' पानी की पिचकारियों से रंग खेलने का उत्सव है। 'अभ्युषखादिका' का तात्पर्य नए धान्य को आग में भूनकर खाने से है।

'रघुवंश' में कालिदास ने लिखा है कि इस अवसर पर 'संपन्न जन, सोने की पिचकारियों में रंग भरकर फुहारें छोड़ते। केशों से कुंकुम मिलीं बूंदें टपकतीं रहतीं। राजा और प्रजा सभी मिलकर एक - दूसरे पर रंग डालते। संपूर्ण वातावरण रंगमय, प्रेममय और सुगंधित हो जाता। हास- परिहास भी भरपूर मात्रा में चलता रहता।' संस्कृत के एक अन्य ग्रंथ' कुमार पाल चरित में लिखा है कि' कोई पिचकारी का प्रयोग करता, कोई मुख से ही जल भरकर प्रियजन पर छोड़ता। कोलाहल और संगीत से वातावरण मनोरंजक और आनंदमय हो उठता।'संस्कृत के प्रसिद्ध लेखक सोमेश्वर ने अपने ग्रंथ ‘मानसोल्लास' में होलिकोत्सव का वर्णन किया है - भोजन के पश्चात राजा, कुमार और मंत्रियों के साथ दोपहर बाद एक मंडप में बैठता था। अतिथि भी आते थे। इसके पश्चात पूर्ण शृंगारित वारांगनाएँ, नूपुरों से मधुर ध्वनि करती हुई वहाँ आतीं। राजा पर सुगंधित जल डाला जाता। इसके पश्चात राजा भी कुंकुम, चंदन और हल्दी मिश्रित जल, सेवकों पर छोड़ता और उन्हें सम्मानित करता। '

कहा जाता है कि प्राचीन काल में इसी फाल्गुन पूर्णिमा से प्रथम चातुर्मास संबंधी 'वैश्वदेव' यज्ञ का प्रारंभ होता था, जिसमें लोग खेतों में तैयार नई फसल के अन्न - गेहूँ, चना, जौ आदि की आहुति देते थे और स्वयं यज्ञ शेष प्रसाद के रूप में ग्रहण करते थे। आज भी यह परंपरा 'नवशस्येष्टि यज्ञ पर्व'  (नवान्नेष्टि यज्ञ) के रूप में विद्यमान है। यह 'यज्ञ पर्व' ही होली का आदिम स्वरूप था। यह आयोजन फाल्गुन की पूर्णिमा को किया जाता रहा है। चने के अधभुने दाने को संस्कृत में 'होलक' तथा हिंदी में 'होला' कहा जाता है। वस्तुतः होली ईश्वर को नई फसल के प्रसाद के अर्पण का त्योहार है।

  

होली की दंतकथाएँ -

धार्मिक पुस्तकों तथा शास्त्रों में होली को लेकर अनेक दंतकथाएँ प्रचलित हैं, उनमें से कुछ प्रमुख इस प्रकार हैं -

नारद पुराण के अनुसार : 


होली ईश्वर के परम भक्त प्रह्लाद की विजय और ईश्वरद्रोही हिरण्यकशिपु की बहिन 'होलिका' के विनाश का स्मृति दिवस है। कहते हैं कि हिरण्यकशिपु तथा होलिका  कुल के राक्षस बहुत अत्याचारी थे। उनके घर में अवतरित बालक प्रह्लाद भगवान का भक्त था। उसको भस्म करने के लिए होलिका उसे अपनी गोद में लेकर अग्नि में बैठी थी, क्योंकि होलिका को अग्नि में न जलने का वरदान प्राप्त था। भगवान की कृपा से होलिका का अग्नि में न जलने का वरदान असफल हो गया और वह आग में जलकर भस्म हो गई, जबकि भक्त प्रह्लाद सकुशल बच गया। तभी से होलिकोत्सव पर होली दहन की परंपरा चल पड़ी। 

भविष्य पुराण के अनुसार : 


कहा जाता है कि महाराजा रघु के समय 'ढुंदा' नामक राक्षसी के उपद्रव से निपटने के लिए महर्षि वशिष्ठ के आदेशानुसार बालकों को लकड़ी की तलवार-ढाल लेकर हो-हल्ला मचाते हुए स्थान-स्थान पर अग्नि प्रज्वलन का आयोजन किया गया था। इस राक्षसी को तृप्त करने के लिए लोगों से यह अपेक्षा की गई कि वे निर्भीक और निशंक होकर एक दूसरे को गाली दें, हुड़दंग मचाएँ और अपने शरीर पर  
भस्म और मिट्टी लगाकर इधर-उधर उछल -कूद करें। ऐसा भी संभव है कि महर्षि ने मनुष्य के अंदर छिपे हुए राक्षसी भावनाएँ व्यक्त करने के लिए हास-परिहास का एक दिन सुनिश्चित किया हो जिससे शेष दिन प्रेम व्यवहार से नियमित-संयमित रह सके।

