२१वी सदी और बाल मन
21वीं सदी विज्ञान, तकनीक और वैश्वीकरण की तीव्र गति से बदलती दुनिया की सदी है। यह वह युग है जिसने मानव सभ्यता के हर क्षेत्र (शिक्षा, संचार, स्वास्थ्य, अर्थव्यवस्था, संस्कृति और जीवनशैली आदि) को नई परिभाषाएँ दी हैं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सूचना प्रौद्योगिकी, जैव-तकनीक, चिकित्सा तथा कृषि विज्ञान के साथ विज्ञान के परंपरागत एवं आधुनिक विषयों में शोध और नवाचार में हुई प्रगति ने अभूतपूर्व संभावनाओं को जन्म दिया है। किंतु इन्हीं परिवर्तनों के बीच नैतिक मूल्यों का ह्रास, मानसिक असंतुलन, पर्यावरणीय संकट और सामाजिक असमानता जैसी नई चुनौतियाँ भी उत्पन्न हुई हैं।
संभावनाओं का नया क्षितिज:
21वीं सदी बाल मन के लिए “संभावनाओं और सपनों की सदी” है। आज की बालक एवं बालिकाएं सीमाओं से परे सोच सकती हैं, क्योंकि ज्ञान अब किसी एक देश, संस्था या पुस्तक तक सीमित नहीं रहा। स्मार्टफोन, इंटरनेट, रोबोटिक्स, वर्चुअल रियलिटी और अंतरिक्ष अनुसंधान बच्चों की जिज्ञासा को नई दिशा देते दिखाई देते हैं। बच्चे अब वैश्विक मंचों पर अपनी प्रतिभा प्रदर्शित कर सकते हैं फिर चाहे वह संगीत हो, कला, विज्ञान, खेल या साहित्य। डिजिटल माध्यमों ने उन्हें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और आत्मविश्वास प्रदान किया है। यह सदी बाल मन को न केवल ज्ञानवान बना सकती है, बल्कि उसमें वैश्विक नागरिकता, सहयोग और मानवीय संवेदना की समझ भी विकसित कर सकती है।
नई चुनौतियों तथा समस्याओं का यथार्थ:
अपार संभावनाओं के साथ अनेक जटिल चुनौतियाँ भी जुड़ी हैं। डिजिटल युग ने ज्ञान के स्रोत तो बढ़ाए हैं, परंतु सूचना की अति ने गहराई और चिंतन की क्षमता को कमजोर किया है। बच्चे अब ज्ञान अर्जित करने से अधिक सूचना उपभोग करने लगे हैं।
सोशल मीडिया और गेमिंग प्लेटफॉर्म ने उन्हें ‘वर्चुअल समाज’ का सदस्य बना दिया है, जहाँ भावनाएँ कृत्रिम हैं और संबंध सतही। मोबाइल और स्क्रीन पर लंबे समय तक बने रहना बच्चों की नींद, दृष्टि और मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर रहा है। ध्यान की अवधि घट रही है, एकाग्रता टूट रही है, और सामाजिक संवाद की क्षमता कम हो रही है। इतना ही नहीं प्रतिस्पर्धा की तीव्रता, अंकों की दौड़ और अभिभावकीय अपेक्षाएँ बच्चों से बचपन को सहजता से छीन रही हैं वहीं शहरी जीवन की असुरक्षा, प्रदूषण और हिंसा का माहौल उनके भीतर भय और अस्थिरता का डर पैदा कर रहा है। मेरा ऐसा मानना है कि 21वीं सदी की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि तकनीक और प्रगति के बीच बाल मन अपनी मानवीय संवेदना, रचनात्मकता और सरलता को कैसे बचाए रखें तथा समस्याओं से कैसे पार पाएं?
