Bhartiya Parmapara

दर्शन क्या है? देखने और दर्शन के गहरे अंतर की आध्यात्मिक समझ

दर्शन क्या है?

दर्शन क्या है? अक्सर मैंने देखा है लोग तीर्थ यात्रा पर जाते है किसलिए?  भव्य मन्दिर और मूर्तियों को देखने के लिए, ना कि दर्शन के लिए।  
अब आप सोच रहे होंगे की देखने और दर्शन करने में क्या अन्तर है ? देखने का मतलब है, सामान्य देखना जो हम दिनभर कुछ ना कुछ देखते रहते हैं। किन्तु दर्शन का अर्थ होता है– जो हम देख रहे है 'उसके पीछे  छुपे तथ्य और सत्य को जानना’। देखने से मनोरंजन हो सकता है,   
परिवर्तन नहीं। किन्तु दर्शन से मनोरंजन हो ना हो लेकिन परिवर्तन अवश्यम्भावी है। इसलिये दर्शन वह है-  
1] जो आपके जीवन को बदलने की प्रेरणा दे।  
2] जो आपके जीवन का कायाकल्प कर दे।  
3] जो आपके जीवन में आमूल – चूल परिवर्तन कर दे।  
अंग्रेजी में दर्शन का मतलब होता है – फिलोसोफी, जिसका अर्थ होता है - यथार्थ की परख का दृष्टिकोण।

रामकृष्ण परमहंस की दक्षिणेश्वर की काली को उनसे पहले और उनके बाद हजारों लोगों ने देखा किन्तु किसी को दर्शन नहीं हुआ। क्यों ? क्योंकि रामकृष्ण परमहंस ने ना केवल काली की मूर्ति को देखा बल्कि उसके दर्शन को समझा इसलिए काली ने रामकृष्ण परमहंस को दर्शन दिया।   
भगवान श्री राम के मन्दिर जाकर उनकी मूर्ति के दर्शन करने का मतलब है उनके जीवन चरित को समझा जाये और उसी के अनुसार अपने जीवन में परिवर्तन किया जाये। यही राम का दर्शन है। यदि आप राम की मूर्ति तो देखते हैं किन्तु अपने जीवन में कोई परिवर्तन नहीं करते हैं तो फिर आपको राम के दर्शन का कोई लाभ नहीं मिलने वाला।  
यदि आप शिवजी के दर्शन करने जाते हैं और आपके मन में क्रोध, ईर्ष्या, द्वेष ही भरा है तो फिर दर्शन का क्या लाभ? इसी तरह यदि आप हनुमानजी के दर्शन करने जाते हैं और आपका मन पवित्र नहीं है, स्त्रियों पर आपकी गलत दृष्टि है तो फिर हनुमानजी का दर्शन करना बेकार है।  
"भक्त वही सच्चा, जो है अभी बच्चा" जो बड़ा हो गया वो भक्त नहीं हो सकता और जो भक्त हो गया उसमें बड़प्पन नहीं हो सकता।



   

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