अमृत महोत्सव काल में राष्ट्र विकास हेतु योगदान के लिये संयम और नैतिकता अपनाएं
संयम और नैतिकता के बूते ही जीवन सुखमय तो होता ही है साथ साथ सम्मानजनक भी। जैसा आप सभी जानते हैं कि विलासिता से अनेक अवगुण स्वत: ही अपने आप विकसित हो जाते हैं और इससे बचने के लिये संयम ही एक कारगर हथियार है। लेकिन हमें सुख जितना पसन्द है उतना संयम नहीं क्योंकि संयम के चलते हमें अपने व्यवहार पर नियंत्रण, वाणी पर नियंत्रण, इच्छाओं पर नियंत्रण अर्थात क्रोध, लालच, द्वेष, मोह, अभिमान आदि मन की अवांछित भावनाओं पर नियंत्रण के लिये प्रयासरत रहना होगा। यदि ऊपर वर्णित में से हम किसी एक को अपनाने के लिए दृढ़ प्रतिज्ञ होते हैं तो बाकी सब भी हमारे में स्वत: विकसित होने लगेंगे क्योंकि हमारा संतुलित अवस्था में रहने से संयम की पालना शुरू हो जाती है।
इसलिये ही बताया गया है कि मन का संतुलित अवस्था में रहना ही संयम है।
उपरोक्त तथ्यों से यह माना जा सकता है कि संयम से हमारी सोच सकारात्मक होगी ही। फलस्वरूप हमारे में बल व बुद्धि की वृद्धि होगी क्योंकि जब हम प्रसन्नचित्त रहते हैं तो हमें अपने आप अंदरूनी ताकत मिलती है।
यह तो ज्ञात हो गया कि, संयम से अपार खुशियाँ व सुख सुलभ होता है लेकिन अब सवाल यह कि, संयम कैसे विकसित करें ? इसलिए सबसे पहले यह समझ लें कि, इन्द्रिय संयम से ब्रह्मचर्य विकसित होगा, वहीं वाणी के संयम से विद्वता झलकेगी और मन का संयम दोनों में सामंजस्य बैठाने में सहायक होगा, परन्तु जीवन सब तरह से सुखमय तो तभी होगा, जब हम नैतिक शिक्षा अनुसार आचरण करेंगे। इसलिए, नैतिक मूल्यों को ध्यान में रख हमें अपने आचरण में संयम बरतते हुए जीवन जीना होगा।
ध्यानार्थ कि, नैतिकता का प्रथम उद्देश्य अपने निजी हित के स्थान पर समाज के कल्याण को अधिक महत्व देना माना गया है। इसलिए, संयम और नैतिकता के चलते मनुष्य के स्वाभाविक विकार दूर होते हैं। इसके चलते मनुष्य क्षीर, गम्भीर बनता है और निर्णय लेने में गलती की सम्भावना बहुत ही कम होती है, बल्कि हम कह सकते हैं कि गलती हो पाना मुमकिन ही नहीं है।
ऊपर वर्णित से यह स्पष्ट है कि जब से हम अपने निजी हित के स्थान पर समाज के कल्याण को अधिक महत्व देना शुरू कर देंगे तब हम जीवन में सादगी, संयम, अनावश्यक खर्चों पर नियंत्रण कर पाने में सफल हो सकेंगे। जिसके फलस्वरूप हम सद्कार्य के लिये आवश्यकता के समय पर जो भी संभव हो, जितना भी संभव हो दे पायेंगे। इस तथ्य को प्रमाणित करने के लिये आप सभी प्रबुद्ध पाठकों के लिये कुछ निम्न ऐतिहासिक साक्ष्य प्रस्तुत है -
1] राजस्थान राजपूतानी शौर्य भूमि बीकानेर
