Bhartiya Parmapara

नारी: परिवार की कुशल प्रबंधक — भारतीय संस्कृति में नारी की शक्ति, भूमिका और महत्व

नारी परिवार की कुशल प्रबंधक होती है 

भारतीय संस्कृति में नारी को ‘शक्ति’ कहा गया है। वह सृजन की स्रोत, प्रेम की प्रतीक और संतुलन की संवाहिका है। यदि कहा जाए कि परिवार नामक संस्था की धुरी नारी ही है, तो यह कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। नारी न केवल जीवन को जन्म देती है, बल्कि उसे दिशा, अनुशासन और संवेदना भी प्रदान करती है। परिवार का आधार प्रेम, सहयोग, त्याग, अनुशासन और समझदारी पर टिका होता है— और ये सभी गुण नारी के स्वभाव में सहज रूप से विद्यमान होते हैं। इसी  
कारण से वह परिवार की कुशल प्रबंधक  कही जाती है।

परिवार : समाज की इकाई और नारी की भूमिका  
परिवार समाज की सबसे छोटी और सबसे प्रभावशाली इकाई है। यदि परिवार सुसंगठित, संतुलित और संस्कारित है तो समाज स्वतः स्वस्थ बनता है। इस परिवार का संचालन, समन्वय और प्रबंधन जिस संवेदनशीलता और दूरदृष्टि से होता है, वह मुख्यतः नारी के ही माध्यम से संभव है।

नारी परिवार में केवल गृहिणी नहीं होती — वह माता, बहन, पत्नी, पुत्री, सास, दादी, शिक्षक, चिकित्सक, मनोवैज्ञानिक और सदाचारिणी — सभी भूमिकाओं का निर्वाह करती है। वह अपने प्रेम, धैर्य, और दूरदृष्टि से परिवार को एक सूत्र में बाँधती है।



   

भारतीय परंपरा में नारी की प्रबंधकीय भूमिका  
भारतीय संस्कृति में नारी की प्रबंधक छवि प्राचीन काल से पूजनीय रही है। वैदिक युग की ‘गृहपत्नी’ केवल रसोई संभालने वाली नहीं, अपितु परिवार की ‘संस्कृति-संरक्षिका’ थी। ‘मनुस्मृति’ में कहा गया है — “यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता।”  
— जहाँ नारी का सम्मान होता है, वहाँ देवता भी निवास करते हैं।

गार्गी, मैत्रेयी, अपाला, लोपामुद्रा जैसी ऋषिकाएँ न केवल विदुषी थीं, अपितु जीवन के व्यावहारिक पक्षों में भी दक्ष प्रबंधक थीं। वे परिवार और समाज के बीच संतुलन बनाए रखने में समर्थ थीं।   
मध्यकालीन भारत में मीरा, अहिल्याबाई होलकर, झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई, सावित्रीबाई फुले आदि ने नारी के नेतृत्व और संगठनात्मक क्षमता का परिचय दिया। अहिल्याबाई होलकर ने तो एक पूरे राज्य को मातृवत् संभाला और प्रबंधन का ऐसा उदाहरण प्रस्तुत किया जो आज भी प्रशंसनीय है।


नारी की प्रबंधकीय योग्यता : भावनात्मक और व्यावहारिक पक्ष  
परिवार का प्रबंधन केवल आर्थिक नहीं होता; यह भावनात्मक और मानसिक संतुलन का भी विषय है। नारी दोनों स्तरों पर सक्षम प्रबंधक सिद्ध होती है।


(क) भावनात्मक प्रबंधन :  
नारी परिवार के प्रत्येक सदस्य की भावनाओं को समझती है। वह पति की थकान को मुस्कान से मिटाती है, बच्चों की जिद को प्रेम से दिशा देती है, और बुजुर्गों की आवश्यकताओं का ध्यान रखती है। उसकी संवेदना ही परिवार को जोड़ती है।  
“स्त्री का हृदय परिवार का आश्रय होता है — जहाँ हर मन को विश्राम मिलता है।”


(ख) आर्थिक प्रबंधन :  
नारी सीमित संसाधनों में भी अद्भुत संतुलन बनाती है। वह आय और व्यय का नियोजन करती है, बचत का अभ्यास कराती है, और आवश्यकतानुसार प्राथमिकताएँ तय करती है। वह पारिवारिक अर्थव्यवस्था की ‘गृह मंत्री’ होती है।


