Bhartiya Parmapara

राम के आदर्श: रामायण से जीवन सीखें और अपने आचरण में उतारें

आओ मिलजुल कर हम करेंगे प्रयास  
प्रभु राम के आदर्शो का हृदय में हो वास  
छल कपट को अपनी देह से दूर रखना  
सतयुग लाने का मन में हो दृढ़विश्वास।

वर्तमान दौर में हम देखते हैं हर चीज का पुनर्निर्माण हो रहा है फिर वह हमारा घर हो चाहे कार्यस्थल जब की यह सब क्षणिक सुख के पर्याय है।

भौतिक युग में हम गुमराह मुसाफिर की तरह चले जा रहे हैं। एक दौड़ में सब शामिल हैं, हमें पता नहीं मंजिल कहां है बस सब चल रहे हैं तो आंखें मूंदकर हम भी उसमें शामिल हो जाते हैं जो कि गलत है। अब समय आ गया है हमें हमारी अंतरात्मा पर चढ़ी आधुनिकता की अनावश्यक माया को परे रखकर अपनी अमूल्य संस्कृति और संस्कारों को अपनाना होगा यह आज के युग की मांग भी है और जरूरत भी और इसके लिए ज़रूरी है हमें पूरी तरह जागरूक रहना होगा और यह तभी संभव है  
जब हम रामायण को अपना आधार स्तम्भ मानकर रामायण के प्रसंगों को अपने स्मरण में रखते हुए उसका अनुसरण करने का प्रयास करें तभी अंतरात्मा की शुद्धि संभव है। धर्म, कर्म, न्याय और नीति का पाठ हमें राम जी से बेहतर और कोई नहीं सीखा पाएगा।

रामचरितमानस के प्रत्येक पात्र से हमें अमूल्य सीख मिलती है। जिस तरह राजा दशरथ पुत्र मोह के अधीन थे उसी प्रकार ब्राह्मण शांतनु और उनकी पत्नी ज्ञानवती को भी पुत्र प्राप्ति की असीम लालसा थी जब ऋषि द्वारा उन्हें बताया गया पुत्र होते ही तुम्हारी नेत्र ज्योति चली जाएगी फिर भी वह अपने पुत्र प्राप्ति के मोह को नहीं छोड़ पाए और उन्होंने नेत्रहीन रहना स्वीकार किया।

उन्होंने अपने बेटे का नाम श्रवण रखा जो माता -पिता की तन-मन से सेवा करते थे और उनके तीर्थ यात्रा करने की इच्छा पूरी करने हेतु उन्हें अपने कंधे पर बहंगी लेकर उसमें माता पिता को बिठाकर श्रवण कुमार निकले थे यह प्रसंग एक पुत्र का अपने माता-पिता के प्रति प्रेम, कर्तव्य, और आदर दर्शाता है।

श्रवण कुमार अपने माता-पिता को पेड़ के नीचे बैठाकर तमसा और विसुही नदी के संगम स्थल पर जाकर अपने कमंडल में जल भरने लगे महाराज दशरथ को लगा कोई प्राणी जल पी रहा है इसलिए उन्होंने अपने तीर से निशाना साधा तो श्रवण कुमार की चीख सुनकर दशरथ जी उस और दौड़ते हुए पहुंचे जैसे ही उन्हें पता चला उनसे श्रवण कुमार की हत्या हुई है वह घोर पश्चाताप करने लगे श्रवण कुमार ने जब उन्हें अपने माता-पिता के बारे में बताया और कहा वह प्यासे हैं उन्हें पहले जल पिलाना उसके पश्चात ही मेरे मृत्यु की खबर सुनाना।

राजा दशरथ व्याकुल होकर ब्राह्मण शांतनु और उनकी पत्नी जो अपने पुत्र की प्रतीक्षा कर रहे थे उनके पास पहुंचे जैसे ही शांतनु को आभास हुआ यह जल उनका पुत्र नहीं कोई और लाया है उन्होंने जल ग्रहण नहीं किया। वे विचलित हो गए पूरी घटना मालूम होने पर क्रोध में आकर उन्होंने राजा दशरथ को शाप दिया मेरी तरह ही तुम भी पुत्र वियोग में तड़प तड़प कर मृत्यु शय्या पर लेटोगे।

कहने का तात्पर्य वन में शिकार करने गए राजा दशरथ जी से अनजाने में ही सही किंतु भूल तो हुई थी उन्होंने अनेक पुण्य कर्म किए थे किंतु अपनी गलती की सजा उन्हें भी मिली इसलिए हमें कर्म करते समय पूरी तरह जागरूक रहना जरूरी है। हमारे द्वारा किया व्यवहार, आचरण, हमारी भूल किसी न किसी रूप में लौटकर हम तक जरूर वापस आते हैं, उस समय हमें लगता है हमारी किस्मत बहुत खराब है, ग्रहमान प्रतिकूल है किंतु दोष किस्मत का नहीं अपने कर्मों का रहता है इसलिए अपना आचरण और व्यवहार ऐसा रखें कि पश्चाताप की ज्वाला में धधकने की नौबत न आए। जो हम बोएंगे वही प्राप्त होता है यह प्रकृति का नियम है।

रामायण के सभी पात्र और प्रसंग हमें जीवन के आदर्शों का पाठ पढ़ाते हैं जब हम रामचरितमानस का बारम्बार पठन और श्रवण करेंगे और छोटी छोटी बातों को अपने जीवन में उतारने का प्रयास करेंगे तो सभी और से स्थितियां हमारे अनुकूल होने में देर नहीं लगेगी।

  

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