आर्य प्रतिक स्वस्तिक का प्रयोग
स्वास्तिक अत्यन्त प्राचीन काल से ही भारतीय संस्कृति में मंगल प्रतीक माना जा रहा है। अतः कोई भी शुभ कार्य करने से पहले स्वास्तिक चिन्ह अंकित करके उसका पूजन किया जाता है।
स्वास्तिक का अर्थ है - अच्छा या मंगल करने वाला । “अमर कोश” में भी इसका अर्थ आशीर्वाद, मंगलकारी एवं पुण्य कार्य सभी दिशाओं में सबका कल्याण करने वाला है। इस प्रकार स्वास्तिक शब्द केवल व्यक्ति या जाति विशेष का नहीं है अपितु सम्पूर्ण विश्व के कल्याण यह ‘‘वसुधैव कुटुम्बकम्’’ की भावना निहित है।
स्वास्तिक शब्द की निरूक्ति –
“स्वस्तिक क्षेम कायति, इति स्वस्तिकः” अर्थात कुशल क्षेम या कल्याण का प्रतीक ही स्वास्तिक है।
मानक दर्शन- दर्शन के अनुसार स्वास्तिक दक्षिणोन्मुख दाहिने हाथ की दिशा (घड़ी की सुई चलने की दिशा) का संकेत तथा वामोन्मुख बायीं दिशा (उसके विपरीत) के प्रतीक हैं। दोनों दिशाओं के संकेत स्वरूप दो प्रकार के स्वास्तिक स्त्री एवं पुरूष के प्रतीक के रूप में मान्य हैं। किन्तु जहाँ दायीं ओर मुड़ी भुजा वाला स्वास्तिक शुभ एवं सौभाग्यवर्द्धक है, वहीं उल्टा (वामावर्त) स्वास्तिक अमांगलिक हानिकारक माना गया है। प्राचीन काल में राजा महाराजा द्वारा किलों का निर्माण स्वास्तिक के आकार में किया जाता रहा है ताकि किले की सुरक्षा अभेद्य बनी रहे।
दुर्ग निर्माण में स्वास्तिक का अर्थ सु वास्तु अर्थात अच्छा वास्तुशास्त्र। स्वास्तिक को नेपाल में हेरब, मिस्र में एक्टोन, बर्मा में महापियन्ने के नाम से पूजते हैं। ऑस्ट्रेलिया तथा न्यूजीलैंड के मावरी आदिवासी द्वारा आदिकाल से स्वास्तिक को मंगल प्रतीक के रूप में प्रयुक्त किया जाता रहा है।
वैज्ञानिकता - वर्तमान समय में विज्ञान भी स्वास्तिक आदि मांगलिक चिह्नों की महता स्वीकार करने लगा है। आधुनिक विज्ञान के वातावरण तथा किसी भी जीवित वस्तु पदार्थ इत्यादि के ऊर्जा को मापने के लिए विभिन्न उपकरणों का आविष्कार किया है और इस ऊर्जा मापने की इकाई को नाम दिया है-
‘‘बोविस’’। मृत मानव शरीर बोविस शून्य मानक है। और मानव में औसत ऊर्जा क्षेत्र 6500 बोविस पाया गया है। स्वास्तिक में इस ऊर्जा का स्तर 1000000 (दस लाख) बोविस है। यदि इसे अलग बना दिया जाये तो यह प्रतिकूल ऊर्जा इसी अनुपात में बढ़ाता है। इसी स्वास्तिक को थोडा टेढा बना देने पर इसकी ऊर्जा मात्र 1000 बोविस रह जाती है।
इसके साथ ही विभिन्न धार्मिक स्थलों, मंदिरों, गुरुद्वारों इत्यादि का ऊर्जा का स्तर काफी ऊँचा मापा गया है। जिसके चलते वहाँ जाने वालों को शान्ति का अनुभव और अपनी समस्याओं कष्टों से मुक्ति हेतु मन में नवीन आशा का संचार होता है। यही नहीं हमारे घरों, मन्दिरों, पूजा-पाठ इत्यादि में प्रयोग किये जाने वाले मांगलिक चिह्नों - ऊँ, देव मंत्र आदि में भी इसी तरह की ऊर्जा समाई रहती है। जिसका लाभ हमें जाने अनजाने में मिलता ही रहता है।
अतः निष्कर्षतः कह सकते हैं हिन्दू धर्म विश्व में एकमात्र ऐसा धर्म है जो अपने प्रत्येक कार्य संस्कार और परम्परा में पूर्णतः वैज्ञानिकता समेटे हुए है। सबसे अलग आश्चर्य की बात है कि जर्मनी के तानाशाह हिटलर के ध्वज में यही वामावर्त स्वस्तिक अंकित था ।

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