के मूल निवासी वैश्य अमर चंद बांठिया जी की कीर्ति से प्रभावित होकर ग्वालियर की तत्कालीन सिंधिया रियासत के महाराज ने उनको राजकोष का कोषाध्यक्ष बनाया था। उस समय ग्वालियर का गंगाजली खजाना की जानकारी केवल चुनिंदा लोगों को ही थी। बांठिया जी भी उनमें से एक थे। यहाँ यह बात गौर करने की है कि उस समय के चलन के मुताबिक गंगाजली खजाना से कोई भी कुछ भी निकाल ही नहीं सकता था फलस्वरूप खजाने की सदैव वृद्धि होती रही। 1857 का स्वातंत्र्य समर के समय झांसी की महारानी लक्ष्मीबाई अपने योग्य सेनानायक राव साहब, तात्या टोपे और रानी बैजाबाई एवं अपने सैन्य बल के साथ अंग्रेजों से लोहा लेते हुए ग्वालियर को अपने अधिकार में ले, अंग्रेजों के सहयोगी शासक को वहां से हटने को विवश तो कर दिया था, किन्तु उनकी सेना को कई महीनों से न तो वेतन प्राप्त हुआ था और नहीं उनके भोजन आदि की समुचित व्यवस्था हो पा रही थी अर्थात अर्थाभाव के कारण स्वाधीनता समर दम तोड़ता दिखाई दे रहा था। इस स्थिति को समझते हुए बांठिया जी ने अपनी जान की परवाह न कर महारानी लक्ष्मीबाई को अपनी सारी जमा पूंजी तो समर्पित की ही साथ ही ग्वालियर का राजकोष भी उनके सुपुर्द कर दिया। यह धनराशि उन्होंने ८ जून १८५८ को उपलब्ध कराई। उनकी मदद के बल पर वीरांगना लक्ष्मीबाई दुश्मनों के छक्के छुड़ाने में सफल रहीं थी।
2] एक मराठा सैनिक आपा गंगाधर ने 800
साल पहले पुरानी दिल्ली के चांदनी चौक क्षेत्र में प्रसिद्ध गौरी शंकर मंदिर निर्मित किया गया था । एक बार एक बड़े वैश्य व्यापारी लाला भागमल जी को पता चला कि क्रूर, निर्दयी औरंगजेब ने इस मंदिर को तोड़ने का आदेश अपने सिपाहियों को दिया है तो उन्होनें औरंगजेब से सीधा सीधा पूछा : बताइये तुझे कितना जजिया कर चाहिए??? कीमत बोलिये, लेकिन मन्दिर को कोई हाथ नहीं लगाएगा, मन्दिर की घंटी बजनी बंद नहीं होगी !!
कहते हैं इसके जबाब में उस वक़्त औरंगजेब ने औसत जजिया कर से 100 गुना ज्यादा जजिया कर, हर महीने माँगा था। वैश्य व्यापारी लाला भागमल जी बिना माथे पर शिकन लाये हर महीने उतना जजिया कर औरंगजेब को दान के रूप में दिया था। इस तरह वैश्य व्यापारी लाला भागमल जी ने उन आततायी से मन्दिर को बचाया यानि मन्दिर को छूने नहीं दिया। इस घटना के कई दशक बाद इसी गौरी-शंकर मंदिर का जीर्णोद्धार सेठ जयपुरिया नाम के शिव भक्त ने 1959 में कराया था। इस तरह मराठा सैनिक आपा गंगाधर के समय से लेकर आज तक मन्दिर की घण्टियाँ ज्यों की त्यों बज रही हैं।
3] सरहिंद के नवाब वजीर खां ने गुरु गोबिंद सिंह जी के दो पुत्रों को दीवार में चिनवाने
के बाद उनके अर्थात दोनों साहिबजादों व दादी माँ, जो 6 पूस से 13 पूस… तदनुसार 21 दिसम्बर से 27 दिसम्बर वाले 7 दिनों में शहीद हुये, के पार्थिव शरीरों को अंतिम संस्कार के लिए जगह नहीं दे रहा था। तब वैश्य व्यापारी टोडरमलजी ने उन तीनों महान विभूतियों का अंतिम संस्कार के लिए सिर्फ 4 वर्ग मीटर स्थान 78000 हजार सोने के सिक्के जमीन पर खडे कर वह जगह मुगल सल्तनत से खरीद स्वयं ही उन तीनों महान विभूतियों का अंतिम संस्कार अपनी पत्नी के सहयोग से फतेहगढ़ साहिब में सम्पन्न किया था।
