Bhartiya Parmapara

अज्ञान से ज्ञान की ओर: वैदिक साहित्य में प्रकाश, सद्गुण और श्रेय मार्ग का संदेश

लोकभ्योदये का संदर्भ और ज्ञान - पथ 

वैदिक वाङ्मय में मनुष्य को प्रशस्त्य जीवन शैली के लक्ष्यगत कुवृत्तियों/ बुराइयों से सतर्क रहने के लिए निर्देशित किया गया। श्रेय मार्ग का उल्लेख व्यष्टि ही नहीं समष्टि स्तर पर भी अभ्युदयकारी दिशा व गति प्रदर्शित करता है। वर्तमान युग में विकृत हो रही सामाजिक स्थितियों, यत्र- तत्र व्याप्त हो रहे भ्रष्टाचरण, क्षीण हो रहे जीवन मूल्यों, बिखर रही परिवार व्यवस्था, भौतिक पदार्थों में संलिप्तता, कर्म तत्व से तटस्थता  आदि को देखकर श्रेय मार्ग की महत्ता को गम्भीरतापूर्वक संज्ञान में लेने की आवश्यकता अनुभूत हो रही है। व्यवस्थित व्यक्तित्व तथा सुसंगठित समाज के लिए मानवीय सदवृत्तियों को केंद्रित करना अपरिहार्य दिखाई दे रहा है।

बहुधा मनुष्य संसार यात्रा में अनेक नकारात्मक मनोभावों का सामना करता है, जो जीवन को कुमार्ग पर संचालित कर सकते हैं। ध्यातव्य है कि ये आन्तरिक शत्रु विवेक- शक्ति को क्षीण कर अभीष्ट लक्ष्य की पूर्ति में अवरोधक बन सकते हैं। इतना ही नहीं, इन आंतरिक शत्रुओं द्वारा वशीकृत होने पर जीवन की सार्थकता चिह्नित हो सकती है। अतएव मनुष्य को सद्वृत्तियों के संदर्भ में सजग और सचेत रहना चाहिए। इस संदर्भ में अथर्ववेदीय मंत्र है कि-  
उलूकयातुं शुशुलूकयातुं जहि श्वयातुमुत कोकयातुम्।  
सुपर्णयातुमुत गृध्रयातुं दृषदेव प्र मृण रक्ष इन्द्र।। अथर्ववेद/8/4/22

उल्लू को दिवांध अथवा दिवाभीत कहा गया है। उलूक अंधकार प्रिय पक्षी है, अंधेरे में सक्रियता उसकी प्रकृति है। उक्त मंत्र के अंतर्गत ‘‘उलूक यातुं जहि’’ इन शब्दों में मनुष्य को अंधकार वृत्ति से पृथक्ता निर्देशित है। अंधकार अज्ञान का प्रतीक है। अज्ञान में लिप्तता मानव के हित में नहीं। समाज को सुधार की ओर- श्रेष्ठता की ओर अग्रसर करने वाला यह प्रशिक्षण  सदा ग्रह्णीय है। कल्याणेच्छु व्यक्ति द्वारा स्वार्थ अथवा मोह के पाश से बांधने वाली इस पाशविक वृत्ति/ अंधकारप्रियता से विरत होना लोकाभ्युदयकारी  है।

दरअसल अज्ञान से आच्छादित होने पर मनुष्य का अंतःकरण विवेकशून्य हो जाता है। अज्ञानता की स्थिति में मानवीय गुणों का नाश होने लगता है, अधर्म अविवेक आदि अवगुण विस्तार पाते हैं। अतएव विकृत वृत्तियों से अलग रहना ही मानवीय पक्ष है। सर्वश्रेष्ठ योनि होने के नाते मनुष्य से प्रकाश की ओर गतिमान हो़ने की अपेक्षा की जाती है। निस्संदेह, मनुष्य के लिए उल्लू के समान कार्य करने की प्रवृत्ति से दूरी बनाना ही युक्तियुक्त है। इस उपदेश के पीछे लोकमंगल की तीव्र व्यंजना दिखाई देती है।

