विश्व भू - अलंकरण दिवस
भारतीय संस्कृति में धरती को ‘माता’ कहा गया है—“माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः।” इस भावना का मूर्त रूप हमें ‘भू-अलंकरण’ की परंपरा में दिखाई देता है। घर के आँगन, मंदिर के द्वार, उत्सवों और पर्वों पर भूमि को रंगों, फूलों, चावल, आटे या प्राकृतिक पदार्थों से सजाने की परम्परा को ही सामान्यतः रंगोली कहा जाता है। इसी कला के सम्मान और संरक्षण के लिए विश्व स्तर पर ‘विश्व भू-अलंकरण दिवस’ या ‘रंगोली दिवस’ मनाया जाता है। यह दिवस प्रतिवर्ष 22 अप्रैल को ‘पृथ्वी दिवस’ के अवसर पर संस्कार भारती द्वारा मनाया जाता है।
‘पृथ्वी का श्रृंगार दिवस‘ के रूप में धरती को सजाकर यह दिवस केवल एक कला का उत्सव नहीं, अपितु सांस्कृतिक स्मृति, सौंदर्यबोध, आध्यात्मिकता और पर्यावरण-संवेदनशीलता का प्रतीक है।
भू - अलंकरण की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि:
रंगोली या भू-अलंकरण की परम्परा अत्यंत प्राचीन है। भारतीय उपमहाद्वीप में इसका उल्लेख वैदिक और पौराणिक साहित्य में मिलता है। अथर्ववेद तथा गृह्यसूत्रों में यज्ञ-स्थल और गृह-द्वार को सजाने का उल्लेख मिलता है। माना जाता है कि प्राचीन काल में शुभ अवसरों पर आँगन में ज्यामितीय आकृतियाँ बनाकर देवताओं का स्वागत किया जाता था।
रामायण और महाभारत में भी उत्सवों के समय राजप्रासादों और नगर-द्वारों को सजाने के वर्णन मिलते हैं। विष्णुधर्मोत्तर पुराण में चित्रकला और अलंकरण की विधियों का विस्तृत वर्णन है, जिसमें भूमि-अलंकरण की विधियाँ भी सम्मिलित हैं।
पुरातात्त्विक प्रमाणों से भी यह स्पष्ट होता है कि सिंधु-सरस्वती सभ्यता में ज्यामितीय आकृतियों और प्रतीकों का प्रयोग व्यापक था। यद्यपि उस समय की रंगोलियों के प्रत्यक्ष प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं, किन्तु मिट्टी के बर्तनों और मोहरों पर बनी आकृतियाँ इस परम्परा की प्राचीनता का संकेत देती हैं।
भारत के विभिन्न प्रान्तों में भू - अलंकरण की विविधता:
भारत की सांस्कृतिक विविधता के अनुरूप भू-अलंकरण की शैली भी प्रदेशानुसार भिन्न-भिन्न नामों और रूपों में प्रचलित है—
*महाराष्ट्र और कर्नाटक में इसे ‘रंगोली’ कहा जाता है।
*तमिलनाडु में यह ‘कोलम’ के नाम से प्रसिद्ध है।
*आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में इसे ‘मुग्गु’ कहते हैं।
*बंगाल में इसे ‘अल्पना’ कहा जाता है।
*राजस्थान और मध्यप्रदेश में ‘मांडना’ की परंपरा है।
*बिहार में ‘अरिपन’ प्रचलित है।
*उत्तराखंड में ‘ऐपन’ के नाम से यह कला जीवित है।
*केरलम में ‘पुक्कलम’ (विशेषतः ओणम पर) फूलों से बनाई जाती है।
इन सभी शैलियों में मूल तत्व समान है—भूमि को सजाकर शुभता और सकारात्मक ऊर्जा का स्वागत करना—किन्तु आकृतियों, रंगों और सामग्री में क्षेत्रीय विशिष्टता दिखाई देती है।
धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व:
भारतीय परंपरा में किसी भी शुभ कार्य से पूर्व द्वार या आँगन में रंगोली बनाना मंगलसूचक माना जाता है। दीपावली पर लक्ष्मी-पूजन से पूर्व कमल, शंख, स्वस्तिक और पदचिह्नों की रंगोली बनाई जाती है। नवरात्र, विवाह, नामकरण, अन्नप्राशन और अन्य संस्कारों में भी भू-अलंकरण का विशेष महत्व है।
आध्यात्मिक दृष्टि से रंगोली केवल सजावट नहीं है, अपितु यह सकारात्मक ऊर्जा का आवाहन करती है। ज्यामितीय आकृतियाँ, वृत्त, त्रिकोण और कमल आदि प्रतीक ब्रह्मांडीय ऊर्जा और संतुलन के द्योतक हैं। भारतीय वास्तुशास्त्र में भी प्रवेश-द्वार पर शुभ चिह्न अंकित करने का विधान है, जिससे नकारात्मक शक्तियों का प्रवेश न हो
सामाजिक और सांस्कृतिक आयाम:
भू-अलंकरण की कला मुख्यतः महिलाओं द्वारा पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होती रही है। यह केवल कलात्मक अभिव्यक्ति नहीं, अपितु सामुदायिक संवाद का माध्यम भी है। गाँवों और कस्बों में महिलाएँ सुबह-सुबह आँगन में रंगोली बनाते हुए एक-दूसरे से संवाद करती हैं। यह परम्परा सामाजिक समरसता और सहयोग की भावना को सुदृढ़ करती है।
