Bhartiya Parmapara

डॉ. विश्वास की ईमानदारी: बाल श्रम, भ्रष्टाचार और नैतिक साहस की सच्ची कहानी

नुक्सान 

 

डॉ. विश्वास का आज इस नए हॉस्पीटल में पहला ही दिन था। पिछले सप्ताह ही उसकी एमडी पूरी हुई थी और एक सप्ताह के अंदर ही उसे एक सरकारी हॉस्पीटल में नौकरी मिल गई थी। हॉस्पीटल से लौटने के बाद विश्वास बहुत प्रसन्नचित लग रहा था। उसके चेहरे पर व्याप्त प्रसन्नता को देखकर उसके माता-पिता और उसकी बहन सभी बड़े ख़ुश थे। बहन ने कहा, ‘‘लगता है भाई आप इस नौकरी व हॉस्पीटल के माहौल से ख़ुश हो।’’  
‘‘हाँ, हूँ लेकिन मेरी ख़ुशी का एक कारण और भी है,’’ विश्वास ने कहा।  
‘‘क्या?’’ घर के सभी सदस्यों ने एक साथ उत्सुकता प्रदर्शित की।  
विश्वास ने कहा कि आज पहले ही दिन दस हज़ार रुपए का नुक़सान हो गया।  
‘‘कैसे?’’ पुनः एक समवेत स्वर उभरा। माँ ने जिज्ञासा प्रकट की, ‘‘नुक़सान होने पर भी कोई ख़ुश होता है क्या?’’ 
‘‘बात को घुमा-फिराकर कहने की बजाय सीधे-सीधे क्यों नहीं बतलाता कि क्या हुआ? मोबाइल खो गया? जेब कट गई?  
नुक़सान कैसे हो गया?’’ पिताजी ने एक ही बार में लगातार कई सवाल कर डाले।  
नहीं, नहीं, आप घबराइए नहीं, ऐसा कुछ नहीं हुआ है विश्वास ने सबको आश्वस्त करते हुए कहा।

दरअसल आज एक एनजीओ ने एक फ़ैक्टरी पर छापा मारकर वहाँ काम कर रहे कुछ नाबालिग़ बच्चों को छुड़वाया था। उन बच्चों की उम्र की जाँच करवाने के लिए पुलिस उन्हें लेकर डॉ. विश्वास के हॉस्पीटल आई थी।

उसी दौरान डॉ. विश्वास के रूम में एक आदमी आया और मेज़ पर कुछ रुपए रखते हुए बोला कि डॉक्टर ये दस हज़ार रुपए हैं इन्हें रख लो और अपनी रिपोर्ट में प्लीज़ सभी बच्चों की उम्र पंद्रह साल से ऊपर लिख दो।

लेकिन उनमें से कोई भी बच्चा चौदह साल से ज़्यादा उम्र का नहीं लग रहा था। कई बच्चे तो दस-बारह साल के ही लग रहे थे। उन बच्चों की हालत देखकर ही डॉ. विश्वास को बड़ा दुख हो रहा था।

डॉ. विश्वास ने नोटों का पैकेट उठाकर वापस उस आदमी के हाथ में देते हुए उसे फौरन बाहर निकल जाने का इशारा किया। जब उस आदमी ने कहा कि वह जितने चाहिए और रुपए देने को तैयार है तो डॉ. विश्वास को ग़ुस्सा आ गया और उसने एक तरह से धक्का मार कर उसे बाहर कर दिया।  
डॉ. विश्वास ने वही रिपोर्ट लिखी जो ठीक थी और एकदम सही उम्र का पता लगाने के लिए बोन ऑसिफिकेशन टेस्ट के लिए सारे केस आगे रैफ़र कर दिए। पूरी घटना का विस्तारपूर्वक वर्णन करने के बाद डॉ. विश्वास ने काल्पनिक गंभीरता के साथ कहा, ‘‘तो हो गया न पहले ही दिन दस हज़ार रुपए का नुक़सान।’’

‘‘बेटा ऐसा नुक़सान रोज़-रोज़ करके आना और हमें बतलाना। इसी में हमें सच्ची ख़ुशी मिलेगी। मैं सचमुच बहुत ख़ुश हूँ कि हमारे बच्चे नुक़सान करना सीख रहे हैं और ये नुक़सान ही हमारा सबसे बड़ा फ़ायदा है,’’ - ये कह कर पिताजी ने अपना हाथ विश्वास के सिर पर रख दिया और विश्वास ने अपना सिर पिताजी के कंधे से सटा दिया।

                                    

                                      

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