बच्चे सीखें भगवान श्रीराम के जीवनादर्श
वर्तमान में भारत सहित समस्त विश्व चारित्रिक दुर्बलता की व्याधि से पीड़ित है। आए दिन समाचार-पत्रों में वीभत्स दुर्घटनाओं के समाचार भरे रहते हैं। इन कुप्रभावों से बच्चे भी अछूते नहीं हैं। वे हत्या, दुष्कर्म, ठगी, अपहरण, चोरी, आत्महत्या, धूम्रपान, नशा सेवन, लव जिहाद जैसी अनैतिक गतिविधियों के शिकार हो रहे हैं। इसका मुख्य कारण यही है कि बच्चों को आदर्श जीवन जीने के संस्कार नहीं मिल रहे हैं। उनमें मानवता के गुण न रहकर दानवता के दुर्गुण बढ़ रहे हैं।
वे अपनी सनातन संस्कृति से कट चुके हैं और आधुनिकता के चक्कर में उन्मुक्त जीवन शैली एवं पाश्चात्य संस्कृति के चंगुल में फँस चुके हैं। सोशल मीडिया द्वारा परोसी जा रही अश्लीलता में लिप्त होकर किशोर दृग भ्रमित हैं। मोबाइल की बुरी लत ने उन्हें सद्ग्रन्थों से दूर कर दिया है और वे सतही मनोरंजन में आनंद का अनुभव कर रहे हैं। इससे अपरिपक्व मस्तिष्क के बच्चों का चारित्रिक पतन हो रहा है।
भारतीय संस्कृति सदैव से मानव मात्र के लिए कल्याणकारी रही है। चरित्र निर्माण की सीख के लिए हमें भटकने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि हमारे समक्ष मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम जैसे महानायक का जीवन चरित्र आदर्श रूप में प्राप्त है।
बाल्यकाल चरित्र - शिक्षा का समुपयुक्त समय है। इन वर्षों में हम जो सीख लेते हैं, उसका प्रभाव जीवन भर हमारे साथ रहता है और हमारे आचरण एवं कार्य - व्यवहार को प्रभावित करता है। बालक को सच्चरित्र बनाने में अच्छी आदतों, परिस्थितियों और शिक्षाओं का योगदान होता है। अतः बालक को श्रीराम जैसे उत्तम चरित्र से ओतप्रोत होना चाहिए, इसके लिए उसे उक्त दिशा का पथिक बनना चाहिए। श्रीराम ने संयमित, अनुशासित, अध्यवसाय और कर्म-निष्ठ जीवन के जो आदर्श प्रस्तुत किए, वे हर बच्चे के लिए उपयोगी और प्रेरणादायी हैं।
बचपन से ही संयमित दिनचर्या - श्रीराम बचपन से ही ब्रह्म मुहूर्त में जागते थे। अपने माता-पिता, गुरुजन तथा अपने से बड़ों को सम्मान देते थे। उनकी आज्ञा के अनुसार ही सारे कार्य करते थे। उनके इन गुणों के कारण लोग अत्यंत हर्षित होते थे।
मनुस्मृति में कहा गया है कि बड़े - बूढ़ों की वंदना तथा सेवा करने से आयु, विद्या, यश और बल में वृद्धि होती है। श्रीराम साधारण बालकों की तरह सखाओं के साथ खेलते - कूदते भी थे और स्वाध्याय भी चालू रखते थे। वे सद्ग्रन्थों का अध्ययन करते थे और श्रीगुरु से श्रवण भी करते थे। वे अपनी विनय, नम्रता, सुशीलता और सहज स्नेह से बचपन से ही लोकप्रिय हो चले थे।
श्रीराम की मातृभक्ति - माता कौशल्या सहित माता कैकेयी और सुमित्रा के प्रति उनका महान आदरभाव था। माता कैकेयी ने उनको कठोर वचन कहे और वन में जाने का आदेश दिया। माता कौशल्या ने आपसे कहा कि 'पिता से, माता की आज्ञा बढ़कर होती है, इससे तुम वन न जाओ।' तब आपने उन्हें माता कैकेयी की आज्ञा बतलायी। उन्होंने माता कैकेयी की कभी निंदा नहीं की।
अनूठी पितृभक्ति - पिताश्री दशरथ की स्पष्ट आज्ञापालन हेतु श्रीराम ने पिता का संकेत मात्र पाकर प्रसन्नतापूर्वक 14 वर्ष के लिए अयोध्या त्याग कर दिया। श्री दशरथ जी ने वन - गमन के लिए स्पष्ट शब्दों में आज्ञा नहीं दी थी, कैकेयी माता की आज्ञा में उनकी मौन सम्मति मात्र थी, तथापि आपने पिता के वचनों का सम्मान करते हुए वन - गमन को स्वीकार किया।
