Bhartiya Parmapara

संवेदना: एक मर्मस्पर्शी कहानी जो इंसानियत का आईना दिखाती है

संवेदना - एक मर्मस्पर्शी कहानी

पुराना, मैला-कुचैला कंबल ओढ़े बस की एक खाली सीट पर बैठी बूढ़ी भिखारन को देखकर बस कंडक्टर का पारा सातवें आसमान पर चढ़ने लगा।

“तू फिर आ गई…? अभी सुबह की बोहनी भी नहीं हुई और तू यहाँ ठाट से सीट जमाकर बैठ गई! किराया कौन देगा, तेरा बाप? भिखारन कहीं की! सुबह-सुबह न जाने किसका मुँह देखना पड़ता है।”

कंडक्टर बुदबुदाते और गालियाँ देते हुए उसे तिरछी नज़रों से घूरने लगा।

थोड़ी देर बाद कुछ और महिलाएँ बस में चढ़ीं। सीट खाली न होने के कारण उन्हें खड़ा रहना पड़ा। यह देख कंडक्टर ने बूढ़ी भिखारन के दोनों हाथ पकड़े और उसे जबरन सीट से उतारने लगा। लेकिन भिखारन पूरी ताकत से अपनी जगह जमी रही और अपनी टूटी-फूटी आवाज़ में बोली— “ए मोर बस है (यह मेरी बस है)।”

“चुप कर पगली! मुँह बंद रख अपना। देख, तेरी वजह से बाकी महिलाएँ खड़ी हैं; शर्म नहीं आती तुझे? बिल्कुल दिमाग नाम की चीज़ नहीं है इसमें!” – कंडक्टर ने उसे डाँटा।

अब ड्राइवर के साथ-साथ बस के बाकी यात्री भी सुर में सुर मिलाकर उसके बारे में अनर्गल बातें करने लगे। वह बेचारी बूढ़ी औरत चुपचाप अपनी आँखें बंद किए सब सहती रही। देखते ही देखते बस पूरी तरह सवारियों से खचाखच भर गई।

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कुछ दूर आगे जाकर बस एक और स्टॉप पर रुकी। वहाँ से एक गर्भवती महिला अंदर आई। उसके चेहरे की हवाइयाँ उड़ी हुई थीं और वह काफी बीमार लग रही थी। उसने अपनी उम्मीद भरी नज़रें बस के कोने-कोने में घुमाईं, लेकिन कहीं कोई जगह न पाकर वह मायूस होकर पीछे खड़ी हो गई।

भीड़ बहुत थी, पर उस गर्भवती महिला की हालत देखकर भी किसी का दिल नहीं पघला। उसने बेबसी से गुहार लगाई:

“भाई जी, थोड़ी-सी जगह दे दो बैठने के लिए, मेरी तबीयत ठीक नहीं लग रही है...”

लेकिन वहाँ बैठे लोगों की ज़ुबान से सिर्फ एक ही रूखा जवाब निकला—

“भाई, पैसे हमने भी पूरे दिए हैं; कोई मुफ़्त में थोड़ी न चढ़े हैं बस में। हम अपनी सीट क्यों छोड़ें?”
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तभी उस कोने में बैठी बूढ़ी भिखारन की नज़र उस बेहाल गर्भवती महिला पर पड़ी। वह अपनी ही धुन में कुछ बड़बड़ाती हुई खड़ी हुई, धीरे से उस महिला का हाथ पकड़ा और बड़ी ममता से उसे अपनी सीट पर बिठा दिया।

अगले ही पल, वह बूढ़ी औरत एक अनजान स्टेशन पर बस से नीचे उतर गई।

पूरी बस में सन्नाटा पसर गया। लोग फटी आँखों से उस उतरती हुई भिखारन को देख रहे थे। जहाँ उस 'पगली' की फटी गुदड़ी में इंसानियत मुस्कुरा रही थी, वहीं बस में बैठे सभ्य और समृद्ध लोगों की मानवता धूल-धूसरित हो चुकी थी।



              

 

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