Bhartiya Parmapara

नारी का सम्मान और सामाजिक योगदान

"यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रमंते तत्र देवता"


नारी शक्ति के आगे देवता भी नतमस्तक हुए है। शक्ति स्वरूपा मां दुर्गा, ज्ञान बरसाती मां सरस्वती, धन-धान्य की समृद्धि देती मां लक्ष्मी, और भंडार को भरा पूरा रखती मां अन्नपूर्णा। जीवनावश्यक सभी जरूरतों का साम्राज्य नारी के हाथो हैं।

नारी केवल भोग की वस्तु नहीं हैं। वह उत्तम योग की स्थली है जो गृहिणी बन संचालन करती है। हमारा घर ही साधना स्थली होता है जहां माताओं की गोद में राम, कृष्ण, गौतम, कपिल, शिवा, प्रताप जैसे अनेक सितारों के शील को माताओं ने संस्कारों से निखारा है इस बात का इतिहास भी गवां है।

मातृ देवो भव कह कर मातृशक्ति को गुरु और पिता से पूर्व स्थान दिया जाता है क्योंकि नारियों का त्याग और समर्पण भाव देखा जाए तो वाकई में वह पूजनीय है। अबला तेरी यही कहानी आँचल में दूध आंखों में पानी... यह बातें अब अतीत बन चुकी है। आज की नारी के लिए कहना होगा..."सबला तुम्हारी यही पहचान आंखों में सपने.. और आंचल में ज्ञान।"

वर्तमान दौर में नारियों के चूड़ियों की खनक और पायल की झंकार अंतरिक्ष तक जा पहुंची हैं। आज हर क्षेत्र में अपने उपस्थिति की रुनझुन मौजूद कर नारियों ने बड़ी कुशलता से अपनी बुद्धिमत्ता का परचम लहराया हैं जिसके आगे दुनिया नतमस्तक हैं। जिस तरह शरीर में रीढ़ की हड्डी का स्थान महत्वपूर्ण होता है उसी प्रकार परिवार, समाज और देश कल्याण में नारी की अहम भूमिका है अपने आप में नारी का व्यक्तित्व महत्वपूर्ण है फिर क्यों वह व्यर्थ नर से बराबरी करने की होड में लगी है...।  

शरीर संरचना और कार्यकुशलता के आधार पर नारी के हिस्से अधिक जिम्मेदारियां आती है ईश्वर ने यह कार्य का विभाजन नारी की बुद्धिमत्ता को ध्यान में रखकर, उसकी निपुणता के आधार पर ही किया है इसलिए नर नारी समानता की होड़ में ना उलझे तो बेहतर होगा। नारियों को अपने हित और कल्याण के लिए लक्ष्य निर्धारित करने होंगे। सफलता के सुमनों को खिलने के लिए सुविधाओं का बाग जरूरी नहीं वह तो मेहनत की मरुस्थली में भी खिल सकता हैं। हर नारी को अपने भीतर स्थित कला को संवारना होगा और अपनी स्वतंत्र पहचान बनाने के साथ ही अपने अस्तित्व को नया आयाम देना होगा जिस से उसके भीतर आत्म संतुष्टि की भावना देदीप्यमान होगी।

  

मां की गोद में हंसता खेलता शिशु विश्व की सर्वोत्कृष्ट कलाकृती हैं। नारी पत्नी के रूप में पति का हृदय तत्व उसकी प्राण शक्ति हैं, भाई की चेतना शक्ति, माता के रूप में पुरुष की निर्माण शक्ति हैं जो हाथ पलना झूलाता है। वह विश्व पर शासन करने का सामर्थ्य भी रख सकता हैं तो फिर कहा परवरिश में कमी आ रही है, जो आज सम्पूर्ण देश में बलात्कार की घटनाएं हो रही हैं उसे कोई शिक्षा व्यवस्था, ना ही कानून व्यवस्था रोक पा रही हैं। यह अत्यंत निंदनीय है क्या अब माताएं अपने बच्चों को संस्कारों से वंचित रख रही है, कहीं तो कोई कमी आ रहीं है जो युवा ऐसे शर्मसार कृत्य कर माताओं की कोख को‌ लज्जित कर रहे हैं,  ऐसी घटनाएं पीड़िता के साथ ही मातृशक्ति को भी अपमानित करती है।

अब बहनों को लक्ष्य साधना होगा, वह अपने संतति को सुयोग्य राह पर चलाने के लिए प्रेरक बने, उन्हें संस्कारों से सींचे। नारी के सम्मान का बीजारोपण बचपन से ही सिंचित करें एवं समाज, राष्ट्र को एक अच्छा नागरिक सौंपने का कार्य करे, यहीं सर्वोत्तम राष्ट्र सेवा होगी और यहीं सच्ची ईश्वर भक्ति होगी।

हमारा घर आंगन किसी बड़े देवालय से कमतर नहीं... यह अत्यंत पवित्र हैं, यहां गुनाह के पौधे पनपने ना पाए यह ध्यान मातृशक्ति को रखना होगा।

"धरा पर साक्षात प्रेम का अवतार हूं  
तपती गर्मी में शीतल पवन का झोंका हूं  
कांटों भरी राह में फूलों का अहसास हूं  
नीत सरिता सी बहती हूं, हां मैं नारी हूं।"

  

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