दर्द-ए-दिल
"शीला, मुझे तुम्हारी बहुत फिक्र हो रही है। और होगी भी क्यों नहीं, उन्तीस बरस की जो हो गई हो। शादी की उम्र हो गई है तुम्हारी। पता नहीं तुमसे कौन शादी करेगा।"
शीला की बड़ी माँ, मालती के स्वर में चिंता से ज़्यादा ताना था। चारों तरफ़ से सिर्फ़ एक ही आवाज़ कानों में गूंजती रहती— "तुमसे शादी कौन करेगा, शीला...?"
यह समाज, शीला के माता–पिता को प्रश्नों से आहत कर डालता था। ज़िंदगी भर 'बिठा के रखने' के तानों ने उनका जीना हराम कर दिया था। डूबते को तिनके का सहारा भी नहीं मिलता। अब करें तो करें क्या?
शीला को अपनी ही ज़िंदगी पहाड़ जैसी लगने लगी। वह बार–बार अपने आप को कोसती कि आखिर क्यों उसके साथ ही ऐसा व्यवहार किया जाता है।
एक दिन शीला ने ठान लिया कि उसे समाज को जवाब देना है। लोग उसे देखते ही तरह–तरह की बातें करते, लेकिन उन्हीं बातों ने शीला को अंदर से और मज़बूत बना दिया।
लोगों को ज़रा भी उम्मीद नहीं थी कि वह कुछ कर पाएगी। पर शीला ने हार नहीं मानी। पढ़ाई–लिखाई में लग गई। आखिरकार उसकी मेहनत रंग लाई और वह जिलाधिकारी बन गई। सबकी आँखें फटी की फटी रह गईं।
अब शीला के लिए बड़े–बड़े घरों से रिश्ते आने लगे। जिन लड़कों ने पाँच साल पहले उसे ठुकरा दिया था, वे पछताने लगे। शीला के माता-पिता ने उसके जिलाधिकारी बनने की खुशी में एक छोटा-सा बधाई समारोह रखा, जिसमें जाति–समाज के लोगों के साथ पूरा गाँव आमंत्रित था।
उत्सव का कार्यक्रम चल ही रहा था कि तभी एक लड़के ने शीला को प्रपोज़ कर दिया। बातों ही बातों में उसने शीला के माता–पिता के समक्ष अपनी इच्छा भी रख दी।
लड़के की बातें सुनकर शीला भौंचक रह गई। उसे लगा— "आज अचानक मेरे प्रति इसका प्रेम कैसे उमड़ आया?"
शीला ने तुरंत इंकार करते हुए सबके सामने अपनी बात रखी—
"क्या हो गया है आज लोगों को, माँ? कल तक जो लोग मुझे देखना भी पसंद नहीं करते थे, वे आज मेरी खुशी में शामिल हो गए। आखिर क्यों?
यह समाज चाहता क्या है? यही न— चाहे लड़की जैसी भी हो, अगर उसके पास पैसा है तो उसकी शादी हो सकती है, और नहीं है तो नहीं! है न?"
शीला बौखला-सी गई थी—
"मैं कल भी अपाहिज थी और आज भी हूँ। बैसाखी ही मेरा सहारा रही है, लेकिन सिर्फ़ पैरों से, दिमाग से नहीं।
दो साल पहले मेरे पड़ोसी उमेश की शादी धूमधाम से हुई थी, जबकि वह हाथ और पैर से अपंग है।
अब मेरी बारी आई तो सब तरफ से ऊँगलियाँ उठ रही हैं— क्यों? क्योंकि मैं लड़की हूँ?
क्या अपाहिज होना सिर्फ़ लड़कियों के लिए अभिशाप है?
उमेश की पत्नी को ही देख लो, वह ठीक-ठाक होकर भी अपाहिज पति के साथ जीवन बिता रही है। क्या उसके अपने सपने नहीं थे? क्या उसकी ज़िंदगी बर्बाद नहीं हुई?
आप लोगों की सोच के अनुसार एक अच्छी-भली लड़की अपाहिज लड़के से शादी कर सकती है, लेकिन अपाहिज लड़की से कोई लड़का शादी नहीं करेगा?
आज यह भेदभाव साबित कर रहा है कि असल में अपाहिज आपकी सोच है। मुझ जैसी और भी लड़कियाँ हैं, जिन्हें सिर्फ़ शरीर के कुछ अंग काम न करने पर समाज कमजोर समझ लेता है। जहाँ हमें सहारे की ज़रूरत होती है, वहाँ लोग हमें हमारी अपाहिज़ी याद दिला देते हैं।"
आज शीला ने अपना दर्द सबके सामने रख दिया। फिर क्या था, न सिर्फ़ शीला बल्कि उसके माता–पिता की आँखों से भी आँसू बह निकले।
पार्टी से लोग नज़रें झुका कर खिसकने लगे।

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