4] हल्दी घाटी के युद्ध में पराजित पराक्रमी महाराणा प्रताप जब अपने परिवार के साथ जंगलों में भटक रहे थे तब दानवीर वैश्य भामाशाह मातृ-भूमि की रक्षा के लिए महाराणा प्रताप के लक्ष्य को सर्वोपरि मानते हुए अपनी सम्पूर्ण धन-संपदा अर्पित कर दी। जिसके चलते महाराणा प्रताप में नया उत्साह उत्पन्न हुआ और उन्होंने पुन: सैन्य शक्ति संगठित कर मुगल शासकों को पराजित कर फिर से मेवाड़ का राज्य प्राप्त कर लिया था। महाराणा प्रताप जी भी जब महल छोड़कर जंगल चले गए थे, व उन्हें अकबर के विरुद्ध नई सेना का गठन करना था, उस समय भी बनिया समाज के श्री भामाशाह जी ने अकूत धनराशि से महाराणा प्रताप जी को भरपूर सहयोग किया था। ऐसे विरल दानवीर वैश्य भामाशाह के लिये ही निम्न पंक्तियाँ कही गयी थी -
"वह धन्य देश की माटी है, जिसमें भामा सा लाल पला। उस दानवीर की यश गाथा को, मेट सका क्या काल भला ।।“
5] इसी तरह सामान्य लेखक के रूप में अपना जीवन शुरू करने वाले वैश्य राजा टोडरमल जी
(इनको 21 वर्ष की उम्र में बादशाह शाहजहाँ ने 'राजा' की उपाधि से नवाजा था) ने पंडित नारायण भट्ट की प्रेरणा से उत्तर प्रदेश के वाराणसी शहर स्थित भगवान शिवजी अर्थात काशी विश्वनाथ मंदिर, जिसे वर्ष 1447 में इसे जौनपुर के सुल्तान महमूद शाह ने तुड़वा दिया था, को 1585 में पुन:निर्माण करवा सनातन धर्म रक्षार्थ एक उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत किया। इसी क्रम में यह भी बताना चाहूंगा कि प्रायः प्रायः सभी तीर्थ स्थानों में आपको किसी भी वैश्य द्वारा स्थापित धर्मशाला मिलेगी ही।
हाल ही के वर्षों में वैश्य समाज अस्पताल, विद्यालय, विश्वविद्यालय वगैरह भी छोटे से छोटे जगह पर स्थापित किये जा रहे हैं। इन सब कारणों से हम कह सकते हैं कि वैश्य समाज धर्म कर्म, समाज कल्याण के साथ साथ राष्ट्र उन्नति के लिये कुछ भी करने को सदैव तत्पर रहते हैं क्योंकि उनके जिन्दगी जीने के मापदण्ड कुछ इस प्रकार होते हैं –
"जिन्हें सेवा की धुन हो, कुछ अलग होते हैं दुनिया में उन्हें तकलीफ पाकर भी, बहुत सुकून मिलता है ।। " सार यही है कि, संयम और नैतिकता के मिश्रण से नश्वर शरीर के मौज-मस्ती में फालतू खर्च न कर मितव्ययिता बरत सेवा, दान, उत्सव, देशहित में सदा अग्रणी भूमिका निभाने के साथ साथ क्षमा, आत्म-नियंत्रण, चोरी न करना, पवित्रता, इन्द्रिय-संयम, बुद्धि, विद्या, सत्य, धैर्य, क्रोध न करना जैसे गुण स्वत: ही विकसित होंगे, अर्थात सब पर दया करना, कभी झूठ नहीं बोलना, बड़ों का आदर करना, दुर्बलों को तंग न करना, चोरी न करना, हत्या जैसा कार्य न करना, सच बोलना, सबको समान समझते हुए उनसे प्रेम करना, सबकी मदद करना, किसी की बुराई न करना आदि कार्य अपनाते हुए जब हम जीवन जीते हैं, तो समाज में सम्मान पाते हैं और परोक्ष रूप से हम जहाँ भी रहेंगे, हमेशा भारत का गौरव बढ़ाते ही रहेंगे।

Login to Leave Comment
LoginNo Comments Found
संबंधित आलेख
पूर्णिमा का महत्व | पूर्णिमा व्रत
सप्ताह के किस दिन करें कौन से भगवान की पूजा | सात वार का महत्व
महा मृत्युंजय मंत्र का अर्थ, उत्पत्ति और महत्व | महा मृत्युंजय मंत्र का जाप करते समय रखें इन बातों का ध्यान | Maha Mrityunjaya Mantra
हिंदी भाषा से जुड़े रोचक तथ्य
मंदिर शब्द की उत्पत्ति कब हुई | मंदिर का निर्माण कब से शुरू हुआ?
