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जगदगुरु स्वामी माधवाश्रम जी | आध्यात्मिक जीवन और दर्शन


परिचय- जगतगुरु शंकराचार्य माधवाश्रम जी महाराज 


साहित्य, संगीत, ज्ञान, विज्ञान, अनुसंधान के साथ साथ अध्यात्म के साथ भी उत्तराखंड के छोटे से जिले रुद्रप्रयाग का गहरा नाता है।

इतिहास के पन्नों को टटोले तो पता चलता है कि इस जनपद के अलकनंदा व मन्दाकिनी के संगम स्थल पर त्रेता युग में भगवान शंकर ने महर्षि नारद को संगीत की शिक्षा दी तो इसी जनपद के “त्रियुगीनारायण मंदिर” में शिव पार्वती के विवाह होने का वर्णन मिलता है। बाणासुर नामक राजा की पुत्री उषा का विवाह श्रीकृष्ण के पौत्र अनिरुद्ध के साथ होने की साक्षी उखीमठ मन्दिर में अवस्थित विवाह वेदी आज भी विद्यमान है। इस विवाह का जिक्र  आज भी यहाँ मंदिर में गाये जाने वाले जागरों में होता है।   
सिनेमा के क्षेत्र में भटवाड़ी गांव की सुपुत्री हिन्दी फिल्मों में हिमानी शिवपुरी के नाम  
से मशहूर है। साहित्य के क्षेत्र में संस्कृत साहित्य के सर्वश्रेष्ठ कवि कालिदास भी इसी जनपद के कविल्ठा गांव के वासी रहे हैं। कालिदास के अलावा हिंदी के कालिदास कहे जाने वाले चन्द्रकुंवर बर्त्वाल इसी जनपद के मालकोटी गांव के निवासी थे। दक्षिण के परम पूज्य महर्षि अगस्त्य का उत्तर भारत में एकमात्र मन्दिर भी इसी जनपद के नाकोट गांव में है, जिसे अब अगस्त्य ऋषि के नाम से जाना जाता है।

ऐसे ही धर्म और अध्यात्म के क्षेत्र में भी एक हस्ती ने इस जनपद को गौरवान्वित किया, वो हस्ती रही हैं श्रृंगेरी पीठ के शंकराचार्य जगतगुरु माधवाश्रम जी महाराज।

  

इससे पहले कि हम माधवाश्रम जी के बारे में जानें, आइए पहले जान लेते हैं कि ये जगतगुरु की पदवी क्या है?

आज से लगभग ढाई हजार वर्ष पूर्व युधिष्ठिर संवत 2631(509B.C.) की बैशाख शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को जन्मे जगतगुरु आदि शंकराचार्य जी ने भारत के चारों दिशाओं में चार वैदिक पीठ स्थापित किये। 11 वर्ष की अवस्था में केदारनाथ-बद्रीनाथ आकर केदार-बद्री की पूजा कर सोलह भाष्यों की रचना की। इन वैदिक पीठों की स्थापना का उद्देश्य वेदों, जगतगुरू आचार्य परम्परा, सनातन धर्म और वेदों को सांस्कृतिक-वैचारिक युद्धों, विध्वंसकों, आक्रमणकारियों, आघातों से बचाकर सुरक्षित रखना था। उन्होंने हरेक पीठ को एक वेद प्रदान करते हुए, प्रत्येक पीठ के लिए उसके कर्तव्य, उद्देश्य और उत्तरदायित्व भी निर्धारित कर दिये।

भारत के चारों दिशाओं में स्थापित इन पीठों में से उत्तर दिशा में श्री ज्योतिर्मठ बद्रीनाथ को अथर्ववेद प्रदान करते हुए इसे "अथर्ववैदिय उत्तरान्माय श्री ज्योतिर्मठ कहा जाता है। इसी प्रकार पश्चिम दिशा में श्री शारदा मठ (कालिका मठ) द्वारका, गुजरात में स्थापित करते हुए सामवेद प्रदान किया। दक्षिण दिशा में श्रृंगेरी मठ की स्थापना श्रृंगेरी कर्नाटक में करते हुए यजुर्वेद प्रदान किया। पूर्व दिशा में पुरी (उड़ीसा) में गोवर्धन मठ स्थापित करते हुए इसे ऋग्वेद प्रदान किया।

आदि गुरु शंकराचार्य द्वारा स्थापित सतानत धर्म के इन 4 पीठों  में प्रमुख ज्योतिष्पीठ के पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य की परम्परा को आगे बढ़ाने वाले धर्मधुरंधर तथा उदभट विद्वान स्वामी माधवाश्रम जी का जन्म उत्तराखंड प्रदेश केदारनाथ राष्ट्रीय राजमार्ग पर अगस्त्यमुनि के नजदीक गाँव बेंजी में 26 अगस्त 1944 को हुआ। भगवान नरसिंह के आराध्य एवं कर्मकाण्ड तथा ज्योतिष पिता रविदत्त बेंजवाल और गृहिणी माता श्रीमती झाँपली देवी के घर जन्मे बालक का नाम केशवानन्द रखा गया।  प्रारंभिक शिक्षा गाँव में ही प्राप्त की। कक्षा 6 से 8 तक की शिक्षा पब्लिक हाई स्कूल अगस्त्यमुनि में हुई। इसके बाद की शिक्षा उन्होंने संस्कृत पाठशाला मयकोटी और हरिद्वार से ली। आगे अम्बाला के सनातन धर्म संस्कृत कॉलेज में गये। वृंदावन के वंशीवट में श्री प्रभुदत्त ब्रह्मचारी जी के आश्रम एवं वाराणसी समेत देश के विभिन्न स्थानों पर वेदों एवं धर्मशास्त्र की दीक्षा ली।