  

कामदेव की पूजा का दिन मदनोत्सव : 


होली को वसंत सखा 'कामदेव' की पूजा का दिन भी माना जाता है। पहले कामदेव की पूजा आज के दिन संपूर्ण भारत में की जाती थी। दक्षिण भारत में आज भी होली का उत्सव 'मदनोत्सव' के नाम से ही जाना जाता है।

वैष्णवों के लिए यह 'दोलोत्सव' का दिन है। ब्रह्म पुराण के अनुसार -   
नरो दोलागतं दृष्टा गोविंदं पुरुषोत्तमं।   
फाल्गुन्यां संयतो भूत्वा गोविंदस्य पुरं ब्रजेत।।

इस दिन झूले में झूलते हुए गोविंद भगवान के दर्शन से मनुष्य वैकुण्ठ को प्राप्त होता है। वैष्णव मंदिरों में भगवान श्रीमद नारायण का अलौकिक शृंगार करके नाचते गाते उनकी पालकी निकाली जाती है। पूर्वी उत्तर प्रदेश में पूर्णिमा पर मासांत माना जाता है तथा फाल्गुन पूर्णिमा को वर्ष का अंत हो जाता है और अगले दिन चैत्र कृष्ण प्रतिपदा से भारतीय नव वर्ष आरंभ हो जाता है, इसीलिए वहां पर लोग होली पर्व को 'संवत जलाना' भी कहते हैं। यह वर्षांत पूर्णिमा है, अतः आज के दिन सब लोग हँस - गाकर, रंग-अबीर से खेलकर नए वर्ष का स्वागत करते हैं।

इस दिन मनु का जन्म हुआ था, इसलिए इस दिन को 'मन्वादितिथि' पर्व के रूप में भी जाना जाता है। पुराणों के अनुसार ऐसी मान्यता है कि जब भगवान शंकर ने अपनी क्रोधाग्नि से कामदेव को भस्म कर दिया था, तभी से होली का प्रचलन हुआ।  


     
मुगल शासक भी खेलते थे होली - 


होली के पर्व को मुगल शासक भी शान से मनाते थे। ग्यारहवीं शताब्दी में मुस्लिम पर्यटक अलबरूनी ने भारत में होली के उत्सव का वर्णन करते हुए लिखा है कि 'उस समय हिंदू और मुसलमान मिलकर होली मनाया करते थे।' बादशाह अकबर और जहांगीर के समय में शाही परिवार में  भी इसे बड़े समारोह के रूप में मनाया जाता था।

विश्वव्यापी है होली पर्व - 


होलिकोत्सव विश्वव्यापी पर्व है। अनेक देशों में इसको अन्य विविध नामों से अलग-अलग समय में मनाया जाता है। इटली में यह उत्सव फरवरी में 'रेडिका' नाम से मनाते हैं। फ्रांस में घास से बनी मूर्ति को शहर में गाली देते हुए घुमाकर,लाकर आग लगा देते हैं।   
जर्मनी में ईस्टर के समय पेड़ों को काटकर गाड़ दिया जाता है। उनके चारों तरफ घास-फूस एकत्र करके आग लगा दी जाती है। इस समय लोग एक-दूसरे के मुख पर विविध रंग लगाते हैं। स्वीडन नार्वे में शाम के समय किसी प्रमुख स्थान पर अग्नि जलाकर लोग नाचते-गाते और उसकी प्रदक्षिणा करते हैं। साइबेरिया में बच्चे घर- घर जाकर लकड़ियाँ एकत्र करते हैं। शाम को उसमें आग लगाकर स्त्री-पुरुष हाथ पकड़कर तीन बार अग्नि परिक्रमा कर उसको लांघते हैं। अमेरिका में होली का त्योहार 'हेलोइन' के नाम से 31 अक्टूबर को मनाया जाता है। इस अवसर पर शाम के समय नाचने-गाने, खेलने की परंपरा है।

देश के विभिन्न क्षेत्रों में हैं होली मनाने के अलग ढंग - 


बहुआयामी भारत देश के अलग अलग भागों में होली का रंग और ढंग भी अलग - अलग होता है। उत्तर प्रदेश में ही बनारसी होली, ब्रज का रास-रंग, नंदगांव - बरसाने की लट्ठमार होली, भोजपुरिया होली, अवध की होली, कानपुर की होली आदि स्थानों में होली का रंगबिरंगा उत्सव देखते ही बनता है। इसके अतिरिक्त देश के हर राज्य और हर समाज में यथा - असमी, पंजाबी, उड़िया, गुजराती, मारवाड़ी, मराठी, बंगाली, मणिपुरी, हरियाणा, राजस्थानी आदि में रंगो के त्योहार को मनाने के अपने-अपने तरीके हैं।  

  