तुलसी जी कौन थी? कैसे बनी तुलसी पौधे के रूप में ? | तुलसी विवाह
हिंदी वर्णमाला की संपूर्ण जानकारी | हिंदी वर्णमाला
अच्युत, अनंत और गोविंद महिमा
निष्कामता
हर दिन महिला दिन | Women's Day
33 कोटि देवी देवता
हिंदू संस्कृति के 16 संस्कार
हिंदी दिवस
शिक्षक दिवस
राखी
बचपन की सीख | बच्चों को लौटा दो बचपन
बात प्रेम की
महामाया मंदिर रतनपुर | संभावनाओ का प्रदेश - छत्तीसगढ़ | मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम का ननिहाल
माँ बमलेश्वरी मंदिर | संभावनाओ का प्रदेश - छत्तीसगढ़
माँ चंद्रहासिनी मंदिर | संभावनाओ का प्रदेश - छत्तीसगढ़
खल्लारी माता मंदिर | संभावनाओ का प्रदेश - छत्तीसगढ़
भारत को सोने की चिड़िया क्यों कहते थे | भारत देश
विश्व मासिक धर्म स्वच्छता दिवस | World Menstrual Hygiene Day
ज्योतिष शास्त्र | शनि न्याय प्रिय ग्रह क्यों है ?
वास्तु शास्त्र | वास्तुशास्त्र का उदगम
वास्तुशास्त्र में पूजा कक्ष का महत्व
पंचवटी वाटिका | पंचवटी का महत्व स्कंद पुराण में वर्णित
कृतज्ञता: मानसिक सेहत, रिश्तों और सकारात्मक जीवन का आधार
ज्योतिष की विभिन्न विधाये और राजा सवाई जयसिंह (जयपुर) का योगदान
संस्कारों की प्यारी महक
मिच्छामि दुक्कडम्
सत्संग बड़ा है या तप
ब्रह्मांड के स्वामी शिव
बलिदानी - स्वतंत्रता के नायक
महामृत्युंजय मंत्र | महामृत्युंजय मंत्र जाप
राम राज्य की सोच
भारतीय वैदिक ज्योतिष का संक्षिप्त परिचय
भारतीय वैदिक ज्योतिष का प्रचलन
मैच बनाने की मूल बातें (विवाह और ज्योतिष)
कुंडली मिलान | विवाह के लिए गुण मिलान क्यों महत्वपूर्ण है?
कुंडली चार्ट में घरों की बुनियादी समझ
सनातन संस्कृति में व्रत और त्योहारों के तथ्य
सनातन संस्कृति में उपवास एवं व्रत का वैज्ञानिक एवं धार्मिक पक्ष
2 जून की रोटी: संघर्ष और जीविका की कहानी
प्रकृति की देन - पौधों में मौजूद है औषधीय गुण
प्री वेडिंग – एक फिज़ूलखर्च
दो जून की रोटी
गणेश जी की आरती
भारतीय परम्परा की प्रथम वर्षगांठ
नव वर्ष
नहीं कर अभिमान रे बंदे
आज का सबक - भारतीय परंपरा
चाहत बस इतनी सी
नारी और समाज
माँ तू ऐसी क्यों हैं...?
दर्द - भावनात्मक रूप
पुरुष - पितृ दिवस
मितव्ययता का मतलब कंजूसी नहीं
सावन गीत
आया सावन
गुरु पूर्णिमा - गुरु की महिमा
सार्वजानिक गणेशोत्सव के प्रणेता लोकमान्य तिलक
शास्त्रीजी की जिन्दगी से हमें बहुत कुछ सीखने मिलता है | लाल बहादुर जयंती
कन्याओं को पूजन से अधिक सुरक्षा की जरूरत है ...!
जीवन में सत्संग बहुत जरूरी है
धर्म - धारण करना
आलस्य (Laziness)
प्रतिष्ठित शिक्षक - प्रेरक प्रसंग
राष्ट्र का सजग प्रहरी और मार्गदृष्टा है, शिक्षक
ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है?