(ग) समय और श्रम प्रबंधन :  
एक कुशल नारी समय का उत्कृष्ट नियोजन करती है। वह सुबह से रात तक अनेक कार्यों का संचालन करती है — बच्चों की देखभाल, भोजन की व्यवस्था, सफाई, कार्यालय (यदि कार्यरत है) और समाजसेवा — यह सब वह बिना शिकायत के निभाती है।


(घ) संवाद और संबंध प्रबंधन :  
परिवार में संवाद और सौहार्द्र बनाए रखना सबसे बड़ी कला है। नारी यह जानती है कि कब मौन रहना है, कब मुस्कराना है, और कब समझाना है। यही उसकी सबसे बड़ी प्रबंधकीय बुद्धिमत्ता है।


शिक्षा और संस्कार — नारी के प्रबंधन के मूल स्तंभ  
नारी परिवार की पहली शिक्षक है। बालक जब बोलना सीखता है, तो माँ से ही पहला शब्द सीखता है। संस्कारों का बीजारोपण भी माँ के ही माध्यम से होता है। नारी परिवार में ‘संस्कार-प्रबंधक’ के रूप में कार्य करती है।  
“माँ की गोद ही बच्चे का पहला विद्यालय है।”  
यदि माँ संस्कारित है, तो परिवार सुसंस्कृत होता है; और यदि परिवार संस्कारित है, तो समाज स्वयं व्यवस्थित हो जाता है। इसीलिए कहा गया है —  
“एक शिक्षिता नारी सौ शिक्षित पुरुषों के समान होती है।”


आधुनिक युग में नारी की प्रबंधकीय चुनौतियाँ  
आज की नारी केवल गृहिणी नहीं, अपितु कार्यरत महिला, नेत्री, उद्यमी, शिक्षिका और सामाजिक कार्यकर्ता भी है। वह घर और बाहर दोनों मोर्चों पर संतुलन बनाए रखने का प्रयास कर रही है। किन्तु आधुनिकता के दबाव, प्रतिस्पर्धा और पारिवारिक मूल्यों के क्षरण ने उसके प्रबंधन को चुनौतीपूर्ण बना दिया है। नौकरी और गृहकार्य के बीच समन्वय कठिन होता जा रहा है। फिर भी भारतीय नारी अपनी जिजीविषा, लचीलापन और भावनात्मक शक्ति से इन चुनौतियों पर विजय पा रही है।  
वह तकनीक, शिक्षा और आत्मनिर्भरता के सहारे अपनी भूमिका को और अधिक प्रभावी बना रही है। “होम मैनेजमेंट” का जो सिद्धांत आज पश्चिम में प्रचलित है, वह भारतीय नारी का शाश्वत व्यवहार रहा है।


नारी की प्रबंधकीय भूमिका के सामाजिक प्रभाव  
एक सुसंगठित परिवार समाज की सुदृढ़ इकाई है। नारी जब अपने परिवार का प्रबंधन सुसंस्कृत ढंग से करती है, तो समाज में अनुशासन, नैतिकता और सहयोग की भावना स्वतः विकसित होती है।


सद्भावना का विकास: नारी अपने व्यवहार से परिवार में आपसी प्रेम और सहयोग को जन्म देती है।  
सांस्कृतिक निरंतरता: वह परंपरा और आधुनिकता का संतुलन बनाए रखती है।  
आर्थिक स्थिरता: अपने बचत और नियोजन कौशल से परिवार को आर्थिक संकट से उबारती है।  
शिक्षा और स्वास्थ्य: वह बच्चों की शिक्षा, बुजुर्गों की देखभाल और परिवार के स्वास्थ्य पर ध्यान देती है।  
नैतिकता का संरक्षण: नारी अपने जीवन से यह सिखाती है कि सत्य, ईमानदारी और करुणा ही जीवन के वास्तविक मूल्य हैं।

इस प्रकार नारी न केवल परिवार की, अपितु समाज और राष्ट्र की भी कुशल प्रबंधक बन जाती है।  
भारतीय समाज में बदलती नारी छवि  
आज की नारी घर की चारदीवारी तक सीमित नहीं है। वह समाज और राष्ट्र निर्माण में सक्रिय भागीदार है — फिर भी उसकी जड़ें परिवार में ही हैं।

