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पहली तूलिका, पहली कहानी: भारत के प्रागैतिहासिक शैल चित्रों का अद्भुत संसार

पहली तूलिका पहला प्रसंग 

पहली तूलिका, पहली कहानी- प्रागैतिहासिक शैल चित्रों का संसाार

भारत की शैल चित्रकला अपने आप में अनूठी है। यह प्रागैतिहासिक काल से ही मानवीय मनो भावों को प्रकट करने का माध्यम रही है। मध्य प्रदेश के भीमबेटका शैलाश्रयों से लेकर महाराष्ट्र, उत्तराखंड और तेलंगाना तक, यह शैल चित्रकला हमें हजाारों वर्ष पुरानी मानव सभ्यता की कहानियाँ सुनाती है।

इनमें से मध्य प्रदेश के रायसेन जिले में स्थित भीमबेटका शैलाश्रयों को वर्ष 2003 में यूनेस्को विश्‍व धरोहर स्थल घोषित किया गया था। यहाँ पर 700 से अधिक शैलाश्रय हैं, जिनमें से 400 से अधिक पर चित्रकारी की हुई है। यहाँ से प्राप्‍त चित्रकला मध्य-पाषाण काल से लेकर ऐतिहासिक काल तक की है‚ जो दर्शाती है कि मानव समाज किस प्रकार शिकारी जीवन से कृषक और फिर योद्धा समाज की ओर क्रमिक रूप से बढ़ा।

भीमबेटका की सबसे पुरानी शैल चित्रकारियाँ लगभग 10,000 वर्ष पुरानी हैं। इन्हें तीन मुख्य रंगों—लाल, सफेद और हरे रंग से बनाया गया है। यहाँ के प्रारंभिक चित्रों में हाथी, हिरण, बैल इत्यादि बड़े जानवरों और शिकार के दृश्य हैं। बाद के चित्रों में नृत्य, उत्सव, सामाजिक समारोह, गर्भवती महिलाएँ, चावल बीनने वाले लोग आदि चित्रित हैं, जो समााज के विकास क्रम को दर्शाते हैं।

भीमबेटका के शैलााश्रयों की खोज 1957 में पुरातत्ववेत्ता विष्णु श्रीधर वाकणकर ने की थी। इन चित्रों को अँगुलियों लकड़ी की टहनी, ब्रश या मुँह से फूँककर बनाया गया प्रतीत होता है। भीमबेटका के अलावा उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले में सुयाल नदी के तट पर स्थित लखुडियार शैलाश्रय से भी प्रागैतिहासिक काल के चित्र मिले हैं। यहाँ के चित्र मुख्य रूप से सफेद, काले और लाल रंगों से बने हैं। यहाँ के चित्रों में सबसे आकर्षक एक सामूहिक नृत्य का चित्र है। अन्य चित्रों में एक लंबे थूथन वाला जानवर, एक लोमड़ी और कई रंग वाली छिपकली प्रमुख है। यहाँ की एक और विशेषता यह है कि यहाँ मानवीय आकृतियों को छड़ी के रूप में दिखाया गया है।

 

   

सामूहिक शिकार का दृश्य लखुडियार की शैल चित्रकारी में लोगों के समूह का दृश्य-

ये चित्र क्यों महत्वपूर्ण हैं?  
शैल चित्रों के माध्यम से हम इन चित्रों को बनाने वाले आदिमानव समुदायों की सभ्यता के बारे में जान पााते हैं। इसके साथ ही इन चित्रों में उस काल के मानव की धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियों की झलकियाँ भी मिलती है। अत: हम कह सकते हैं कि भारत की शैल चित्रकला सिर्फ दीवारों पर रंगों का चित्रांकन ही नहीं है, अपितु यह एक इतिहास है, जो मौन होकर भी बोलता है।  हमें अपनी इन धरोहरों की न सिर्फ सराहना करनी चाहिए, अपितु इनको सहेजना भी चाहिए।

इतिहास के विभिन्न पड़ाव -  
प्रागैतिहासिक काल या पाषाण काल- मानव इतिहास का वह प्राचीनतम कालखंड‚ जिसके अध्ययन के मात्र पुरातात्विक स्रोत उपलब्ध हैं‚ प्रागैतिहासिक काल अर्थात इतिहास से पहले का काल कहलाता है।

आद्य ऐतिहासिक काल- इतिहास का वह कालखंड‚ जिसके अध्ययन के पुरातात्विक स्रोतों के अलावा लिखित स्रोत भी उपलब्ध हैं, लेकिन वे अब तक भी पढ़े नहीं जा सके हैं‚ जैसे‚ भारत में सिंधु-सरस्वती सभ्यता का कालखंड।   
ऐतिहासिक काल- इतिहास का वह कालखंड‚ जिसके अध्ययन के पुरातात्विक और पढ़े जा सकने वाले लिखित स्रोत भी उपलब्ध हैं। भारत में 600 ईसा पूर्व से ऐतिहासिक कालखंड का प्रारंभ माना जाता है।

लेखक - डॉ. दिनेश कुमार गुप्ता जी, सहायक आचार्य, अग्रवाल महिला शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालय, गंगापुर सिटी (राजस्थान) 

                                               

                                                 

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