राष्ट्र चेतना के ऋषि - स्वामी दयानन्द सरस्वती
१२ फरवरी १८२४ को मूल नक्षत्र में पैदा होने पर बचपन वाले मूलशंकर, बाद में स्वामी पूर्णानंद सरस्वती से सन्यास ग्रहण कर, उनको अपना गुरु मान मूलशंकर से दयानन्द सरस्वती बने। इन्होनें बाद में वेदों का गहन अध्ध्यन के लिये मथुरा में वेदों के प्रकाण्ड विद्वान् प्रज्ञाचक्षु स्वामी विरजानन्द के पास पहुँच फिर उनसे वेदों की शिक्षा ग्रहण की तथा उन्हीं से आज्ञा प्राप्त करके इन्होनें सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ ‘सत्यार्थ प्रकाश’, मूल रूप में हिन्दी भाषा में रचना की तथा चैत्र शुक्ल प्रतिपदा सम्वत् १९३२ (सन् १८७५) को गिरगांव, मुम्बई में आर्य समाज की स्थापना की। वे आधुनिक भारत के महान चिंतक, समाज सुधारक और देशभक्त उन्होंने वेदों की सत्ता को सदा सर्वोपरि माना। स्वामी दयानन्द सरस्वतीजी ने देश के स्वतन्त्रता आन्दोलन की १८५७ में हुई क्रान्ति में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उन्होंने वर्ष १८५५ में इस क्रान्ति के कर्णधार नाना साहेब, तात्या टोपे, अजीमुल्ला खान, बाला साहब व बाबू कुँवरसिंह से हरिद्वार में मुलाकात कर देश में सशस्त्र क्रान्ति की आधारशिला तैयार की। हरिद्वार में ही १८५५ की बैठक में बाबू कुँवरसिंह ने जब अपने इस संघर्ष में सफलता की सम्भावना के बारे में स्वामी से पूछा तो उनका बेबाक उत्तर था स्वतन्त्रता संघर्ष कभी असफल नहीं होता। भारत धीरे-धीरे एक सौ वर्ष में परतन्त्र बना है। अब इसको स्वतन्त्र होने में भी एक सौ वर्ष लग जायेंगे। इस स्वतन्त्रता प्राप्ति में बहुत से अनमोल प्राणों की आहुतियाँ डाली जायेंगी। उनका यह कथन एकदम सही साबित हुआ। देश को आजाद होने में नब्बे साल और लग गए और इसके लिए सैकड़ों लोगों ने अपने प्राणों का आहुति दी।
उनका आदर्श था- “कृण्वन्तो विश्वमार्यम्” अर्थात हम पूरे विश्व को श्रेष्ठ बनाएँ, हम पूरे विश्व में श्रेष्ठ विचारों का, मानवीय आदर्शों का संचार करें और इस सिद्धान्त के लिये उन्होंने जिस तरह से बाल विवाह और बहुविवाह का विरोध किया, अन्धविश्वासों और कुरीतियों को दूर करने के लिए काम किया और सार्वभौमिक शिक्षा का प्रस्ताव रखा ये सब रुढ़िवादीयों को पसन्द नहीं आ रहा था।
फलत: इनकी हत्या व अपमान के लगभग ४४ प्रयास हुये [जिसमें से १७ बार विभिन्न माध्यमों से विष देकर] लेकिन जैसा आप सभी जानते हैं - लाभ हानि जीवन मरण जश अपयश विधि हाथ लेकिन फिर भी इनकी मृत्यु नहीं हुई।
वर्ष १८८३ में वे जोधपुर नरेश महाराजा जसवन्त सिंह के निमन्त्रण पर जोधपुर आए हुए थे। वहाँ उनके नित्य ही प्रवचन होते थे। यदाकदा महाराजा जसवन्त सिंह भी उनके प्रवचन सुनते। दो-चार बार स्वामी भी राज्य महलों में गए। वहाँ पर उन्होंने नन्ही नामक वेश्या का अनावश्यक हस्तक्षेप और महाराजा जसवन्त सिंह पर उसका अत्यधिक प्रभाव देखा। स्वामी दयानन्दजी को यह सब बहुत बुरा लगा। उन्होंने महाराजा को इस बारे में समझाया तो उन्होंने विनम्रता से उनकी बात स्वीकार कर ली और नन्ही से सम्बन्ध तोड़ लिए। इससे नन्ही स्वामी दयानन्दजी से नाराज हो गई और उन्हें राह का रोड़ा मान उनको हटाने की जुगत भिड़ाने में जुट गई। उसने स्वामी दयानन्दजी के रसोइए कलिया उर्फ जगन्नाथ को अपनी तरफ मिला कर उनके दूध में पिसा हुआ काँच डलवा दिया। खासियत की बात यह रही कि काँच मिश्रित दूध पिलाने के बाद नन्ही को बहुत पछतावा हुआ और उसने स्वामी दयानन्दजी के पास जाकर अपना अपराध स्वीकार कर लिया।नन्ही ने स्वामीजी से माफी माँगी तो उदार ह्रदय के साथ उन्होंने उसे क्षमा करते हुए कुछ पैसे देकर जोधपुर से चले जाने को कहा ताकि वह सजा से बच सके। बाद में जब स्वामी दयानन्दजी को जोधपुर के अस्पताल में भर्ती करवाया गया। बाद में जब स्वामी दयानन्दजी की तबीयत बहुत खराब होने लगी तो उन्हें अजमेर के अस्पताल में ले जाया गया, लेकिन तब तक काफी विलम्ब हो चुका था। इस तरह बीमार हुए स्वामीजी कभी उबर नहीं पाए और दीपावली के दिन उन्होंने देह त्याग दी।
अन्त में उनके अतुलनीय योगदान को याद करते हुये इनकी २०२वीं जयन्ती पर शत्-शत् नमन् करते हुए बताना चाहता हूँ कि वे ऐसे पहले व्यक्ति थे जिन्होंने भारत भारतीयों के लिये है को बताते हुए सबसे पहले अपने अर्थात भारतीय मुक्ति संग्राम हेतु स्वराज्य शब्द का न केवल प्रयोग किया बल्कि इसकी महत्ता भी समझायी। इसके अलावा हिन्दी भाषा के प्रबल समर्थक स्वामी दयानन्दजी का कहना था कि “मेरी आंख तो उस दिन को देखने के लिए तरस रही है, जब कश्मीर से कन्याकुमारी तक सब भारतीय एक भाषा बोलने और समझने लग जायेंगे” लेकिन जोधपुर की एक वेश्या की नाराजगी आर्य समाज प्रणेता और महान समाज सुधारक स्वामी दयानन्द सरस्वतीजी पर बहुत भारी पड़ी और उसके चलते उन्हें आखिरकार अपनी जान तक गँवानी पड़ी।

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