रानी लक्ष्मी बाई, बेगम हजरत महल, सुधा मूर्ति, कल्पना चावला, निर्मला सीतारमण, किरण बेदी, मेरी कोम, पीटी उषा जैसी नारियाँ आधुनिक भारत की उदाहरण हैं, जिन्होंने पारिवारिक संतुलन के साथ-साथ राष्ट्रीय उत्तरदायित्वों को भी सफलता से निभाया। उनके जीवन से यह सिद्ध होता है कि यदि नारी को उचित शिक्षा, अवसर और सम्मान मिले तो वह किसी भी क्षेत्र में उत्कृष्ट प्रबंधन कर सकती है।



   

पारिवारिक प्रबंधन : आध्यात्मिक दृष्टि से  
भारतीय दर्शन में गृहस्थाश्रम को चार आश्रमों में सर्वोत्तम माना गया है, क्योंकि यह संतुलन और समर्पण का प्रतीक है। इस संतुलन को बनाए रखने वाली शक्ति नारी ही है। वह ‘लक्ष्मी’ के रूप में समृद्धि देती है, ‘सरस्वती’ के रूप में ज्ञान देती है, और ‘अन्नपूर्णा’ के रूप में पोषण करती है। इसीलिए परिवार की नारी को ‘गृहलक्ष्मी’ कहा गया है।  
“नारी का स्वरूप केवल सौंदर्य नहीं, अपितु संयम और सामंजस्य की प्रतिमूर्ति है।”

नारी अपने त्याग और ममता से परिवार को आध्यात्मिक आधार देती है, जिससे घर ‘घर’ बनता है, केवल एक निवास नहीं।

प्रबंधन की आदर्श पाठशाला  
यदि प्रबंधन को परिभाषित करें तो यह है —   
“संसाधनों का उचित नियोजन एवं नियंत्रण ताकि लक्ष्य प्राप्त हो सके।” नारी इस परिभाषा की जीती-जागती मिसाल है।

वह संसाधन प्रबंधक है — सीमित साधनों में अधिकतम उपयोग करती है।  
वह मानव संसाधन प्रबंधक है — परिवार के सदस्यों की क्षमताओं को पहचानती है।  
वह संघर्ष प्रबंधक है — मतभेदों को संवाद से सुलझाती है।  
वह भावना प्रबंधक है — सभी को स्नेह और सहानुभूति से जोड़ती है।  
और वह संकट प्रबंधक है — विपत्ति में धैर्य रखती है, समाधान खोजती है।

इस प्रकार नारी में प्रबंधन के सभी गुण — योजना, संगठन, नेतृत्व, नियंत्रण और समन्वय — सहज रूप से उपस्थित हैं।

नारी — परिवार की आत्मा  
नारी वह ज्योति है जो अंधकार को प्रकाश में बदल देती है। वह परिवार के प्रत्येक कण में जीवन का संचार करती है। यदि नारी सशक्त, शिक्षित और आत्मनिर्भर है, तो परिवार सशक्त होता है; और यदि परिवार सशक्त है, तो समाज और राष्ट्र सशक्त बनते हैं।

अतः नारी केवल परिवार की “गृहिणी” नहीं, अपितु उसकी “गृहलक्ष्मी”, “संस्कृति की वाहिका” और “जीवन की प्रबंधक” है।  
“घर वही जहाँ माँ की मुस्कान हो,  
परिवार वही जहाँ नारी का सम्मान हो।”

नारी के इस प्रबंधकीय स्वरूप का सम्मान करना ही सभ्यता की सच्ची पहचान है। वह बिना किसी प्रशिक्षण के, प्रेम, त्याग और विवेक से वह सब कर दिखाती है जो प्रबंधन के किसी संस्थान में सिखाया नहीं जा सकता।

अस्तु, नारी परिवार की कुशल प्रबंधक है — क्योंकि “वह हृदय से सोचती है, बुद्धि से योजना बनाती है, हाथों से सृजन करती है और आत्मा से संबंधों को निभाती है।”

उसका प्रबंधन केवल कार्य नहीं, एक जीवन-कला है — जो समाज और संस्कृति दोनों को दिशा देती है।



   

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