Bhartiya Parmapara

भाषा का महत्व: मधुर वाणी, संस्कार और सभ्यता का वास्तविक परिचय

मनुष्य की भाषा ही उसके व्यतितवा का दर्पण है 

भाषा मनुष्य का सबसे बड़ा आभूषण है, जो उसके व्यक्तित्व, संस्कार और सभ्यता का परिचायक बनती है। जिस प्रकार वस्त्र शरीर को ढँककर बाहरी रूप को सुंदर बनाते हैं, उसी प्रकार भाषा हमारे आचरण को उजागर कर हमारे भीतरी संस्कारों का परिचय देती है।

मधुर और शालीन भाषा केवल शब्दों का समूह नहीं, बल्कि विनम्रता, संयम और सभ्यता की अभिव्यक्ति होती है। संस्कार व्यक्ति के आचरण में झलकते हैं और भाषा उनके माध्यम से समाज के सामने प्रकट होती है। जब हम किसी से सुसंस्कृत, सम्मानजनक भाषा में संवाद करते हैं, तो हम न केवल अपने प्रति, बल्कि दूसरे के प्रति भी आदर प्रकट करते हैं।

वहीं, कटु या अशोभनीय भाषा हमारे संस्कारों पर प्रश्नचिह्न लगाती है और सामाजिक प्रतिष्ठा को आहत करती है। भाषा वह सेतु है जो व्यक्ति को समाज से जोड़ता है। अगर यह सेतु संयम, शालीनता और सद्भाव से निर्मित है तो संबंध मजबूत होते हैं; किंतु अपशब्द और अमर्यादित वाणी उस सेतु को तोड़ देती है। इसलिए आवश्यक है कि हम अपनी भाषा को उतनी ही स्वच्छ और सुंदर बनाएँ, जितनी सावधानी हम अपने वस्त्र या रूप पर रखते हैं।

भाषा की मर्यादा ही व्यक्ति के संस्कारों की मर्यादा है और वही उसे सच्चे अर्थों में “सभ्य” बनाती है।

                                              

                                                

Login to Leave Comment
Login
No Comments Found
;
MX Creativity
©2020, सभी अधिकार भारतीय परम्परा द्वारा आरक्षित हैं। MX Creativity के द्वारा संचालित है |