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पितृपक्ष में कौवों को भोजन क्यों कराते हैं? धार्मिक और पर्यावरणीय महत्व

हमारे पितृ और कौआ: पितृपक्ष में कौए को भोजन देने की परंपरा और महत्व

पितृपक्ष की परंपरा, पर्यावरण संरक्षण और धार्मिक मान्यताएँ

पितृपक्ष भाद्रपद की पूर्णिमा तिथि से लेकर अमावस्या तक चलता है। सोलह दिनों तक घर-घर में वड़ा, पूड़ी, गुलगुला भजिया और खीर बनाकर अपने पूर्वजों को गुड़ और घी की धूप दी जाती है।

कहा जाता है कि गुड़ और घी की धूप पितर ग्रहण करते हैं। पितृपक्ष में बहुत सारे नियम-धर्म होते हैं, लेकिन आजकल के वातावरण और व्यस्तता के चलते धीरे-धीरे इनमें बदलाव आ रहा है और इनका पालन भी कम होता जा रहा है; लेकिन केवल वड़ा, पूड़ी बनाकर खाने के लिए ही पितृपक्ष को नहीं मनाया जाता, बल्कि इसमें मनुष्य के साथ-साथ हमारे पर्यावरण और पशु-पक्षी भी जुड़े हुए हैं। आजकल लोग सोचते हैं कि पितरों को नहीं मनाएँगे तो क्या ही हो जाएगा? नहीं... नहीं...! ऐसा करना हमारे पर्यावरण और पशु-पक्षियों के विनाश का कारण भी बन सकता है।

हमारे बुजुर्ग कहते थे कि धूप देने के बाद पूड़ी–वड़ा छत पर फेंक देना। कौए आएँगे और खाएँगे तो समझ लेना कि पितर आकर भोजन कर रहे हैं। घर में छोटे-छोटे बच्चे अपने दादा-दादी का मजाक उड़ाते हुए कहते थे- "कैसे बोलते हो दादा...? मर गए वे लोग कौआ बनकर आएँगे क्या...?"

परंतु हमारे पूर्वजों ने जो भी काम किए और जो बातें बताईं, वे सोलह आने सच थीं। भले ही हम उनकी बातों को हँसी-मजाक में टाल देते थे।

ऐसा भी माना जाता है कि त्रेतायुग में भगवान इंद्र के पुत्र जयंत ने सबसे पहले कौए का रूप धारण किया था। जयंत ने माता सीता के पास जाकर उनके पैर में चोंच मार दी थी। उसी समय भगवान श्रीराम ने तिनके का बाण चलाकर जयंत की आँख फोड़ दी थी। जयंत रोते-गिड़गिड़ाते हुए भगवान श्रीराम से क्षमा माँगने लगा। तब श्रीराम ने अपने दयालु स्वभाव के कारण उसे क्षमा कर दिया और वरदान दिया कि पितृपक्ष में तुम्हें परोसा हुआ भोजन मिलेगा और तुम्हें पितरों के रूप में माना जाएगा।

प्रचलित मान्यताओं के अनुसार कौआ प्राकृतिक कारणों से नहीं मरता, बल्कि किसी के मारने या बीमारी के कारण ही उसकी मृत्यु होती है, क्योंकि ऐसा बताया जाता है कि समुद्र मंथन के समय कौए ने अमृत पी लिया था।

वैसे हमारे पूर्वज प्रकृति से बहुत अधिक जुड़े हुए थे। वे पेड़-पौधों और पक्षियों से बहुत प्रेम करते थे और पर्यावरण को सँवारकर रखते थे।

कौओं को भोजन देने का एक कारण यह भी बताया जाता है कि भादो महीने में मादा कौए अंडे देती हैं। अपने बच्चों को छोड़कर वे अधिक दूर नहीं जा सकतीं। इसलिए घर की छतों या बरामदों में जाकर दाना-पानी की व्यवस्था कर पाती हैं; लेकिन अब दिनों दिन कौओं की संख्या कम होती जा रही है।

 



              



 

एक बात जानना भी जरूरी है कि कौए पीपल और बरगद के बीज खाते हैं। वे इन बीजों को खाने के बाद कहीं दूसरी जगह बीट कर देते हैं, जिससे बरगद और पीपल के पौधे जगह-जगह उग आते हैं। इससे हमारा वातावरण शुद्ध होता है। आजकल कौओं को बचाना बहुत जरूरी है, क्योंकि उनकी संख्या बहुत कम हो गई है और वे देखने को भी विरले ही मिलते।

बरगद और पीपल के पेड़ों में ऑक्सीजन की मात्रा बहुत अधिक पाई जाती है। इसलिए पर्यावरण को सुरक्षित रखने के लिए हमारे पूर्वजों ने यह उपाय किया था।

पितृपक्ष में तोरई की सब्जी का भी बहुत महत्व है। तोरई की सब्जी और उसके पत्तों का विशेष महत्व बताया गया है। इसके बिना हमारे पूर्वज तृप्त नहीं होते। तोरई का अर्थ ही तारना है। तोरई की सब्जी उसके पत्तों में रखकर परोसी जाती है।

मेरे प्यारे साथियो...! यह कोई कहानी नहीं है, बल्कि सच्ची बात है। हमारे पूर्वजों ने जो बातें बताई हैं, उन्हें मानने से हम पीछे नहीं हट सकते। उन्होंने बहुत सोच-विचार करके हर बात को परंपरा में शामिल किया था।

हम सभी के लिए पर्यावरण की सुरक्षा करना भी बहुत जरूरी है। आप सभी से हाथ जोड़कर विनती है कि हमारे पूर्वजों की इस परंपरा को बनाए रखिए।

 



              



 

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