डिजिटल शिक्षा की विडंबना:
डिजिटल शिक्षा ने जहाँ ज्ञान तक पहुँच को आसान बनाया है, वहीं उसने सीखने के अनुभव को एकाकी और यांत्रिक भी बना दिया है। सहयोग, सामूहिकता और संवाद जैसी मानवीय शिक्षण प्रक्रियाएँ धीरे-धीरे हाशिए पर जा रही हैं।शिक्षा अब उपकरणों की दक्षता तक सीमित हो रही है, जबकि आवश्यकता है विवेक की-अर्थात् तकनीक का संयमित उपयोग, स्क्रीन टाइम का नियमन, साइबर सुरक्षा की समझ और नैतिक उपयोग का अभ्यास।
भारत की राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 इस दिशा में एक संतुलित दृष्टिकोण प्रस्तुत करती है। यह तकनीक और मूल्य-आधारित शिक्षा के समन्वय पर बल देती है, किंतु दुर्भाग्य यह है कि अधिकांश राज्यों में इसका प्रभावी क्रियान्वयन अभी स्कूली शिक्षा में बाकी है।
मानवीयता और संवेदना का पुनर्जागरण:
आज जब कृत्रिम बुद्धिमत्ता ‘सोचने’ लगी है, तब सबसे बड़ी आवश्यकता है कि मानव ‘महसूस’ करना न भूले। बाल मन को इस युग में मानवता का वाहक बनना होगा।
उन्हें सत्य, करुणा और सहानुभूति को जीवन का आधार बनाना होगा; प्रकृति और जीव-जंतुओं का सम्मान करना सीखना होगा और अपने भीतर सहयोग और साझेदारी की भावना विकसित करनी होगी। क्योंकि ज्ञान और सृजनशीलता का उद्देश्य केवल व्यक्तिगत सफलता नहीं, बल्कि समाज और विश्व की भलाई होना चाहिए। यही दृष्टिकोण बच्चों को सच्चा “भारतीय नागरिक” बनाएगा।
परिवार, समाज और विद्यालय की भूमिका:
बाल मन के विकास में तीन प्रमुख आधार हैं-परिवार, समाज और शिक्षण संस्थान। इसमें परिवार को बच्चों में प्रेम, सुरक्षा, अनुशासन और नैतिक दिशा देनी होगी। जबकि समाज उन्हें समान अवसर, सुरक्षित वातावरण और प्रेरक आदर्श माहौल प्रदान कर सकता है और करना भी चाहिए, वहीं शिक्षण संस्थानों को बच्चों में ज्ञान के साथ मूल्य, संवेदना और जिम्मेदारी का बोध कराना होगा ।मेरा ऐसा मानना है कि यदि ये तीनों स्तंभ सामंजस्यपूर्ण रूप से कार्य करें, तो बच्चे न केवल बुद्धिमान और आत्मनिर्भर होंगे, बल्कि संवेदनशील, रचनाशील, नवाचारी और समाज-परिवर्तनशील नागरिक भी बन सकेंगे।
समाधान की दिशा :
बाल मन के सर्वांगीण विकास हेतु आवश्यक है कि-बच्चों को प्रकृति के निकट लाया जाए;
कला, खेल और पठन-पाठन को जीवन का अंग बनाया जाए;ध्यान, योग और आत्मचिंतन जैसी विधाओं से मानसिक संतुलन सिखाया जाए; शिक्षकों को मार्गदर्शक और प्रेरक की भूमिका में पुनर्स्थापित किया जाए। यदि तकनीक और संस्कार, बुद्धि और भावना, ज्ञान और करुणा का संतुलन बना लिया जाए, तो यह सदी बालकों की सदी सिद्ध होगी-एक ऐसी सदी जहाँ विज्ञान और मानवता साथ-साथ चलें।
निष्कर्ष: 21वीं सदी वास्तव में अवसर और चुनौती-दोनों की सदी है। यदि हम बाल मन को केवल तकनीकी दक्षता ही नहीं, बल्कि नैतिकता, संवेदना और सह-अस्तित्व की शिक्षा दे पाएँ, तो वे इस सदी को केवल आधुनिक नहीं, बल्कि मानवीय और करुणामय सदी बना देंगे। यही इस युग का सबसे बड़ा उपहार होगा -एक ऐसी दुनिया जहाँ ज्ञान का उद्देश्य करुणा हो, और करुणा की दिशा ज्ञान से प्रकाशित।

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