संस्कृति का उद्गम संस्कृत दिवस | Culture origin in Sanskrit Day
75 बरस की आजादी का अमृत महोत्सव और हम
एक पाती शिक्षक के नाम – शिक्षक की भूमिका और मूल्य आधारित शिक्षा
बच्चों को लौटा दो बचपन – आधुनिक पालन-पोषण पर एक प्रेरक विचार
रामबोला से कालिदास बनने की प्रेरक कथा – भारत के महान कवि की जीवनी
त्रिदेवमय स्वरूप भगवान दत्तात्रेय
गणतंत्र दिवस – 26 जनवरी का इतिहास, महत्व और समारोह
बीते तीन साल बहुत कुछ सीखा गया | 2020 से 2022 तक की सीखी गई सीखें | महामारी के बाद का जीवन
रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाएं | कोविड से बचाव के लिए मजबूत इम्यूनिटी
वैदिक काल की विदुषी : गार्गी और मैत्रेयी
वर्तमान दौर में बदलता प्रेम का स्वरूप – एक विचारणीय लेख
जल संरक्षण आवश्यक है – पानी बचाएं, भविष्य सुरक्षित बनाएं
कुटुंब को जोड़ते व्रत और त्योहार – भारतीय परंपराओं का उत्सव
मेरे गाँव की परिकल्पना – विकास और विनाश पर एक काव्यात्मक चिंतन
जलवायु परिवर्तन और हमारी जिम्मेदारी: अब तो जागो
राजा राममोहन राय - आधुनिक भारत के जनक | भारत के महान समाज सुधारक
भविष्य अपना क्या है? | तकनीक और मोबाइल लत का युवाओं पर असर
प्रकृति संरक्षण ही जीवन बीमा है – पेड़ बचाएं, पृथ्वी बचाएं
वैदिक काल में स्त्रियों का स्थान – समान अधिकार और आध्यात्मिक ज्ञान
मेरे पिताजी की साइकिल – आत्मनिर्भरता और सादगी पर प्रेरक लेख
भारत रत्न गुलजारीलाल नन्दा (Guljarilal Nanda) – सिद्धांत, त्याग और ईमानदारी का प्रतीक
डिजिटल उपवास – बच्चों के लिए क्यों ज़रूरी है?
नववर्ष संकल्प से सिद्धि | सकारात्मक सोच, अनुशासन और लक्ष्य प्राप्ति
पीपल की पूजा | भारतीय परंपरा में पीपल पूजा का वैज्ञानिक आधार
जीवन में सत्य, धन और आत्मनियंत्रण की प्रेरणा
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और लोकतंत्र में इसका महत्व
महिला समानता दिवस | नारी सशक्तिकरण: चुनौतियाँ, प्रगति और भविष्य
मानसिक शांति और स्वास्थ्य के लिए दिनचर्या का महत्व
हिंदी की उपेक्षा अर्थात संस्कृति की उपेक्षा | हिंदी : हमारी भाषा, संस्कृति और शक्ति
चंद्रयान-3 की ऐतिहासिक सफलता
श्रावण माह: त्योहारों की शुरुआत
रिश्वतखोरी का अभिशाप
भारतीय संस्कृति की पहचान
प्रवासी भारतीय ही भारतीय संस्कृति के पहरेदार | नीदरलैंड में भारतीय संस्कृति का उजागर
वेदों की अमूल्य सूक्तियाँ – जानिए 80 अनमोल वैदिक रत्न
उत्सव नीरस जीवन में भरते है रंग | जीवन में उत्सवों का महत्व
सूर्य को जल अर्पण करना | सूर्य नमस्कार
विकसित सोच: सफलता की असली कुंजी
राम – सत्य और धर्म का सार
रावण की हड़ताल: दशहरा विशेष व्यंग्य
नथ का वजन – एक परंपरा का अंत
दुविधा – अनुभव और अस्वीकार्यता के बीच की दूरी
घर की लक्ष्मी हैं गृहणियाँ
आत्मकथा वसंत की | वसंत ऋतु
परीक्षा से डर कैसा
गाय और इस्लाम: विश्वास, नियम और सम्मान
भारतीय नववर्ष बनाम अंग्रेजी नववर्ष
श्रीराम - धर्म के मूर्तिमान स्वरूप
नदियों को बचाएं – जीवन और संस्कृति की रक्षा करें
भगवान श्रीराम के उच्चतम आदर्श
सनातन धर्म और अंधविश्वास का सच
विज्ञान दिवस और हमारे वैज्ञानिक
अमृत महोत्सव में संयम व नैतिकता: राष्ट्र निर्माण की आधारशिला
जीवन में सफलता के लिए निरंतर सीखना जरूरी
राम के आदर्श: रामायण से जीवन सीखें और अपने आचरण में उतारें
बच्चे सीखें भगवान श्रीराम के जीवनादर्श | रामायण से नैतिक शिक्षा
नारी का सम्मान और सामाजिक योगदान
यक्ष और युधिष्ठिर का दिव्य संवाद
जीवन का असली उद्देश्य – सेवा, प्रेम और सद्भावना से जीवन जीना
चलते रहने का महत्व – कर्म, धैर्य और सकारात्मक सोच की ताकत
घोड़े पर योद्धा की मूर्तियों के संकेत: मुद्रा क्या दर्शाती है?
