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ॐ का वैज्ञानिक महत्व: भारतीय संस्कृति में छिपे रहस्यों की वैज्ञानिक व्याख्या

भारतीय संस्कृति में निहित वैज्ञानिक तथ्य एवं उनकी व्याख्या –

ॐ का प्रयोग करना

भारतीय संस्कृति में प्राचीन ऋषि मुनियों द्वारा ॐ का प्रयोग किया जाता था, आज भी ॐ का प्रयोग किया जाता है। ॐ के प्रयोग का हमारे जीवन में क्या महत्व है? इसका प्रयोग क्यों किया जाता है? इसके पीछे वैज्ञानिकता क्या है? अनेक प्रश्न हमारे सामने है ?

ॐ का प्रयोग एक साधना में करते हैं। भगवान के नाम के पूर्व हम ॐ का प्रयोग करते है, यथा ॐ नमः शिवाय। ॐ गणपतये नमः। ॐ माँ सरस्वत्यै नमः। शुभ कार्य करने से पहले हम ॐ का उपयोग करते हैं। प्रश्न यह उठता है कि हम ॐ शब्द का प्रयोग क्यों करते हैं? क्या ॐ शब्द की महिमा का कोई वैज्ञानिक आधार है? क्या इसका उच्चारण करने से संसार सागर में कुछ लाभ भी है?

   

ॐ के प्रभावों का अध्ययन प्रोफेसर जे.मार्गन और उनके सहयोगियों ने 7 वर्ष तक किया। अध्ययन के दौरान उन्होंने मस्तिष्क और ह्रदय की विभिन्न बीमारियों से पीड़ित 2500 पुरूषों एवं 200 महिलाओं का परीक्षण किया। इन्होंने लोगों को भी शामिल किया जो बीमारी की अन्तिम अवस्था में थे। उनको केवल इसी दौरान वे दवाईयाँ दी गई जो उनके जीवन को बचाने के लिए आवश्यक थी। शेष सभी दवाइयां बंद कर दी गई। इन सभी को प्रातः काल साफ एवं स्वच्छ वातावरण में प्रतिदिन एक घण्टा ॐ का जाप कराया गया। ॐ का जप उनके विभिन्न मन्त्रों के माध्यम से कराया गया। हर तीन माह बाद उनकी जाँच करवाई जाती। चार साल तक जांच के बाद जो परिणाम सामने आए वह आश्चर्यजनक थे। 70 पुरुष और 85 महिलाओं में ॐ का जाप प्रारम्भ करने से पूर्व बीमारियों की जो स्थिति थी वह 90% कम पाई गई। कुछ लोगों पर मात्र 20% असर हुआ परन्तु इसका कारण प्रोफेसर मार्गन ने बताया कि वे अंतिम स्टेज पर थे। ॐ के जाप द्वारा नशा मुक्ति भी की जा सकती है। इसका प्रयोग जीवन में उतार कर मनुष्य जीवन भर स्वस्थ रह सकता है। ॐ को लेकर प्रोफेसर मार्गन कहते हैं कि शोध में यह तथ्य पाया गया है कि ॐ का जाप अलग-अलग आवृतियों और ध्वनियों से दिल और दिमाग के रोगियों के लिए अत्यधिक प्रभावी है। गौर करने लायक तथ्य यह है कि मनुष्य जब ॐ का जाप करता है तो यह ध्वनि जुबां से न निकलकर पेट से निकलती है। यही नहीं ॐ का उच्चारण पेट, सीने और मस्तिष्क में कंपन भी पैदा करता है। विभिन्न आवृतियों (तरंगों) और ॐ ध्वनि के उतार चढ़ाव से पैदा होने वाली कंपन क्रिया से मृत कोशिकाओं को पुनर्जीवित कर देता है तथा नई कोशिकाओं का निर्माण करता है। रक्त विकार पैदा नहीं होता है।

आयुर्वेद में भी ॐ के चमत्कारिक प्रयोगों का वर्णन किया गया है। हावर्ड विश्वविद्यालय के प्रोफेसर हरबर्ट बेन्सन ने अपने शोध के बाद ॐ के वैज्ञानिक आधार को स्पष्ट किया है। प्रार्थना और ॐ शब्द के उच्चारण से प्राण घातक बीमारी एड्स के लक्षणों में राहत मिलती है एवं बांझपन के उपचार में दवा का काम करता है । इसके प्रयोग से सभी रोगों में फायदा एवं दुष्कर्मों के संस्कारों का शमन होता है।

ॐ के उच्चारण के शारीरिक लाभ - 


1. प्राणायाम के साथ प्रयोग करने से फेफड़े मजबूत होकर श्वसन क्रिया सामान्य रहती है।    
2. ॐ का उच्चारण करने से नींद आसानी से आ जाती है।   
3. इससे पाचन शक्ति में बढ़ोतरी होती है।   
4. यह शरीर में तनाव बढ़ाने वाले तत्वों को दूर करता है।   
5. यह ह्रदय और खून के प्रवाह को संतुलित रखता है।   
6. घबराहट और अधीरता में ॐ का प्रयोग अमृत से बढ़कर है।   
7. ॐ के उच्चारण से शरीर में स्फूर्ति का संचार होता है।

भारतीय संस्कृति के मतानुसार ॐ की चमत्कारिक ध्वनि का उच्चारण यदि मनुष्य श्रद्धा भक्ति के साथ करे तो अपने जीवन के प्रत्येक लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है।

ॐ की वैज्ञानिक महत्ता खगोल वैज्ञानिकों ने प्रमाणित किया है कि हमारे अंतरिक्ष में पृथ्वी मण्डल, सौर मंडल, ग्रह मंडल एवं आकाशगंगाएं ब्रह्यण्ड के निरन्तर चक्कर लगा रही हैं। ये सभी आकाश पिण्ड कई हजार मील प्रति सेकंड की गति से अनंत की ओर भागे जा रहे हैं। जिससे लगातार एक ध्वनि और कंपन उत्पन्न हो रहा है। इसी ध्वनि को हमारे ऋषि मुनियों ने अपने ध्यान में सुना। वह ध्वनि लगातार अपने शरीर के अंदर और बाहर सुनाई देती रहती है। वह ध्वनि निरंतर जारी है इसे सुनते रहने से मन और आत्मा को असीम शांति का अनुभव होता है। इस ध्वनि को हमारे ऋषि मुनियों ने ब्रह्मानंद एवं ॐ का नाम दिया। अर्थात अन्तरिक्ष में सुनाई देने वाली आवाज या मधुर गीत है। अनादि काल से अनंत काल तक ब्रह्माण्ड में व्याप्त है। ॐ की ध्वनि का नाद ब्रह्माण्ड में प्रकृति ऊर्जा के रूप में फैला हुआ है। जब हम अपने मुख से एक ही सांस में ॐ का उच्चारण मस्तिष्क ध्वनि अनुनाद तकनीक से करते हैं तो मानव शरीर को अनेक लाभ होते हैं और मानव असीम सुख शांति व आनन्द की अनुभूति करता है।

यही देन है हमारी भारतीय संस्कृति की जो हमेशा मानव कल्याण के विषय में सोचती रहती है।

लेखक - डॉ. दिनेश कुमार गुप्ता जी, प्रवक्ता, अग्रवाल महिला शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालय, गंगापुर सिटी, (राज.)

 

  

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