आदर्श गुरुभक्ति - मुनि विश्वामित्र जी श्रीराम के शिक्षागुरु थे। वे अपने गुरुवर की सेवा में सदैव तत्पर रहते थे। वे श्रीगुरु के जागने के पहले ही जाग जाते थे, उनके लिए फूल इत्यादि लाते थे। छोट - मोटे काम भी गुरु की आज्ञा से ही करते थे। श्रीगुरु के शयन करने पर चरणसंवाहन करते और उनकी आज्ञा पाकर ही स्वयं शयन करते थे। मुनि वशिष्ठ जी कुलगुरु थे, वे उनकी सेवा करना भी अपना सौभाग्य समझते थे।
अतुलनीय भ्रातृ प्रेम - श्रीराम का भ्रातृ प्रेम अतुलनीय था। बचपन से ही वे अपने भाइयों से अपार स्नेह करते थे। सदा उनकी रक्षा करते थे और उन्हें प्रसन्न रखते थे। श्रीराम को जो भी कोई उत्तम भोजन या वस्तु मिलती थी, उसे वे पहले अपने भाइयों को देकर पीछे स्वयं खाते या उपयोग करते थे। श्रीराम अपने भाइयों के साथ ही भोजन करते थे। वे अपने भाइयों का मन रखने के लिए खेल में हार भी जाते थे। उन्हें अयोध्या के राजा दशरथ के पुत्र होने का लेशमात्र भी घमंड नहीं था। वे अपने राज्य के प्रत्येक बच्चे के साथ मित्रता रखते थे और उनके साथ नित्य वन में खेलने जाते थे।
पशु-पक्षियों से प्रेम - बच्चे बहुत नटखट होते हैं। वे चिड़ियों पर ढेला फेंक कर उड़ा देते हैं, हो-हो करके भगा देते हैं। पशुओं को मारते हैं या उन्हें तंग करते हैं।
यह बुरी बात है, किसी जीव को सताना नहीं चाहिए, सदैव उनके प्रति दया भाव रखना चाहिए। ऐसी सुंदर सीख भगवान श्रीराम ने दी है।
उनके बचपन का एक दृष्टांत है। श्रीराम अपने महल में कौवे (काकभुशुण्डि) के साथ खेल रहे थे। किलकारी मारते हुए जब वे काक को पकड़ने के लिए दौड़ते हैं तो काक उड़कर उनकी पहुँच से दूर हो जाता है। ऐसे में वे पुआ दिखाकर उसे बुलाते हैं। एक अन्य प्रसंग के अनुसार भगवान शिव राम के बाल रूप को देखने के लिए मदारी बनकर अयोध्या आते हैं। उनके साथ वानर रूप में हनुमान जी होते हैं। वानर को देखकर श्रीराम उन्हें पाने की हठ करते हैं तो राजा दशरथ ने मदारी बने शिव से वानर रूपी हनुमान को मांग लिया। इसके बाद बहुत दिनों तक हनुमान जी, श्रीराम के साथ रहे। वे बचपन से ही परम गोभक्त भी थे।
किशोरावस्था में श्रीराम -
श्रीराम जब किशोरावस्था की ओर पदार्पण कर रहे थे, तो वे अपने भाइयों और सखाओं के साथ अयोध्या की गलियों में विचरण करते थे। हाथ में धनुष - बाण लिए हुए उनका मनमोहक रूप निरखकर नगरवासी अभिभूत हो जाते थे। वे सखाओं के साथ सरयू नदी में नौका विहार करते थे किशोरावस्था में ही उन्होंने धार्मिक अनुष्ठानों में रत विश्वामित्र मुनि के यज्ञ - रक्षार्थ ताड़का और सुबाहु राक्षस का वध किया। वे शस्त्र और शास्त्र दोनों विषयों में पारंगत थे।
श्रीराम संपूर्ण विश्व के आदर्श हैं। इन्हीं आदर्शों की प्राप्ति के लिए मनुष्य - जाति राम - चरित्र को बार बार सुनती है और पढ़ती है।
इस विलक्षण और शक्तिशाली चरित्र से मानव मात्र अपने दिन - प्रतिदिन के जीवन में मार्गदर्शन प्राप्त कर कृतकृत्य हो सकता है। बालकों को राम कथा पढ़कर और उस पर चिंतन - मनन करके, श्रीराम के चरित्र का अनुसरण करना चाहिए।
शिक्षकों और अभिभावकों को भी चाहिए कि वे बच्चों को श्रीराम के उदात्त चरित्र की कथाएं सुनाकर, उन्हें राम बनने के लिए प्रेरित करें। बालकों के चरित्र निर्माण से ही देश का समुचित विकास संभव है। आज के बच्चे ही देश के भावी कर्णधार हैं और वे ही सच्चा रामराज्य ला सकते हैं।

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