मानसिक शांति के लिए क्यों ज़रूरी है एक अच्छी दिनचर्या?
आलस्य और डर से बाहर निकलें: मानसिकता में बदलाव
क्या वास्तव में “बी प्रैक्टिकल” होना ज़रूरी है?
अपराध नियंत्रण में संस्कारों की भूमिका और सामाजिक सुधार
विनम्रता: व्यक्तित्व को निखारने वाला सबसे सुंदर मानवीय गुण
दीपोत्सव: भारतीय व्यापार, संस्कृति और अर्थव्यवस्था में नई ऊर्जा
राम से बड़ा राम का नाम
सफलता का फार्मूला: अभ्यास और जीवन मूल्य
पर्यावरण संकट बढ़ रहा है—अब बदलाव हमारी ज़िम्मेदारी है
अन्न का दुरुपयोग – दिखावे की संस्कृति में बर्बादी
किशोरों में बढ़ती आपराधिक प्रवृत्तियाँ
अयोध्या राम मंदिर का इतिहास और निर्माण
पहलगाम हमला: जब इंसानियत को धर्म से तोला गया
श्रम बिकता है, बोलो... खरीदोगे?
जीवन में सफलता के लिए धैर्य का महत्व
अहंकार का अंधकार | व्यक्तित्व और समाज पर प्रभाव
चलिष्याम निरंतर | जोखिम, परिवर्तन और सफलता का संबंध
रामायण महाभारत के युद्ध बनाम आधुनिक युद्ध
सच कहने का साहस है.. सलीका है कविता
सामाजिक संकट एवं सांस्कृतिक अवसाद की ओर बढ़ते भारतीय परिवार
चातुर्मास - सनातनी विज्ञान | पाँच तत्व, विज्ञान और परंपरा
मानवीय सद्गुण की आज बड़ी जरूरत | विनम्रता की शक्ति
जीवन में निर्णय का महत्व
तुलसीदास की दृष्टि में नारी शक्ति, प्रकृति, अग्नि और काल का दर्शन
प्रदूषण और निजी वाहनों का बढ़ता प्रभाव
सरकारी नियंत्रण से मन्दिरों को मुक्त करें – एक सनातनी पुकार
खिचड़ी: ढाई हजार साल पुराना भारतीय व्यंजन, स्वाद, परंपरा और इतिहास के साथ
भारत के शहरी क्षेत्रों में वाहन पार्किंग की चुनौतियाँ और समाधान
सहनशीलता का गिरता स्तर और समाज पर इसके हानिकारक प्रभाव | धैर्य और क्षमा का महत्व
कुंबकोणम के शक्ति मुत्तम मंदिर और गरीब पंडित की बगुला संदेश की कहानी
क्या हमारे कार्य करने की कोई सीमा होती है?
कम्फर्ट ज़ोन से बाहर निकलें और अपनी असली क्षमता पहचानें
अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस – नारी शक्ति को सलाम
शब्द ही ब्रह्म है क्योंकि शब्दों से ही इस त्रिगुणात्मक संसार का सृजन संभव है
आंतरिक और बाहरी दुनिया — ध्यान से आत्म नियंत्रण की शक्ति
हेमू कालाणी – भारत के युवा स्वतंत्रता सेनानी
21वीं सदी: अवसर, चुनौतियाँ और डिजिटल युग में बाल मन का भविष्य
दर्शन क्या है? देखने और दर्शन के गहरे अंतर की आध्यात्मिक समझ
भक्ति का सच्चा अर्थ: मंदिरों से आगे, मानवता की ओर
क्षमा का मूल्य: भारतीय संस्कृति में क्षमाशीलता की परंपरा
अज्ञान से ज्ञान की ओर: वैदिक साहित्य में प्रकाश, सद्गुण और श्रेय मार्ग का संदेश
नारी: परिवार की कुशल प्रबंधक — भारतीय संस्कृति में नारी की शक्ति, भूमिका और महत्व
जीवन की बाँसुरी: सरलता से चुनौतियों को मधुर बनाने की कला
उत्तर भारत में पराली जलाना: किसानों और पर्यावरण के लिए स्थायी समाधान
पहली तूलिका, पहली कहानी: भारत के प्रागैतिहासिक शैल चित्रों का अद्भुत संसार
रामचरितमानस में हास्य और व्यंग्य: तुलसीदास की अनोखी रचनात्मकता
भाषा का महत्व: मधुर वाणी, संस्कार और सभ्यता का वास्तविक परिचय
जीवन की बाँसुरी: कठिनाइयों को सरलता से जीतने की प्रेरणादायक सीख
हर विचार का आकर्षण
भारतीय नववर्ष क्यों मनाया जाता है??
