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प्राचीन भारतीय ज्ञान परम्परा एवं संस्कृत कथा साहित्य – दर्शन, परंपरा और सांस्कृतिक विरासत

प्राचीन भारतीय ज्ञान परम्परा एवं संस्कृत कथा साहित्य

एक वैदिक उक्ति है— “आ नो भद्राः क्रतवो यंतु विश्वतः”—अर्थात सभी दिशाओं से विचारों को आने दो। हर युग की अपनी ऐतिहासिक सीमा में तर्कसम्मत विचारों की खोज हुई है। उनका संबंध मानव-स्मृतियों के साथ-साथ नए-नए स्वप्नों से भी रहा है। भारतीय साहित्य में स्वच्छंदता कीआवाज़ों का एक लंबा सिलसिला दिखाई देता है। स्वच्छंदता एक सनातन प्रतिपक्ष है, जिसका लक्ष्य विभिन्न युगों की ऐतिहासिक सीमाओं में मानवतावादी पुनर्निर्माण रहा है।

उपनिषदें आपस में श्रेष्ठता के लिए संघर्षरत वैदिक देवताओं के भौतिकवाद की प्रतिपक्ष हैं। इन्होंने वेदांत का प्रतिपादन किया, जो अखंडता का संदेश देते हुए कहता है— “तत्त्वमसि”—अर्थात जो तू है वही मैं हूँ। भारतीय ज्ञान परम्परा पर चर्चा करते समय यह देखना आवश्यक है कि उसमें विचारों की स्वतंत्रता के लिए कितनी जगह है। भारतीय ज्ञानियों का यह विश्वास रहा है— “वादे-वादे जायते तत्त्वबोधः”—अर्थात अहंकार से मुक्त संवाद ही सत्य का बोध कराता है। एक अन्य महत्वपूर्ण कथन है— “सत्य का मुख स्वर्ण पात्र से ढका है” (ईशावास्योपनिषद)। इन दोनों कथनों से यह निष्कर्ष निकलता है कि ज्ञान और अहंकार परस्पर विरोधी हैं। इसी प्रकार ज्ञान और भोग-विलास भी विपरीत प्रवृत्तियाँ हैं। ज्ञान परम्परा पर भाषण देना और ज्ञान परम्परा पर चलना—ये दोनों भिन्न बातें हैं।

प्राचीन भारतीय समाज एवं संस्कृति ने आध्यात्मिक ज्ञान को अत्यधिक महत्त्व प्रदान किया है। भारतीय ज्ञान परम्परा में विश्व की सर्वाधिक समृद्ध बौद्धिक सम्पदा निहित है। इस अविरल ज्ञान परम्परा का प्रवाह वैदिक वाङ्मय से लेकर समकालीन चिंतन तक निरंतर विद्यमान रहा है। इसमें दर्शन, नीतिशास्त्र, अर्थशास्त्र, धर्मशास्त्र, काव्यशास्त्र तथा राजनीतिशास्त्र जैसी विविध विधाओं का अध्ययन होता रहा है। भारतीय दर्शन विचारों का ऐसा समुच्चय है, जिसने लगभग दो हजार वर्षों तक न केवल भारतीय उपमहाद्वीप, बल्कि एशिया महाद्वीप के सामाजिक, सांस्कृतिक एवं राजनैतिक परिवेश को भी व्यापक रूप से प्रभावित किया।

भारतीय दर्शन की अविरल परम्परा में धर्म, राजनीति, न्याय, विधि, शासन और समाज से संबंधित विचारों का गहन विश्लेषण किया गया है। इसने न केवल आध्यात्मिक और सामाजिक जीवन की रूपरेखा प्रस्तुत की, बल्कि राजनैतिक दृष्टि से भी समाज के संचालन की दिशा निर्धारित की। यद्यपि समय के साथ पश्चिमीकरण ने भारतीय ज्ञान परम्परा को प्रभावित किया, तथापि भारत सरकार की राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के माध्यम से भारतीय ज्ञान परम्परा को पुनः स्थापित करने का सार्थक प्रयास किया जा रहा है। इसके द्वारा समाज में भारतीय दर्शन एवं विचारधारा की महत्ता को पुनः प्रतिष्ठित करने की दिशा में ठोस कदम उठाए जा रहे हैं।

भारतीय ज्ञान परम्परा का इतिहास अत्यंत समृद्ध एवं गौरवमयी रहा है, जिसने विश्व की अनेक सभ्यताओं को प्रभावित किया है। इस परम्परा में समाहित संस्कृत कथा साहित्य के सामाजिक, राजनैतिक और नैतिक सिद्धांतों का गहन अध्ययन, अनुशीलन और विश्लेषण समकालीन समस्याओं के समाधान में सहायक सिद्ध हो सकता है।

विश्व कथा साहित्य में संस्कृत का कथा साहित्य सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। कथा साहित्य का उद्गम स्रोत भारतीय कथा साहित्य को ही माना जाता है, इसलिए इसे कथा साहित्य का जनक भी कहा जाता है। भारतीय कथा साहित्य में संस्कृत कथा साहित्य का विशिष्ट स्थान है। इन कथाओं में भारतीय दर्शन, संस्कृति, लोक-व्यवहार तथा जीवन-पद्धति की सजीव झाँकी मिलती है।

भारतवर्ष के विविधतापूर्ण वातावरण में विस्मय और कौतुहल का व्यापक प्रसार हुआ है। मानव स्वभावतः जिज्ञासु प्रवृत्ति का होता है और इसी जिज्ञासा को संस्कृत कथा साहित्य में प्रभावी रूप से अभिव्यक्त किया गया है।

संस्कृत साहित्य में कथाएँ केवल मनोरंजन या कौतुक के लिए ही नहीं, बल्कि धार्मिक, नैतिक और सामाजिक शिक्षण के लिए भी प्रयुक्त की गई हैं। इनमें पशु-पक्षियों एवं अन्य जीवों को मानवीय प्रतीकों के रूप में प्रस्तुत किया गया है। इसी कारण आबाल-वृद्ध सभी वर्ग संस्कृत कथा साहित्य की मनोहरता से सहज रूप से आकर्षित होते हैं।



          

 

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