प्रदक्षिणा
हम मंदिर में कहीं भी जाते हैं तो प्रदक्षिणा जरूर करते हैं। यह प्रदक्षिणा क्यों की जाती है क्योंकि जब हम ईश्वर के आस-पास परिक्रमा करते हैं तो हमारी तरफ ईश्वर (प्रत्यक्षतः प्राकृतीय) की सकारात्मक शक्ति आकृष्ट होती है और जीवन की नकारात्मकता घटती है।
कई बार हम स्वयं के इर्द गिर्द ही प्रदक्षिणा कर लेते हैं इससे भी ईश्वरीय शक्ति आकृष्ट होती है इसलिए प्रदक्षिणा करते समय यह मंत्र बोला जाता है-
"यनि कानिक च पापानि,
जन्मान्तर कृतानि च।
तानी तानी विनयशन्ति,
प्रदक्षिणा पदे-पदे ।।”
प्राण प्रतिष्ठित ईश्वरीय प्रतिमा की, पवित्र वृक्ष की, यज्ञ या हवन कुंड की परिक्रमा की जाती है। जिससे उसकी सकारात्मक शक्ति हमारी तरफ आकृष्ट होती है। सूर्य को देखकर हम अपने इर्द-गिर्द घूम लेते हैं, क्योंकि -
1. हर गोल घूमने वाली वस्तु के घूमने से आकर्षण शक्ति उत्पन्न होती है।
2. इस ब्रह्मांड में सभी ग्रह सूर्य की प्रदक्षिणा कर रहे हैं जिससे उनमें आकर्षण शक्ति उत्पन्न होती है।
3. पृथ्वी और सभी ग्रह अपने इर्द-गिर्द ही प्रदक्षिणा कर रहे हैं। (परिभ्रमण/घूर्णन)
4. जब हम अपने हाथ में पानी की बाल्टी का पानी लेकर गोल-गोल घूमते हैं तो बाल्टी का पानी गिरता नहीं है। इसी तरह पृथ्वी घूम रही है तो उस पर स्थित भी जड़ पदार्थ गिरते नहीं है। (अभिकेन्द्र बल - अप केन्द्र बल)
5. हर अणु में भी इलेक्ट्रॉन प्रदक्षिणा कर रहे हैं।
6. छाछ से मक्खन निकालते समय भी उसे गोल-गोल घुमाने से उसमें ब्रह्माण्ड में मौजूद शक्ति आकर्षित होती है। (अभिकेन्द्र -उपकेन्द्र)
इस शक्ति को अनुभव करने के लिए हमें गेंद को हाथ में पकड़ कर, हाथों को कंधों तक उठाकर उन्हें घुमाएं जैसे डमरू बजा रहे हो। थोड़ी ही देर में अंगुलियों में भारीपन महसूस होगा।
यही ब्रह्नाण्ड से आकर्षित शक्ति का अनुभव है अब हल्की सी ताली बजाकर इसे अपने अन्दर समाहित कर लें।

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