यथार्थ दर्शन ही ज्ञान है- यथार्थदर्शनं ज्ञानम्। जीवन में अर्थवत्ता की दृष्टि से ज्ञान को सर्वोच्च स्थान प्राप्त है- नहि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते। प्रकाश ज्ञान का प्रतीक है। ज्ञानाधिगम के लिए अभीप्सा जरूरी है, ज्ञानी जनों का सान्निध्य जरूरी है, सजगता जरूरी है। जीवन की सफलता- सार्थकता- उत्कृष्टता की प्राप्ति में यही तत्व सर्वाधिक सहायक है। ज्ञान ही जीवन में  गुणवत्ता का समावेश करता है। उपनिषद् ग्रंथ मानव को ज्ञान की ओर बढ़ने के लिए उपदिष्ट करते हैं- उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत। कठोपनिषद्/3/14

ज्ञान से चरित्र का निर्माण होता है। यह जीवन में सतत प्रयोग में आने वाला तत्व है, यही जीवन को सही दिशा में गतिशीलता की ओर प्रेरित करता है।  
ज्ञान शुद्ध वायु की तरह जीवन में आवश्यक दिखाई देता है। इसके बिना तो जीवन की सार्थकता ही प्रश्नांकित है। ज्ञान में बौद्धिक विकास का सामर्थ्य है जो जीवन को अर्थवान बनाने में सहायता कर सकता है। जीवन को संतुलित व साभिप्राय बनाने के लिए ज्ञान की अपरिहार्यता सर्वज्ञात तथ्य है। ज्ञान ही वह तत्व है जो वैयक्तिक/ सामाजिक संस्थिति के लिए आवश्यक है। इसीलिए अज्ञान से ज्ञान की ओर गतिशीलता हेतु वैदिक प्रार्थना है कि- तमसो मा ज्योतिर्गमय। भारतीय चिंतना ज्ञान के अनुसंधान/ अन्वेषण में समर्पित दिखाई देती है।

वैयक्तिक/ सामाजिक उत्कृष्टता के मूल में ज्ञान की प्रभावी संस्थिति है। ज्ञान एक अंतर्दृष्टि है, इसके आलोक में मनुष्य गलत दिशा में कभी नहीं भटकता। ग्राह्य- त्याज्य, धर्म- अधर्म, कर्तव्य- अकर्तव्य, अच्छा- बुरा के मध्य भेद़ को संज्ञान में लेकर उपयुक्त निर्णय के लिए प्रेरित करता है। सोचने समझने की क्षमता में अभिवृद्धि कर यह जीवन में गुणवत्ता का समावेश करता है। समाज में नैतिकता के तहत प्रभावपूर्ण भूमिका है ज्ञान की। व्यक्तिगत एवं समाजगत श्रेष्ठता का आधार ‘ज्ञान’ मानसिक विकृतियों से सचेत कर परिवेश को बेहतरी की ओर बढ़ाता है।

ज्ञान कौशल को बढ़ावा देता है। यह सुविचारों के माध्यम से वैयक्तिक उन्नति का पथ निर्मित करता है। यही नहीं, जीवन को संयमित और मर्यादित बनाने में भी कार्य करता है। आचार एवं व्यवहार पक्ष को संतुलित व अनुशासित कर यथेष्ट व्यक्तित्व को रूपायित करता है। ज्ञान के माध्यम से ही सदुद्देश्य तक पहुंचने में सहजता अनुभव की जाती है। यह मानव को जीवन की सार्थकता एवं सफलता हेतु प्रेरित करता है।

ज्ञान- शक्ति का उपयोग जीवन को सोद्देश्य बनाना सुनिश्चित करता है। ज्ञान अर्थात् जाग्रति। ज्ञान से प्रेरित अंतर्निहित मूल्य ही जागरूकता के कारक हैं। प्रगति के निहितार्थ मानव मूल्यों की संचेतना आवश्यक दिखाई देती है। यह जागरूकता व्यक्ति एवं समाज को प्रबुद्ध एवं गतिमान करती है। साथ ही, नीतिगत तत्वों को विस्तारित कर अच्छाई की ओर अग्रसारित करती है। कुप्रथाओं, अनैतिक विचारों, गलत मान्यताओं के प्रति हीन दृष्टिकोण निर्मित कर वैचारिक समृद्धि का कारक बनती है। ज्ञान समाज को स्वस्थ, सकारात्मक तथा आशावादी बनाकर उसमें जीवंतता का संचार करता है। सुख- शांति का अधिगम करने की दृष्टि से भी यह अतीव प्रभावकारी अनुभूत होता है। अतः ज्ञान की सर्वत्र उपादेयता सर्वज्ञात बिंदु है।