इधर गाँव में पिता ने गृहस्थाश्रम में प्रवेश कराया लेकिन ज्ञान के लिए वैराग्य की भावना के बलवती होने के कारण गृहस्थ भी केशवानन्द को नहीं बांध पाया।  हिमाचल प्रदेश स्थित कंडाघाट में साधना लीन होकर पाँच वर्षों की तपस्या में आध्यात्मिक एवं चमत्कारिक अनुभवों को आत्मसात करके स्वामी जी ने श्रीमद्भागवत के पारायण एवं कथा वाचन को सनातन धर्म प्रचार का मार्ग चुना।

21 वर्ष की आयु में स्यूंड गाँव में श्रीमद् भागवत की कथा कर 22वें वर्ष में श्रीमद्भागवत का 108 बार निरंतर पाठ करने के बाद स्वामी करपात्री जी ने इस विलक्षण विद्वान को "शुकदेव" की उपाधि से विभूषित किया। उनकी विद्वता की चर्चा विद्वत परिषद, धर्मसंघ और देश में होने लगी। यमुना के तट, पक्के घाट, बागपत- उ.प्र. जाकर शंकराचार्य ज्योतिषपीठाधीश्वर स्वामी कृष्ण बोधाश्रम महाराज के सानिध्य में मंत्र दीक्षा लेकर स्वामी बने। गुरु के आदेश पर शुक्रताल दंडी आश्रम जाकर 108 अखंड भागवत मूल पारायण किये। जगद्गुरू जी ने सन्यास दीक्षा देकर दण्ड ग्रहण कराया और दण्डी स्वामी माधवाश्रम महाराज नाम दिया। 27 नवंबर 1993 को शंकराचार्य निरंजन देव तीर्थ की अध्यक्षता में काशी विद्वत परिषद, धर्म संघ और भारत के मूर्धन्य विद्वानों द्वारा स्वामी कृष्ण बोधाश्रम जी के शिष्य स्वामी माधवाश्रम जी को ज्योतिष्पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य के पद पर प्रतिष्ठित किया।

24 वर्षों तक धर्म की रक्षा और सनातन परम्पराओं, रोटी, बेटी, चोटी सूत्र का प्रतिपादन करते हुए गौ, गंगा, हिमालय संवर्धन, गोवध निषेध की रक्षा करते हुए  18 संस्कृत महाविद्यालयों की स्थापना, जिनमें से 4 नेपाल में हैं, के साथ कई मंदिरों, औषधालयों, चिकित्सालयों की स्थापना और जीर्णोद्धार के साथ साथ निर्धन बालकों की शिक्षा हेतु आधुनिक विद्यालयों की स्थापना की।   
अप्रैल 2000 में स्वामी माधवाश्रम जी ने उत्तराखंड की आध्यात्मिक, बौद्धिक, एवं पर्यावरणीय संपदा से परिचय कराने के लिए देश के श्रेष्ठ आचार्यों, विद्वतजनों और विदुषी महिलाओं को रुद्रप्रयाग के कोटेश्वर तीर्थ में आमन्त्रित कर अष्टादश पुराण व एकादश कुंडीय रुद्र महायज्ञ का आयोजन करवाया। उनके गृह जनपद के इसी तीर्थ स्थल में एक बड़ा अस्पताल माधवाश्रम अस्पताल के नाम से अब उनकी याद में सरकारी अस्पताल बनने की ओर अग्रसर है। स्वामी माधवाश्रम जी ने कहा गोवर्धन पूजा के पावन पर्व के दिन 20 अक्टूबर 2017 को 73 वर्ष की उम्र में देह त्याग किया। 21 अक्टूबर को उनकी पार्थिव देह को मायाकुंड ऋषिकेश स्थित दांडी वाड़ा श्री जनार्दन आश्रम में भू समाधि दी गई। इस भू समाधि की एक यादगार बात यह रही कि उनके इस परिनिर्वाण में उनके वंशज और अगस्त्यमुनि के विभिन्न सामाजिक और सांस्कृतिक आयोजनों में बढ़चढ़ कर प्रतिभाग करने वाले दस्तक के संपादक, संस्कृति प्रकाशन के स्वामी, युवा इतिहासकार व सामाजिक कार्यकर्ता दीपक बेंजवाल द्वारा माधवाश्रम जी की जन्मभूमि की मुट्ठी भर मिट्टी उनकी समाधि को समर्पित कर, उनके पारिवारिक जन के रूप में श्रद्धांजलि दी।

लेखक - हेमंत चौकियाल जी, रुद्रप्रयाग (उत्तराखंड)  

  

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