Bhartiya Parmapara

भक्ति का सच्चा अर्थ: मंदिरों से आगे, मानवता की ओर

धर्म के निहितार्थ 

मंदिर की घंटियों की मधुर गूंज जब किसी नगर की सुबह का आलोक बन जाती है तो लगता है जैसे मनुष्य ने अपनी आत्मा को ईश्वर से जोड़कर जीवन की पहली सांस ली हो। किन्तु, यही नगर जब सामूहिक प्रार्थना की गूंज से भर जाता है और उसी गूंज के बीच किसी भूखे बच्चे का रुदन, किसी मजदूर की हांफती कराह, या किसी दलित की टूटी हुई पुकार सुनाई नहीं देती, तब प्रश्न उठता है कि हमारी भक्ति की दिशा क्या केवल पत्थर की मूर्तियों की ओर है या जीवित मनुष्यों की ओर भी मुड़ती है।

भारत का इतिहास ऐसा है कि हमने वृक्षों में देवत्व खोजा, नदियों को मां कहा, पर्वतों को पूज्य माना, अग्नि और सूर्य को आराध्य स्वीकारा। यह हमारी संस्कृति का उज्ज्वल पक्ष है। किंतु यही परंपरा जब मानव के भीतर के देवत्व को भूल जाती है तो वह विकृति बन जाती है। इस विडंबना का सबसे तीखा रूप हमें समाज में स्त्रियों की स्थिति देखकर मिलता है। देवी के रूप में पूजित नारी, जब धरती पर बेटी बनकर आती है, तो उसकी कद्र आधी रह जाती है। यह विरोधाभास हमारे ही घर आंगन में पलता है।

मनुष्य की गरिमा का सबसे बड़ा पैमाना यह होना चाहिए कि वह अपने बराबर वाले मनुष्य के प्रति कितना आदर रखता है। परंतु यहाँ तो   
जाति के नाम पर, लिंग के नाम पर, धन और वंश के नाम पर ऊंच-नीच की दीवारें खड़ी कर दी गई हैं।   
पूजा का दीपक मंदिर की देहरी पर तो जलता है, किंतु घर के भीतर बहू की आंखों में अक्सर वही दीपक बुझा-बुझा सा दिखता है।   
नदियों के घाट पर हम कलश चढ़ाते हैं, लेकिन उन्हीं नदियों को गंदगी से भरने में कोई संकोच नहीं करते।  
पर्वतों को प्रणाम करते हैं और उनके सीने को विस्फोटों से छलनी कर डालते हैं।   
प्रकृति से लेकर मनुष्य तक, हम जिसे पूजते हैं उसे ही आहत भी करते हैं।

ऐसा लगता है मानो हमारे भीतर एक दोहरा व्यक्तित्व बसा हुआ है। एक ओर हम प्रार्थना में गला भर लेते हैं, दूसरी ओर पास बैठे इंसान की पीड़ा को अनसुना कर देते हैं। यह विरोधाभास हमारी सभ्यता की सबसे बड़ी चुनौती है। अगर पूजा केवल अनुष्ठान बनकर रह जाए, और जीवन के आचरण में न उतर पाए, तो उसका अर्थ खो जाता है।  
सच्ची भक्ति वही है जिसमें हम वृक्ष में तो देवत्व देखें ही, साथ ही उस छांव में बैठने वाले थके मजदूर की गरिमा भी पहचानें। नदी को मां कहें तो उसके तट पर जल पीते बच्चे की प्यास भी मिटाएं। स्त्री को देवी कहें तो उसे मनुष्य के रूप में बराबर हक और सम्मान भी दें। यही वह संगति है जिसमें पूजा और व्यवहार एक हो जाते हैं।

दरअसल, धर्म का सौंदर्य तब प्रकट होता है जब वह मंदिर से निकलकर जीवन की गलियों में उतरे, जब वह आरती के साथ-साथ आचरण में भी झलके। यही हमारे समय की सबसे बड़ी जरूरत है। वरना कहीं ऐसा न हो कि हमारी सभ्यता की ध्वनि केवल घंटियों तक सीमित रह जाए और उसके पार का मौन हमें शर्मसार करता रहे।

लेखक - विवेक रंजन श्रीवास्तव जी, भोपाल 



   

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