ज्ञानार्जन एक सांस्कृतिक अवधारणा है। सभ्यता के विकास में ज्ञान का सर्वाधिक योगदान रहा है। ज्ञान के प्रभाव में सद्भाव, समरसता, समावेश जैसे सद्गुण पनप सकते हैं। ज्ञान परिवेश में सामंजस्य स्थापित करने में भी सहायता कर सकता है। ज्ञानालोक में पारस्परिक सौहार्द एवं सर्व समायोजन का संवर्द्धन हो सकता है। यह दृष्टिकोण को व्यापक बनाकर समावेशी वातावरण को बढ़ावा दे सकता है। इसमें व्यवधानों से जूझने की क्षमता होती है। यही वैयक्तिक/ सामाजिक स्तर पर जटिल संदर्भों का समाधान देता है। प्रकाश ही विसंगतियों को निराकृत करने एवं उज्ज्वल भविष्य का सृजन करने की दिशा में आशान्वित करता है।  ज्ञान में सामाजिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने की योग्यता है।



   

ज्ञान- प्रकाश के सुप्रभाव में मानवीय गुण पल्लवित होते हैं। फलतः जीवन को प्रकाशमय बनाने के लिए उपदिष्ट किया गया कि-  
तन्तुं तन्विहि रजसो भानुमन्विहि ज्योतिष्मतः पथो रक्ष धिया कृतान्।  
अनुल्बणं वयत जोगुवामपो मनुर्भव जनया दैव्यं जनम्।। ऋग्वेद/10/53/6

उक्त मंत्र में ‘भानुमन्विहि’ अर्थात् ‘सूर्य का अनुगमन करो’ यह प्रेरणा दी गई। सूर्य अंधकार का समूल उच्छेदन कर सकल जगत को नव प्रकाश- नव चेतना को भर देता है। सूर्य का प्रकाश मन- मस्तिष्क को ऊर्जावान बनाता है। सूर्य ज्योतिपुंज है। वस्तुतः जीवन ज्योति है। मरण अंधकार है। सूर्य मनुष्य को अनुप्राणित करता है कि अंधकार को छोड़कर प्रकाश की ओर बढ़ो। ज्ञान से चरित्र का निर्माण होता है। जीवन को सार्थकता से लाभान्वित कराने वाले इस तत्व का सतत और सर्वत्र प्रयोग वांछित है। इसमें कोई संदेह नहीं कि जीवन पर्यंत ज्ञान की उपादेयता होती है। स्मरणीय है कि इसके अभाव में जीवन अर्थहीन हो सकता है। कहा भी गया है कि तस्कर द्वारा रत्नों की तरह ही शरीरस्थ कामादि विकारों द्वारा ज्ञान का हरण हो सकता है। अतएव इस गहन विषय के प्रति सजगता अतीव आवश्यक है-

कामः क्रोधश्च लोभश्च देहे तिष्ठन्ति तस्कराः। ज्ञानरत्नापहाराय तस्माज्जाग्रत जाग्रत।।

प्रकाश जाग्रति का प्रतिनिधित्व करता है। प्रकाश में सब कुछ स्पष्ट दिखता है। यहां लेशमात्र भ्रम नहीं होता। संशय का कोई स्थान नहीं होता। यह वस्तुओं की बोधगम्यता को सहज और संभव बनाता है। यही नहीं, अंधकार जनित चुनौतियों से निपटने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह समाज- सौंदर्य के मूलभूत तत्वों के संदर्भ में सजग बनाता है, मानवीय गुणों के ह्रास से सावधान करता है।

अंधकार मोह अथवा अज्ञान का प्रतीक है। अंधकार के कारण दर्शन शक्ति क्षीण हो जाती है। दर्शन शक्ति की क्षीणता के कारण दोष दर्शन संभव नहीं हो पाता। ऐसे में, ज्ञान का बाधित होना अस्वाभाविक नहीं। अंधकार निराशा- अवसाद को भी व्यंजित करता है। जीवन अंधकार में निष्प्राण और निष्पन्द अनुभव करता है। अंधकार अर्थात् अज्ञान मनस् तत्व को भ्रमित करता है, निर्मलता को प्रभावित करता है। अंधकार के अस्तित्व को अन्याय और अनीति से भी जोड़कर देखा जाता है। अंधकार कालुष्य को भी दर्शाता है। यह विसंगतियों से घिरे लोगों के प्रति संवेदनहीनता की ओर इंगित करता है।  