डॉ. विक्रम साराभाई: भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के जनक
वीर बाल दिवस 26 दिसंबर | साहिबजादा जोरावर सिंह और फतेह सिंह की अमर शहादत
माँ सरस्वती की आरती | विद्या की देवी
लेखक के अन्य आलेख
डॉ. विक्रम साराभाई: भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के जनक
दर्शन क्या है? देखने और दर्शन के गहरे अंतर की आध्यात्मिक समझ
ऋतुओं के संधि काल का पर्व - होली | रंगों और उल्लास का आध्यात्मिक पर्व
सरकारी नियंत्रण से मन्दिरों को मुक्त करें – एक सनातनी पुकार
चातुर्मास - सनातनी विज्ञान | पाँच तत्व, विज्ञान और परंपरा
पर्यावरण संकट बढ़ रहा है—अब बदलाव हमारी ज़िम्मेदारी है
विनम्रता: व्यक्तित्व को निखारने वाला सबसे सुंदर मानवीय गुण
घोड़े पर योद्धा की मूर्तियों के संकेत: मुद्रा क्या दर्शाती है?
यक्ष और युधिष्ठिर का दिव्य संवाद
अमृत महोत्सव में संयम व नैतिकता: राष्ट्र निर्माण की आधारशिला
वेदों की अमूल्य सूक्तियाँ – जानिए 80 अनमोल वैदिक रत्न
श्रावण माह: त्योहारों की शुरुआत
महिला समानता दिवस | नारी सशक्तिकरण: चुनौतियाँ, प्रगति और भविष्य
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और लोकतंत्र में इसका महत्व
भारत रत्न गुलजारीलाल नन्दा (Guljarilal Nanda) – सिद्धांत, त्याग और ईमानदारी का प्रतीक
मेरे पिताजी की साइकिल – आत्मनिर्भरता और सादगी पर प्रेरक लेख
राजा राममोहन राय - आधुनिक भारत के जनक | भारत के महान समाज सुधारक
जलवायु परिवर्तन और हमारी जिम्मेदारी: अब तो जागो
जल संरक्षण आवश्यक है – पानी बचाएं, भविष्य सुरक्षित बनाएं
रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाएं | कोविड से बचाव के लिए मजबूत इम्यूनिटी
बीते तीन साल बहुत कुछ सीखा गया | 2020 से 2022 तक की सीखी गई सीखें | महामारी के बाद का जीवन
त्रिदेवमय स्वरूप भगवान दत्तात्रेय
रामबोला से कालिदास बनने की प्रेरक कथा – भारत के महान कवि की जीवनी
महालया से छठ पूजा तक – भारतीय पर्वों की आध्यात्मिक यात्रा
ऋषि पंचमी – परंपरा और प्रेम का पवित्र सूत्र | Rishi Panchami
75 बरस की आजादी का अमृत महोत्सव और हम
प्रतिष्ठित शिक्षक - प्रेरक प्रसंग
शास्त्रीजी की जिन्दगी से हमें बहुत कुछ सीखने मिलता है | लाल बहादुर जयंती
सार्वजानिक गणेशोत्सव के प्रणेता लोकमान्य तिलक
मितव्ययता का मतलब कंजूसी नहीं
प्रकृति की देन - पौधों में मौजूद है औषधीय गुण
राम राज्य की सोच
अक्षय फलदायक पर्व है अक्षय तृतीया
सौभाग्य को बनाये रखने हेतु मनाया जाता है गणगौर पर्व
सत्संग बड़ा है या तप