होली पर्व का है वैज्ञानिक आधार - 


भारत के ऋषि-मुनि तत्कालीन वैज्ञानिक थे। उनका चिंतन-दर्शन विज्ञान की कसौटी पर खरा-परखा, प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित करता रहा है। विश्व में भारत ही एक मात्र ऐसा देश है, जिसके त्योहार, पर्व, पूजा-पाठ, संस्कार, धार्मिक आयोजन आदि सब विज्ञान पर आधारित है। होली पर्व के में भी विज्ञान-ज्ञान की अवधारणा समाविष्ट है। रात्रि को संपन्न होने वाला होलिका दहन जाड़े और गर्मी की ऋतुसंधि में प्रस्फुटित होने वाले रोग चेचक, मलेरिया, खसरा, डेंगू, कोरोना तथा अन्य संक्रामक रोगों के कीटाणुओं के विनाश का सामूहिक अभियान है। स्थान - स्थान पर प्रदीप्त अग्नि आवश्यकता से अधिक ताप द्वारा समस्त वायुमण्डल को ऊष्ण बनाकर सर्दी में उत्पन्न रोग कीटाणुओं और जीवाणुओं को विनष्ट कर देती है। होली प्रदक्षिणा के अंतर्गत 140 डिग्री फारेनहाइट तक का ताप शरीर में समाविष्ट होने से मानव के शरीरस्थ समस्त हानिकारक जीवाणुओं को नष्ट कर देता है। होली के अवसर पर होने वाले नाच-गान, हास-परिहास, हुड़दंग, विविध स्वांग भी वैज्ञानिक दृष्टि से स्वस्थ मनोरंजन हैं। एक-दूसरे से गले मिलने से परस्पर आत्मीयता और सौहार्द्र बढ़ता है। महर्षि सुश्रुत ने वसंत को कफ पोषक ऋतु माना है -   
कफश्चितो हि शिशिरे वसंतेअकार्शु तापितः। हत्वाग्निं कुरुते रोगानातस्तं त्वरया जयेतु।।

अर्थात शिशिर ऋतु में एकत्र हुआ कफ, वसंत में पिघलकर कुपित होकर जुकाम, खांसी, श्वास, दमा आदि रोगों की सृष्टि करता है। इसके निदान के लिए तीक्ष्ण वमन, लघु रुक्ष भोजन, व्यायाम आदि आवश्यक है। ऊँचे स्वर में बोलना, नाचना, कूदना, दौड़ना - भागना सभी उपयोगी क्रियाएँ हैं। इस दृष्टि से होली का त्योहार बहुत महत्वपूर्ण है।

बाजारवाद ने बदला है होली का स्वरूप - 


सांस्कृतिक क्षरण, बाजारवाद, उपभोक्तावाद और सतत नैतिक मूल्यों के पतन से समाज से पर्वों का उत्साह और आनंद भी विलुप्त होने की ओर अग्रसर है। इससे होली का त्योहार भी अछूता नहीं है। बाजारवाद ने युवा पीढ़ी को मानसिकता से संवेदनाओं और भावनाओं को विस्मृत करने का प्रयास किया है। नाते-रिश्तों पर भी ग्रहण लग चुका है। परस्पर समता, समरसता, एकजुटता, सद्भाव और आनंदित होकर होली मनाने की उमंग में कमी आई है। पर्व का वैज्ञानिक महत्व, ऋतु परिवर्तन एवं फसलों के उत्पादन से जुड़े होने के बाद भी लोग भारतीय परंपराओं से दूर हो रहे हैं। अतः जीवन के रसों में रंग, सकारात्मकता और ताजगी लाने के लिए होली के संदेश को पुनः जीवंत करने की आवश्यकता है।  


होली का संदेश - 

होली के त्योहार का स्पष्ट संदेश यह है कि जमी हुई गंदगी को दूर करें, मार्ग में बिछे हुए कष्टदायक और हानिकारक तत्वों को हटाएँ। गली-मुहल्ले की साफ-सफाई करके स्वच्छता और शुद्धता का वातावरण उत्पन्न करें। चारों ओर पवित्रता की स्थापना करें। प्राकृतिक, मानसिक, शारीरिक, सामाजिक तथा राजनीतिक विकृतियों में आग लगाकर उत्सव मनाएँ। अश्लील तथा अभद्र शब्दों का प्रयोग, कीचड़-मिट्टी फेंकना, किसी के प्रति क्रूरता-पशुता एवं असभ्यता का प्रदर्शन बंद करें। होली पर आनंद प्राप्ति के लिए आपसी प्रेम और भाईचारे को बढ़ावा दें। शराब पीने, जुआ खेलने, दूसरों को मानसिक आघात पहुँचाने जैसे दुर्गुणों का त्याग करें। होली प्राकृतिक रंगों और फूलों से ही खेलें। हम अपने विकारों को होलिका में जलाकर पवित्र और पावन बनने का संकल्प लें तभी वास्तविक होली का आनंद हम सबको मिल सकता है।

  

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