अभिवादनशीलता
अच्छे स्वास्थ्य और दीर्घायु के लिए अनिवार्य है अभिवादनशीलता
पुराणों में महर्षि मार्कंडेय की एक कथा मिलती है। महर्षि मार्कंडेय मृकंडु के पुत्र थे। महर्षि मार्कंडेय जब मात्र पाँच वर्ष के थे तभी उनके पिता मृकंडु को पता चला कि मेरे पुत्र की आयु तो केवल छह महीने की ही बची है तो उन्हें बड़ी निराशा और चिंता हुई। पिता मृकंडु ने अपने पुत्र का यज्ञोपवीत संस्कार करवाया और उसे उपदेश दिया -
यं कश्चिद् वीक्षसे पुत्र भ्रममाणं द्विजोत्तमम्।
तस्यावश्यं त्वया कार्यं विनयादभिवादनम्।।
पुत्र! तुम जब भी किसी द्विजोत्तम को देखो तो विनयपूर्वक उसका अभिवादन अवश्य करना, उसे प्रणाम करना। मृकंडु का पुत्र अत्यंत आज्ञाकारी बालक था अतः उसने पिता द्वारा प्रदत्त व्रत को दृढ़तापूर्वक धारण किया। अभिवादन उसके जीवन का अभिन्न अंग बन गया। जो भी बालक के समक्ष आता बालक उसे प्रणाम करना न भूलता। अभिवादनशीलता उसका संस्कार बन गया।
एक बार सप्तऋषि भी उस मार्ग से जा रहे थे। बालक मार्कंडेय ने संस्कारवश अत्यंत आदरपूर्वक उन्हें भी प्रणाम किया। सप्तऋषियों ने बालक को दीर्घायु होने का आशीर्वाद दिया। सप्तऋषियों के आशीर्वाद से अल्पायु बालक मार्कंडेय को कल्प-कल्पांत की आयु प्राप्त हो गई। अपनी अभिवादनशीलता के गुण के कारण वे चिरंजीवी हो गए। जब कोई संबंधी, मित्र अथवा अन्य अतिथि हमारे घर आता है तो हम न केवल उस समय उसका यथोचित सत्कार करते हैं अपितु जब वह वापस जाता है तो जाते समय भी उसे सम्मान के साथ विदा करते हैं। कुछ लोग किसी को विदा करते समय किसी भी प्रकार की औपचारिकता का निर्वाह नहीं करते जो उचित प्रतीत नहीं होता। मेहमान को भी चाहिए कि जाने से पहले उचित रीति से इजाज़त ले और मेज़बान ठीक तरह से उसे विदा करे।
जहाँ तक संभव हो मेहमान को बस स्टैंड, ऑटो या रिक्शा स्टैंड अथवा उसके निजी वाहन तक छोड़ने जाएँ। आज लोगों के पास समय की बेहद कमी है। कई बार मेहमान को घर के दरवाज़े पर ही विदा करना पड़ता है। ये परिस्थितिजन्य विवशता भी हो सकती है लेकिन यदि हम किसी व्यक्ति को घर के दरवाज़े से ही विदा कर रहे हैं तो भी शिष्टाचारवश कुछ बातों का ध्यान रखना ज़रूरी है। आगंतुक के बाहर निकलते ही फौरन खटाक से दरवाज़ा बंद न करें अपितु तब तक दरवाज़ा खुला रखें जब तक मेहमान आँखों से ओझल न हो जाए या कम से कम थोड़ी दूर न चला जाए। उसके बाद बिना आवाज़ किए धीरे से दरवाज़ा बंद कर लेना चाहिए। जैसे किसी के बाहर निकलते ही एकदम भड़ाक से दरवाज़ा बंद करना अच्छा नहीं लगता उसी प्रकार यदि रात का समय है तो आगंतुक के बाहर निकलते ही मेन गेट या ज़ीने की लाइट बंद करना भी एकदम ग़लत है।
अपरिचित या अवांछित आगंतुक से भी नम्रता से पेश आना चाहिए। इसका ये अर्थ नहीं है कि हम अपनी सुरक्षा का ध्यान न रखें। अपरिचित के लिए मेन गेट या लोहे का जाली वाला दरवाज़ा एकदम से न खोलें। पूर्ण रूप से आश्वस्त होने पर ही दरवाज़ा खोलें लेकिन इस दौरान बातचीत अथवा पूछताछ में शिष्टाचार का ध्यान रखें। प्रत्यक्ष रूप से मिलने पर ही नहीं फोन पर बातचीत करते समय भी अभिवादन की औपचारिकता का पालन करना चाहिए। शिष्टाचार एवं अनुशासित जीवन का हमारे स्वास्थ्य एवं आयु से गहरा संबंध है। इन नियमों का पालन करने से न केवल हमारे संबंध अधिक मधुर एवं अर्थपूर्ण होंगे अपितु हम तनाव से भी मुक्त रहेंगे जिसका हमारे स्वास्थ्य पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा और स्वास्थ्य का आयु पर ।
कहा गया हैः
अभिवादनशीलस्य नित्यंवृद्धोपसेविनः।
चत्वारि तस्य वर्धन्ते आयुर्विद्यायशोबलम्।।
अर्थात् जो वृद्धजनों, गुरुजनों तथा माता-पिता को नित्य प्रणाम करता है, उनकी सेवा करता है उसकी आयु, विद्या, यश और बल, ये चार चीज़ें सदैव बढ़ती हैं। और जिस व्यक्ति में इन चार चीज़ों की वृद्धि होगी उसके स्वस्थ रहने में कोई संदेह नहीं। दीर्घायु होने और स्वस्थ बने रहने के लिए अभिवादनशीलता व शिष्टाचार का पालन करना किसी तरह भी महँगा सौदा नहीं।

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