अयोध्या के रामलला ओरछा के राजाराम
नियत कार्यक्रम के अनुसार भोपाल से नवमी की पूजा करके प्रातः सात बजे हम दोनों और भाई साहब -भाभी ओरछा के लिए निकल गए। नाश्ता, भोजन सभी साथ था। प्राकृतिक सौंदर्य, इतिहास, धर्म और सांस्कृतिक धरोहर का साक्षात्कार कराने वाली यात्रा होगी - बहुत आनंद रहेगा, यह सोच हमको उल्लसित किए था।
सूरज अपनी किरणों के रंग बिखरते हुए पूरब की सीढ़ियाँ चढ़ रहा था। मैं हाथ जोड़कर खड़ी प्रार्थना कर रही थी- "सूर्यदेव, आपका पावन प्रकाश मन को आलोकित करते हुए हमें नई शक्ति, तेज और सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करें। सभी प्राकृतिक शक्तियाँ हमारी सुरक्षा और सहायता करें।“
हमारी कार अपने गंतव्य की ओर बढ़ रही थी। प्रभात बेला में नई ऊर्जा से भरी शीतल हवा, फूलों की सुगंध वातावरण में घोल रही थी। झूमते हुए वृक्ष वातावरण को सुखद, सुंदर बना रहे थे। हम सुहावने मौसम और सुन्दर प्राकृतिक दृश्यों का आनन्द लेते हुए, मन में रामलला के दर्शन की ललक लिए अपने पावन गंतव्य की ओर बढ़ रहे थे।
लगभग दोपहर 12 बजे हम झांसी में प्रवेश कर गए। ओरछा झांसी से मात्र 15 किमी. की दूरी पर बुन्देलखण्ड क्षेत्र के निवाड़ी जिले में बेतवा और जामनी नदी के संगम पर एक छोटे द्वीप की तरह बसा हुआ सुन्दर ऐतिहासिक और धार्मिक नगर है। इसकी स्थापना रुद्र प्रताप सिंह बुंदेला द्वारा ओरछा राज्य की राजधानी के रूप में सन् 1501 के लगभग हुई थी। यहाँ प्रवेश करते ही हमें शीतलता, शान्ति और भक्ति की सुखद तरंगों का आभास होने लगा। सुन्दर ऐतिहासिक भवन, मंदिर, मनभावन हरीतिमा के दर्शन ने हमारी रास्ते की थकान को मेट दिया।
गुगल लिंक के माध्यम से हम ओरछा पैलेस होटल एंड कन्वेंशन सेंटर के द्वार पर पहुँच गए। द्वार की भव्यता और द्वारपाल के परम्परागत विनम्र अभिवादन ने मन को खुश कर दिया। होटल में प्रवेश द्वार पर गणेश जी की भव्य कलात्मक और जीवन्त प्रतिमा को प्रणाम करते हुए हम स्वागत कक्ष में पहुँचे और औपचारिकता पूरी करके कक्ष की ओर। कक्ष मार्ग की सज्जा अद्भुत थी। दीवारों पर कृष्ण लीला दर्शाते अति मनोहारी बड़े-बड़े भित्ति चित्र शोभित थे। कक्ष की सजावट अति आधुनिक और आनंदित करने वाली थी।
हम लगभग तीन बजे ओरछा दर्शन पर निकले। भाई साहब ही गाइड के रूप में हमारे साथ थे, जिनकी बातों में इतिहास, धर्म और संस्कृति के ज्ञान की झलक मिल रही थी - वे पहले भी यहाँ आ चुके हैं। मौसम बहुत ही अनुकूल था। बादलों के अनुरोध पर सूरज ने अपने ताप को मनभावन बना दिया था। हमारी इच्छा सर्वप्रथम रामलला के दर्शन की थी,पर मंदिर तो निर्धारित समय पर ही खुलता है। हमारी गाड़ी ओरछा किले की ओर बढ़ रही थी। हमारे होटल से किला पहुँचने में दस मिनट भी नहीं लगे। किले की सुन्दर इमारत और उससे जुड़ी रोमांचक कहानियाँ हमारे कदमों को गति दे रही थी। इस किले का निर्माण "सोलहवीं शताब्दी के प्रारंभ में रुद्रप्रताप सिंह" ने करवाया था।