अंधकार को परास्त कर तथा ज्ञान से प्रकाशित कर जीवन को नगण्य होने से बचाया जा सकता है। यही शिक्षा जीवन की अर्थवत्ता में कार्य करती है। अज्ञान, अहंकार आदि विकृतियों से अंधकारित जनजीवन को आलोकित करने की प्रेरणा है यहां। निस्संदेह, अज्ञान को निरस्त कर सुख- शांति और संतोष की सुखद परिणति संभव है।

जीवनदायिनी उषा तम को विनष्ट कर प्रकाशोद्गम से गतिशीलता के लिए प्रेरित करती है। यहां तमस् का कोई स्थान नहीं, निराशा का कोई भाव नहीं। यही जीवन का नव प्रभात है। ज्योति का सुखद तथा पावन संस्पर्श पाकर जीव नव चैतन्य से कृतार्थ होता है। उठो, अंधकार नष्ट हो रहा है। प्रकाश फैल रहा है। उषा ने सूर्य के भ्रमण के लिए मार्ग खोल दिया है-  
उदीर्ध्वं जीवो असुर्न आगादय प्रागात्तम आ ज्योतिरेति।  
आरैक्पन्थां यातवे सूर्यायागन्म यत्र प्रतिरन्त आयुः।। ऋग्वेद/1/113/16

जैसे सूर्योदय से अंधकार नष्ट हो जाता है वैसे ही ब्रह्मज्ञान के प्राप्त हो जाने पर समस्त दुःख नष्ट हो जाते हैं। अज्ञान का अंधेरा दूर होने पर ही आध्यात्मिक ज्ञान का प्रकाश विस्तारित हो सकता है। इस तथ्य के दृष्टिगत जागतिक व्यामोह से संलिप्त व्यक्ति को अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ने के लिए प्रेरित किया गया। ज्योति र्वृणीत तमसो विजानन्।ऋग्वेद/3/39/7

अज्ञान नामरुपात्मक जगत् और सुख-दुःखरूप प्रपंच को उत्पन्न करता है। वस्तुतः अन्तःज्योति ही सर्वव्यापी शक्ति को यथार्थतः जानने समझने का माध्यम बनती है। ज्ञान ही सर्वोच्च तत्व के स्वरूप को प्रकाशित करता है। अज्ञान का विनाश होने पर ही बुद्धि से परे परम तत्व का साक्षात्कार किया जा सकता है- ज्योतिषा बाधते तमः। यजुर्वेद/33/92

सद्वृत्तियों के माध्यम से वैयक्तिक/ सामाजिक अभ्युत्थान को केंद्रित करने का भी दूरदर्शी ध्येय है। कुत्सित विचारों- कृत्यों के परित्याग तथा मानवोचित आचरण को मान्यता देने के पीछे अनुशासित परिवेश के सृजन का उच्चतम लक्ष्य दिखाई देता है। सत्य की स्वानुभूति ही ज्ञान है। यह आत्म जागरण ही पारमार्थिक यात्रा को साभिप्राय बनाता है। इस दृष्टि से इस जगत रूप रात्रि में योगी लोग जागते हैं। जो परमार्थी हैं- भोग विलास से मुक्त हैं, वे प्रपंच अर्थात् मायिक जगत् से छूटे हुए हैं-   
जानिअ तबहिं जीव जग जागा,  
जब सब बिषय बिलास बिरागा।।(रामचरितमानस/अयोध्या काण्ड/2)

एतदर्थ वैदिक संदेश है कि अज्ञान रूपी अंधकार का नाश कर ज्ञान रूपी प्रकाश की ओर बढ़ो- आरोह तमसो ज्योतिः।  
अंधकार बुद्धि- विवेक पर आवरण डाल देता है। जीवन में शांति और पूर्णता की प्राप्ति के लिए मोह अथवा भ्रम को दूर करना आवश्यक है। आत्मानुशासन, आत्म जाग्रति व आध्यात्मिक उन्नति द्वारा आत्मोन्नति में अवरोध डालने वाले तत्वों से स्वयं को दूर रखना उचित है।  निष्कर्षतः मनुष्य द्वारा सद्ज्ञान तथा सत्संकल्प से मनोविकृतियों को नष्ट कर श्रेय मार्ग पर चलते हुए लक्ष्य सिद्धि के लिए प्रयत्नशीलता अपेक्षित है। ज्ञान सतत और सर्वत्र लोकहित में कार्य करता  है, इस तथ्य के लक्ष्यगत वैदिक साहित्य ज्ञान- पथ निर्दिष्ट करता है।

लेखिका - प्रो. कनक रानी जी, शाहजहाँपुर 



   

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