त्यौहारों के अवसर पर सामूहिक रंगोली प्रतियोगिताएँ आयोजित की जाती हैं, जिनसे युवाओं में रचनात्मकता और सांस्कृतिक चेतना का विकास होता है। विद्यालयों और महाविद्यालयों में भी रंगोली प्रतियोगिताएँ सांस्कृतिक कार्यक्रमों का प्रमुख अंग बन चुकी हैं।
वैज्ञानिक और पर्यावरणीय दृष्टिकोण:
रंगोली बनाने के लिए प्राचीन काल में चावल का आटा, हल्दी, कुमकुम, फूलों की पंखुड़ियाँ, गोबर और मिट्टी जैसे प्राकृतिक पदार्थों का उपयोग किया जाता था। चावल के आटे से बनी रंगोली चींटियों और पक्षियों के लिए भोजन का कार्य भी करती थी—यह पर्यावरण के साथ सह-अस्तित्व का सुंदर उदाहरण है।
ज्यामितीय आकृतियाँ बनाने से मन की एकाग्रता बढ़ती है और यह ध्यान की प्रक्रिया का भी रूप ले लेती है। आधुनिक मनोविज्ञान के अनुसार रंगों और आकृतियों के संयोजन से मानसिक तनाव कम होता है तथा सकारात्मकता का संचार होता है। इस दृष्टि से रंगोली मानसिक स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी है।
आज आवश्यकता है कि रासायनिक रंगों के स्थान पर प्राकृतिक और पर्यावरण-हितैषी रंगों का प्रयोग किया जाए, जिससे पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव न पड़े।
विश्व भू - अलंकरण दिवस का उद्देश्य:
विश्व भू-अलंकरण दिवस का उद्देश्य इस प्राचीन कला के संरक्षण, संवर्द्धन और वैश्विक प्रसार को बढ़ावा देना तथा धरती का श्रृंगार करके प्रकृति के प्रति सम्मान प्रकट करना है। वैश्वीकरण के इस युग में पारम्परिक कलाएँ आधुनिक जीवनशैली के कारण धीरे-धीरे लुप्त होती जा रही हैं। ऐसे में इस दिवस का महत्व और बढ़ जाता है।
यह दिवस हमें स्मरण कराता है कि सांस्कृतिक धरोहर केवल संग्रहालयों में सुरक्षित रखने की वस्तु नहीं, अपितु जीवन में आत्मसात करने योग्य परम्परा है। विभिन्न सांस्कृतिक संस्थाएँ, विद्यालय, विश्वविद्यालय और सामाजिक संगठन इस अवसर पर कार्यशालाएँ, प्रदर्शनी और प्रतियोगिताएँ आयोजित करते हैं।
आधुनिक युग में रंगोली का स्वरूप:
आज रंगोली केवल आँगन तक सीमित नहीं है। यह डिजिटल कला, ग्राफिक डिजाइन और सार्वजनिक स्थलों की सजावट का भी हिस्सा बन चुकी है। माल, होटल, हवाई अड्डे और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी भारतीय रंगोली की छटा देखने को मिलती है।
विदेशों में बसे भारतीय समुदाय भी दीपावली और अन्य पर्वों पर रंगोली बनाकर अपनी सांस्कृतिक पहचान को जीवित रखते हैं। कई विदेशी कलाकारों ने भी इस कला को अपनाया है और इसे वैश्विक मंच प्रदान किया है।
चुनौतियाँ और संरक्षण की आवश्यकता :
यद्यपि रंगोली की परंपरा आज भी जीवित है, किन्तु शहरीकरण और समयाभाव के कारण यह धीरे-धीरे सीमित होती जा रही है। नई पीढ़ी का झुकाव आधुनिक तकनीकी माध्यमों की ओर अधिक है।
इस कला के संरक्षण के लिए आवश्यक है—
*विद्यालयों में पारंपरिक कलाओं को पाठ्यक्रम में सम्मिलित किया जाए।
*प्राकृतिक रंगों के प्रयोग को प्रोत्साहित किया जाए।
*ग्रामीण कलाकारों को आर्थिक सहायता और मंच प्रदान किया जाए।
*डिजिटल माध्यमों से इस कला का अभिलेखीकरण और प्रचार किया जाए।
विश्व भू-अलंकरण अर्थात रंगोली दिवस हमें अपनी जड़ों से जोड़ने का अवसर प्रदान करता है। यह केवल रंगों और आकृतियों का संयोजन नहीं, अपितु हमारी सांस्कृतिक आत्मा का प्रतिबिंब है। भूमि को सजाने की यह परंपरा हमें प्रकृति के प्रति कृतज्ञता, सौंदर्य के प्रति संवेदनशीलता और समाज के प्रति उत्तरदायित्व का बोध कराती है।आज जब विश्व पर्यावरण संकट, सांस्कृतिक विघटन और मानसिक तनाव जैसी समस्याओं से जूझ रहा है, तब रंगोली जैसी परम्पराएँ हमें पर्यावरण संतुलन, समरसता, स्वच्छता, स्वास्थ्य और सृजनशीलता का संदेश देती हैं।
अतः आवश्यक है कि हम विश्व भू-अलंकरण दिवस को केवल औपचारिक आयोजन तक सीमित न रखें, अपितु इसे अपने जीवन का अभिन्न अंग बनाकर आने वाली पीढ़ियों को भी इस गौरवशाली परंपरा से परिचित कराएँ। यही इस दिवस की सच्ची सार्थकता होगी।

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