एक सुंदर बड़े प्रवेश द्वार से हम किला परिसर में प्रविष्ट हुए। यहाँ चतुर्भुजाकार में कई सुन्दर भवन दिखाई दे रहे थे - राजा महल (जिसे राजा मंदिर कहते हैं), शीश महल, जहाँगीर महल, मंदिर आदि। ये महल बुंदेला राजपूतों की वास्तुशिल्प के सुन्दर प्रमाण हैं। खुले गलियारे, पत्थरों वाली जाली, जानवरों की मूर्तियाँ, बेलबूटे जैसी तमाम बुंदेला वास्तुशिल्प की विशेषताएं यहां साफ दिखाई दे रही थीं। हमें ओरछा के किसी भी इतिहास में रुचि कम ही थी। हमें तो रामलला की नगरी और बेतवा नदी के सौन्दर्य को निहारना था। इसलिए हम किले की भव्यता को बाहर से ही देखते हुए बेतवा नदी की ओर बढ़ गए।
कल-कल बहती नदी के किनारों पर दूर तक समृद्ध वनश्री ने जल को अपने सौंदर्य प्रतिबिम्ब से सजा रखा था। राह की चट्टानों को चुनौती देती नदी की धारा मुझे अत्यधिक प्रिय है। बुंदेलखंड की इस पवित्र गंगा ने प्रथम दर्शन में ही मुझे मोहित कर लिया। इसका उल्लेख पौराणिक साहित्य में वेत्रवती और शक्तिमोदिनी के नाम से मिलता है। मुझे अनुभव हुआ कि इसका शक्तिमोदिनी नाम कितना सार्थक है यह शक्ति और मोद का जीवंत रूप है। हम पुल पर खड़े राजा राम की पावन नगरी और नदी के सौंदर्य का पान कर रहे थे। वातावरण में सुहानी शीतलता घुल रही थी। सूर्यास्त समय हो रहा था। आकाश में बादलों की सुनहरी कोर बन रही थी। जल में प्रतिबिम्बित सतरंगी आकाश की छटा न्यारी थी। संध्या सूर्य का आलिंगन करते हुए लजा कर लाल हो रही थी। सूरज संध्या का आंचल थामें अपनी परछाई से नदी में अग्नि स्तंभ बनाते हुए धीरे-धीरे अपने विश्रान्ति भवन की ओर अग्रसर था। अपने नीड़ों में लौटते पक्षी कलरव करते हुए मानो सूर्यदेव का आभार -गीत गा रहे थे। नदी के सौंदर्य और अस्ताचलगामी सूर्य के प्रकाश ने ओरछा के भवनों और मंदिरों के सौंदर्य में चार चाँद लगा दिए थे। चारों ओर एक जादुई मायाजाल - सा निर्मित हो गया था। हम नीचे घाट पर आ गए थे और जल का पावन स्पर्श करना चाहते थे पर भक्त - पर्यटकों की संख्या और कोलाहल बढ़ रहा था, दूसरे दिन दशहरा होने से भीड़ अधिक थी। इस कारण सुबह जल्दी नदी पर आने का मन बना कर राजा राम मंदिर के लिए चल दिए।
मैं मानती हूँ कि राम एक भाव है, जो प्रकृति के कण-कण में प्रवाहित है। जो हमारे अभिवादन में स्नेह बनकर उमड़ता है, हमारे आशीर्वादों को जीवंत करता है, पारस्परिकता को पल्लवित करता है। दुखद अभिव्यक्ति में करुणा बनकर सहलाता है। हमारे अधरों पर मुस्कान बन दौड़ जाता है। आँखों से प्रेमाश्रु बनकर ढुलक जाता हैं। जब यह भाव जब उमड़ते हैं तो रामायण और रामचरितमानस रच देते हैं, साकेत को आकार देते हैं।
यहाँ हम अनुभव कर रहे थे कि राम ओरछा के प्राणों में विराजमान हैं, सबकी धड़कन में राम हैं। यहाँ राम धर्म, जाति और वर्ग भेद से परे सभी के आराध्य हैं।
