Bhartiya Parmapara

जीवन की बाँसुरी: कठिनाइयों को सरलता से जीतने की प्रेरणादायक सीख

धैर्य 

हे गुरुवर! अब मुझे नहीं रहना है इस संसार में। बालक ने संत से रूठे स्वर में अपना विचार प्रगट किया। 
किन्तु बालक! बगीचे की देखभाल कौन करेगा और जिस लक्ष्य से तुम यहाँ आए हो उसे पूर्ण किए बिना कैसे जा सकते हो?  संत जी अपने मस्तक पर चिंता की लकीरें बनाते हुए बोले।

अच्छा....! आपको अपने बगीचे की पड़ी है संत जी; मेरे भविष्य की नहीं...? 
मेरे सभी साथीगण अपने–अपने लक्ष्य प्राप्त कर जीवन पथ पर अग्रसर होने लगे हैं और मैं वहीं का वहीं एक पत्थर की मूरत की भांति ही खड़ा हूँ। बालक ने कहा।

ओह! तो ये बात है, किन्तु बालक इसका तात्पर्य है कि तुम अपने आप को कमजोर, असहाय, निर्बल समझते हो; मैंने तो कभी इसका ज्ञान नहीं दिया है। हमेशा सकारात्मकता की ओर बढ़ाने का प्रयास किया है। संत जी अपनी दाढ़ी में हाथ फेरते हुए बोले।

नहीं.....नहीं अब मुझे नहीं जीना। बालक बहुत हठ करने लगा।

जैसी तुम्हारी इच्छा! किंतु बालक,  इस संसार से जाने से पहले मेरा एक छोटा सा कार्य कर दो फिर मैं तुम्हें नहीं रोकूँगा। संत, बालक को आज्ञा देते हुए बोले।

बालक मन ही मन क्रोध से लाल होता जा रहा था। उसकी काया क्रोध से सूर्य की तेज अग्नि की भांति तपने लगी थी। 
मन ही मन बुदबुदा रहा था– “मैंने तो सोचा था इतने बड़े तपस्वी के साथ रहता हूँ कुछ न कुछ तो उपाय जरूर बताएँगे जिससे मैं अपना लक्ष्य हासिल कर पाऊँगा और दूसरों की भांति खुश रहकर जीवन यापन करूँगा। अब मुझे पता चला संत श्री मुझसे सिर्फ कार्य करवाते हैं प्रेम तो तिनके की भांति भी नहीं झलकता।” 
फुसफुसाता हुआ बालक संत के पीछे–पीछे चलने लगा।

संत सब कुछ समझ चुके थे। बालक के मन में क्या बातें घूम रही हैं। 
देखो ये अमरूद का वृक्ष है। संत बोले।

गुरुवर; क्या आप मुझे इस अमरूद के वृक्ष को दिखाने बगीचे में लाए हैं? बालक बोला। 
हाँ।  बालक आश्चर्य से संत के चेहरे की ओर देखने लगा।

इसकी अब जरूरत नहीं है इसे काटना ही उचित लग रहा है। संत बोले। 
परन्तु क्यों? इतना हरा–भरा फलदार वृक्ष है उसे मैं काट कर पाप का भागीदार क्यों बनूँ गुरुवर? ना..... बाबा.... ना मैं आपकी आज्ञा नहीं मान सकता। बालक दोनों हाथ जोड़ते हुए बोला।

लेकिन अभी तक तो एक भी बार फल नहीं लगे हैं न इसमें? संत बोले।

इस वृक्ष के लिए तुमने बहुत मेहनत की है; समय–समय पर जल, खाद और न जाने क्या–क्या उपाय किया है; ताकि इसमें जल्द ही फल लग सके लेकिन फल लगते ही सारे फल टूट जाते हैं, फिर तुम्हारी मेहनत तो पानी में गई न? इससे अच्छा है काट दो। संत फरसी को आगे की तरफ बढ़ाने लगे।

नहीं..... नहीं...... संत जी मैं ऐसा नहीं होने दे सकता क्योंकि इसे तो हमने सारे वृक्षों के बाद लगाया है, अभी समय ही कहाँ हुआ है। देर से लगा है इसलिए देर से फल देगा।

अच्छा....! संत जी मुस्कुराते हुए ध्यान से बालक को देखकर बोले- "वत्स! तुम्हें तुम्हारे प्रश्नों का उत्तर मिल गया।"

बालक आश्चर्य से संत जी के तरफ देखकर बोला- "वो कैसे?"

वत्स! जिस प्रकार से वृक्ष में अनेक बार फल लगते हैं और टूट कर नीचे गिर जाते हैं, पत्तियाँ झड़ जाती हैं; इसका मतलब ये नहीं कि पेड़ को काट दिया जाए। वे भी कड़ी तपस्या करते हैं; ऋतु के आते ही फिर से उनमें नई शाखाएँ आती हैं, फल लगते हैं और छायादार–फलदार वृक्ष हमें खट्टे–मीठे फल दे कर जीवन में खुशियाँ बाँटते हैं।

तुमने ही कहा कि इसे बाद में रोपण किया है इसलिए देर से फल लगेंगे; ठीक उसी प्रकार तुम भी तो आश्रम सारे बालकों के आने के बाद आए हो न इसलिए तुम्हें थोड़ा परिश्रम और कष्ट तो सहना पड़ेगा। एक साधारण सा वृक्ष स्थाई रहकर जब हार नहीं मानता है फिर तुम मनुष्य होकर कैसे हार मान सकते हो। असफलता के हाथ लगने से जीवन समाप्त नहीं किया जाता है बालक! कड़ा परिश्रम करो; समय आने पर असंभव भी संभव हो जाता है। सब समय के अनुसार ही होता है।

बालक अपने गुरु के चरण में नतमस्तक होते हुए बोला– "मुझे माफ करना संत श्री, मुझे समझने में भूल हो गई। आज आपने मेरे अंतर्मन के बंद नयन के पट खोल दिए।” मुस्कुराता हुआ बालक अमरूद के वृक्ष को निहारने लगा।

                                               

                                                 

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