Bhartiya Parmapara

क्षमा का मूल्य: भारतीय संस्कृति में क्षमाशीलता की परंपरा

त्योहारों की परंपरा मे क्षमा बड़ा आभूषण 

महोदय,  
"क्षमा बड़न को चाहिए" यह कहावत जीवन के गहन अनुभव और परिपक्वता से उपजी सत्यता को प्रकट करती है। क्षमा मांगना और देना केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि आत्मा का शुद्धिकरण है।

जब व्यक्ति अपने अहंकार को त्याग कर झुकता है, तभी सच्ची क्षमा संभव होती है। भारत की विविध संस्कृति में क्षमा का अभ्यास कई त्योहारों और अवसरों पर देखने को मिलता है। जैन धर्म में पर्यूषण पर्व का समापन क्षमावाणी दिवस से होता है, जिसमें लोग अपने परिचितों और प्रियजनों से "मिच्छामि दुक्कड़म्" कहकर क्षमा मांगते हैं।

इसी प्रकार दीपावली के बाद दूसरे दिन यानि पड़वा को भी भाई-बहन और परिवारजन बड़ों के धोक देकर क्षमा याचना करते हैं जिससे रिश्तों में मिठास बनी रहती है।

सिख धर्म में गुरुपर्व और ईद-उल-फितर पर लोग गिले-शिकवे भुलाकर गले मिलते हैं, जो क्षमा और भाईचारे का सुंदर उदाहरण है।

क्रिसमस का पर्व भी "शांति और मेल-मिलाप" का संदेश देता है, जहां यीशु मसीह की शिक्षाओं में क्षमा को सर्वोच्च धर्म माना गया है।

होली का त्यौहार भी "बुरा न मानो होली है" कहकर पुराने विवादों को समाप्त करने और नए सिरे से संबंधों की शुरुआत का अवसर प्रदान करता है।

क्षमा का अभ्यास व्यक्ति को आंतरिक शांति और आत्मिक संतोष प्रदान करता है। यह न केवल व्यक्तिगत संबंधों को प्रगाढ़ करता है, बल्कि समाज में भी सद्भावना और एकता का वातावरण निर्मित करता है। अतः क्षमा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि जीवन का वह मूल्य है जो हमें महान और उदार बनाता है।  
 



   

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