Bhartiya Parmapara

अन्न का दुरुपयोग – दिखावे की संस्कृति में बर्बादी

अन्न जीवन का आधार

अन्न जीवन का आधार पर दिखावे में बड़ा दुरुपयोग 
अन्न शरीर की मुख्य आवश्यकता है। इससे शरीर पुष्ट होता है और शरीर को ऊर्जा मिलती है। अन्न की प्रकृति का भी अपना प्रभाव है। कहावत है- 'जैसा खाओ-अन्न वैसा बने मन'। पेट भरने के लिए ही संसार चल रहा है। किसी को जरूरत लायक पूर्ति चाहिए तो कोई संग्रहण में जुटा हुआ है। बावजूद इसके अन्न का पुरी तरह सदुपयोग नहीं हो पाता है और इसी वजह से लाखों क्विंटल अन्न प्रतिदिन नालियों में बह जाता है।

अन्न को देव माना है फिर भी लोग दिखावे के नाम पर झुठा छोड़ते ही है।

अन्न का दुरुपयोग - घर से लेकर धार्मिक, सार्वजनिक आदि आयोजनों में भोजन बनाया जाता है उन सब की किस्म अलग-अलग होती है। घरों में बहुत सामान्य भोजन बनता है किंतु आयोजनों में कई प्रकार के पकवान, सब्जियां और खानें की तरह तरह की चीजें बनतीं है‌। कई तरह की स्वादिष्ट चीजें बनने से खानें वाले अपनी इच्छा पर नियंत्रण नहीं रख पाते और बनी हुई हर सामग्री थाली में ले लेते हैं। थाली तो पुरी भरी होती है लेकिन उसका उतना ही उपयोग कर पाते है जितनी पेट में जगह होती है। भरपेट या उससे भी अधिक खाने के बाद थाली में अवश्य बचता है और इस प्रकार कई थालियों से बचा हुआ अन्न बड़ी मात्रा में जानवरों के मुंह तक पहुंचता है। अन्न अगर मानव के पेट में नहीं पहुंचकर वह किसी भी रूप में उपयोग में नहीं आता तो यह उसका अपमान है और एक पाप ही है।

अन्न की प्रकृति है तृप्ति - भोजन कैसा भी बनें वह आखिरकार शरीर को तृप्ति देता ही है।

अक्सर देखा गया है कि सादा भोजन जितना बनता है उसका ज्यादातर उपयोग हो ही जाता है लेकिन स्वाद के लिए बना भोजन थाली से नाली तक पहुंचता है। आजकल वैवाहिक आयोजनों में इतने प्रकार की मिठाइयां, नमकीन आदि बनती है कि उन सबको खा पाना संभव नहीं होता ऐसे में उसका दुरुपयोग होना ही है। लोग एक एक टुकड़ा लेकर भी उसमें से भी झुठा छोड़ देते हैं।

झुठा छोड़ना एक संस्कृति - खानपान के नाम पर भी लोग दिखावा करते हैं। चाय, नाश्ता, खाना, फल जब भी परोसा जाता है तो अक्सर लोग उसमें से कुछ ना कुछ झुठा अवश्य छोड़ देते हैं। इसके पीछे लोगों की ऐसी मानसिकता होती है कि चाहे चाय हो या नाश्ता या कुछ और उसे प्लेट में पूरी तरह खाने की बजाय कुछ हिस्सा छोड़ दिया जाना चाहिए इससे उनकी विशिष्टता झलकती है। ऐसे में दिखावे के चक्कर में खानपान की चीजों के नाम अन्न का कितना दुरुपयोग होता है यह सोचने समझने वाली बात है।

                                    

                                      

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