अयोध्या और ओरछा की दूरी लगभग 417 किलोमीटर है और इनका पर सम्बन्ध लगभग 600 बरस का है।
किंवदंतियों और कथाओं के अनुसार ओरछा के शासक मधुकरशाह कृष्ण भक्त थे, जबकि उनकी "महारानी गणेशकुंवर" राम की परम भक्त थीं। एक बार मधुकर शाह ने रानी को कृष्ण दर्शन हेतु वृंदावन चलने का प्रस्ताव दिया पर रानी ने इसके स्थान पर अयोध्या जाने की जिद कर ली। तब राजा ने क्रोध में कहा - अगर तुम्हारे राम सच में हैं तो उन्हें अयोध्या से ओरछा लाकर दिखाओ।
राजा की बात को चुनौती के रूप में स्वीकार कर रानी ने अयोध्या के सरयू तट पर साधना शुरु की। यहाँ उन्हें संत तुलसीदास का आशीर्वाद और मार्गदर्शन भी मिला। रानी की 21 दिनों की कठोर तपस्या के बाद जब श्री राम ने उन्हें दर्शन नहीं दिए तो उन्होंने हताश होकर नदी में छलांग लगा दी। वहीं उन्हें श्रीराम के दर्शन हुए और रानी ने श्री राम से ओरछा चलने का वरदान मांँगा।
राम जी ने रानी के सामने तीन शर्त रखी - पहली, मैं यहाँ से जाकर जिस जगह बैठा दिया जाऊँगा, वहाँ से नहीं उठूँगा। दूसरी, मेरे ओरछा के राजा के रूप विराजित होने के बाद किसी दूसरे की राजसत्ता नहीं रहेगी। तीसरी शर्त बाल रूप को ग्रहण कर पैदल चल कर पुष्य नक्षत्र में साधु संतों को साथ ले जाना होगा। भक्त रानी ने सभी शर्त स्वीकार कर राजा को संदेश भेजा कि वे भगवान को लेकर आ रही हैं। सूचना पाते ही राजा ने श्री राम के लिए भव्य मंदिर निर्माण शुरू करवा दिया किन्तु रानी के आने तक मंदिर पूर्ण नहीं हो सका।
जब महारानी ओरछा पहुंची तो उन्होंने भगवान राम की बाल स्वरुप मूर्ति की स्थापना अपने रसोई में कर दी यह सोचकर की जब मंदिर निर्माण पूर्ण हो जाएगा, तब रसोई से भगवान राम को मंदिर में स्थापित कर देंगे। मंदिर निर्माण कार्य पूर्ण होने पर महारानी ने भगवान राम को मंदिर में स्थापित करने की खूब कोशिश की किन्तु ऐसा नहीं हो सका।
ओरछा के रामराजा मंदिर में जड़े शिलालेख के अनुसार महारानी, भगवान राम को विक्रम संवत 1631 (सन् 1574) में चैत्र शुक्ल की नवमी को ओरछा लेकर आईं। ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार महारानी, भगवान राम को अयोध्या से लेकर ओरछा तक पुष्य नक्षत्र में कुल 8 माह 28 दिनों तक पैदल चलीं। यह भी एक अद्भुत संयोग था कि जिस दिन संवत 1631 को राम राजा का ओरछा में आगमन हुआ, उसी दिन रामचरित मानस का लेखन भी प्रारंभ हुआ।
ओरछा में स्थापित मूर्ति के विषय में भी यहाँ कई कथाएँ प्रचलित हैं। कुछ लोगों का विश्वास है कि राम ने वन गमन के समय अपनी एक बाल मूर्ति माता कौशल्या को दी थी। माता कौशल्या उस मूर्ति को राम मानकर भोग लगाया करती थीं। राम के अयोध्या लौट आने पर माता ने यह मूर्ति सरयू नदी में प्रवाहित कर दी थी। यही मूर्ति गणेशकुंवर राजे को सरयू की धार में मिली। कुछ लोगों का कथन है कि जब अयोध्या में इस्लामिक आक्रान्ताओं का आक्रमण हुआ और मंदिर को तोड़ दिया गया तो साधु-संतों ने भगवान राम के वास्तविक विग्रह को सरयू नदी में बालू के नीचे दबा दिया था। बाद में भगवान राम का यही वास्तविक विग्रह महारानी गणेशकुंवर राजे की गोद में प्रकट हुआ और यही वास्तविक प्रतिमा आज ओरछा में विराजमान है। यही कारण है कि ओरछा का महत्व भी अयोध्या के समान ही है। राम यहाँ ओरछाधीश के रूप में प्रतिष्ठित हैं।
यहाँ एक कहानी यह भी चलती है कि त्रेतायुग में राजा दशरथ अपने पुत्र श्री राम का राज्याभिषेक नहीं कर सके, ऐसे में राजा मधुकर शाह ने अपना कर्त्तव्य निभाया और राजा रामचन्द्र का राज्याभिषेक किया एवं अपना राज्य राजा रामचन्द्र को सौंप दिया। यह व्यवस्था आज भी बनी हुई है। यह विश्व में राम का एकमात्र मंदिर है, जहाँ राम की पूजा राजा के रूप में होती है और उन्हें सूर्योदय के पूर्व और सूर्यास्त के पश्चात सलामी दी जाती है। रामराजा मंदिर के चारों तरफ हनुमान जी के मंदिर हैं। छड़दारी हनुमान, बजरिया के हनुमान, लंका हनुमान के मंदिर एक सुरक्षा चक्र के रूप में चारों तरफ हैं।
यहाँ लोक विश्वास है कि भगवान श्रीराम के दो निवास हैं। श्रीराम दिनभर ओरछा में रहने के बाद शयन के लिए गृहनगर अयोध्या चले जाते हैं। इसी भावना से प्रेरित प्रतिदिन रात में यहाँ ब्यारी (संध्या) की आरती होने के बाद ज्योति निकलती है, जो कीर्तन मंडली के साथ पास ही पाताली हनुमान मंदिर ले जाई जाती है। मान्यता है कि ज्योति के रूप में भगवान श्रीराम को हनुमान मंदिर ले जाया जाता है, जहाँ से हनुमान जी शयन के लिए भगवान श्रीराम को अयोध्या ले जाते हैं।
बुंदेलखंड की अयोध्या के नाम से मशहूर ओरछा के राजा राम मंदिर की वास्तुकला अद्भुत है। यह एक बहु-मंजिला महल है, जिसमें मेहराबदार प्रवेशद्वार, एक मुख्य मीनार है और चारों ओर से वह बंद है। मंदिर की बाह्य सज्जा कमल के प्रतीक और धार्मिक महत्व के अन्य प्रतीकों से की गई है। अब यह मंदिर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के अंतर्गत आता है।
मंदिर मार्ग पर कतारबद्ध प्रसाद की दुकानें सजी हुई थीं। भंडारे भी चल रहे थे। भक्तों ने ही सुन्दर व्यवस्था बना रखी थी। कोलाहल में भी भक्ति की तरंगें थी। बहुत ही शांति से राजाराम के दर्शन हुए। मन एकदम शांत और पावन भावों से भरा था। मन की आँखें दिव्य रूप रस पान करते हुए अघातीं नहीं थी। तन-मन रोमांचित था।
मंदिर का परिसर अद्भुत भावात्मक एकता से सराबोर था जो सामाजिक समरसता और मानव मूल्यों का पाठ पढ़ा रहा था। दूसरे दिन दशहरे की सुबह पुनः दर्शन का निश्चय करके हम इतिहास के दर्शन करने के उद्देश्य से लाइट एंड साउंड प्रोग्राम देखने पहुँच गए। बहुत शानदार प्रदर्शन था।

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