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किशोरों में बढ़ती आपराधिक प्रवृत्तियाँ

किशोरों में बढ़ती आपराधिक प्रवृत्ति

किशोरों में बढ़ती आपराधिक प्रवृत्ति चिंताजनक  
किशोरावस्था शैशव तथा बाल्यकाल के उपरांत आती है। यह 13 से 19 वर्ष तक की आयु तक का काल है। किशोरावस्था में बालक के शरीर और व्यवहार में तूफान गति से परिवर्तन होते हैं। उसमें अटपटापन, तनाव, आक्रोश, झंझावात, तीव्रता, आक्रामकता एवं अहं सम्प्रयुक्तता पायी जाती है। नए जीवन दर्शन की तलाश में किशोर प्रायः अपराध प्रवृत्तियों में फँस जाते हैं। एडवेंचर भी उनको कई बार अपराध करने को विवश करते हैं।

किशोरों में महत्वाकांक्षा अत्यधिक प्रबल होने लगती है, जिससे उनमें दूसरों को हानि पहुँचाना, कष्ट देना, बदला लेने की प्रवृत्ति, बंधनमुक्त रहने की छटपटाहट जैसी असामान्य भावनाएँ विकसित होने लगती हैं।

क्यों बनते हैं बालक अपराधी ?  
दूध में जब उफान आता है, तब उस समय उसकी पूरी देखभाल करने की आवश्यकता होती है, अन्यथा बर्तन के बाहर गिरकर बर्बाद हो सकता है। बगीचे में फल जिन दिनों पकते हैं, उन दिनों उनकी पक्षियों से रखवाली पूरी सावधानी के साथ अपेक्षित होती है, अन्यथा एक भी फल साबुत नहीं बच सकता। ठीक यही दशा किशोरावस्था के संबंध में सही बैठती है। किशोरावस्था में जोश अधिक होश कम होता है, इसलिए यदि स्वेच्छाचारिता बरती जाने लगे तो किशोर काल की अनुभवहीनता के कारण सर्वनाश होता है।

आज के अवयस्क बच्चे पढ़ने की उम्र में अपराध की दुनिया में रक्त बहाने पर उतारू हैं। वे असंयत जीवनशैली, दूषित खान पान और आधुनिकता के उन्मुक्त वातावरण में पलकर समय से पहले ही युवा होने लगे हैं। दुर्भाग्यवश अपराध कार्यों में लिप्त किशोरों की संख्या निरंतर बढ़ रही है। 10-12 वर्ष के बच्चे भीड़भाड़ का लाभ उठाकर लोगों की जेबें काट लेते हैं, रेलवे या बस स्टेशन पर लोगों को सोता देखकर उनका सामान लेकर रफूचक्कर हो जाते हैं। अपराध के इस कुचक्र में बालिकाएं भी पीछे नहीं हैं। वे भी चोरी और ठगी करने में शामिल हैं।

किशोर उम्र के किये जाने वाले अपराधों में, मादक द्रव्यों का सेवन, हिंसा, चोरी, यौन शोषण, कानून उल्लंघन, अनुशासनहीनता, दुर्व्यसनी, दुर्व्यवहार, ठगी, बलात्कार आदि आते हैं। किशोर मनोविज्ञान के अध्ययन के अनुसार किशोरों में बढ़ती आपराधिक प्रवृत्ति के प्रमुख रूप से निम्नलिखित कारण हैं -   
माता-पिता द्वारा उपेक्षा -  
बालक का अच्छा या बुरा बनाने का प्रथम दायित्व परिवार का है। आज संयुक्त परिवार का चलन समाप्त होने से बच्चों को दादी - नानी जैसे अभिभावकों का संरक्षण नहीं मिल पाता है। माता-पिता स्वयं कामकाजी होने के कारण, बच्चों पर ध्यान नहीं दे पाते। माता-पिता में से कोई एक यदि अपराधी प्रवृत्ति का है तो उनके बच्चे स्वयमेव अपराध मार्ग पर चल देंगे।

पारिवारिक विघटन -  
वर्तमान युग में निरंतर बढ़ रहा पारिवारिक विघटन भी बालकों को अपराध की ओर बढ़ा रहा है। आपसी सामंजस्य का अभाव, बालक में अकेलेपन और विद्रोह की प्रवृत्ति जगा देता है। उसमें बड़ों के प्रति सम्मान और स्नेह की भावना नहीं रहती तथा वह अशिष्टता, अनुशासनहीनता और उच्छृंखलता का पाठ पढ़ने लगता है।

आदर्श शिक्षकों का अभाव -  
अच्छे शिक्षकों से पढ़ने वाले छात्र अच्छे गुण सीख लेते हैं, किन्तु यदि शिक्षक ही अपराधी प्रवृत्ति का हो तो उसकी बुरी आदतों का बच्चों पर बुरा प्रभाव पड़ता है। शिक्षण संस्था के चारों तरफ का वातावरण यदि चोर, यौन हिंसा या भ्रष्ट व्यक्तियों से भरा होगा तो बालक में भी भ्रष्ट आचरण पनपेगा।

असामाजिक तत्वों का भ्रमजाल -  
समाज में फैले असामाजिक तत्व  भोले - भाले बालकों को बरगलाकर गलत रास्ते की ओर मोड़ देते हैं, उनसे अपने स्वार्थों की पूर्ति कराते हैं, फिर वे मादक द्रव्यों के अवैध व्यापार, जुआ, नशा, तस्करी आदि अनैतिक धंधों में धकेल देते हैं।

 

   

खुला वातावरण बिगाड़ रहा किशोरों को -  
पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव से खुला वातावरण फैशन और प्रदर्शन को बढ़ावा दे रहा है। मानसिक रोग विशेषज्ञ का कहना है कि ऐसे में बच्चे गलत हरकतें कर बैठते हैं, जो उनके जीवन की दिशा को गलत मोड़ दे देती है। कई बार गलत दोस्तों का साथ मिलने पर किशोर बेकाबू हो जाते हैं। इससे वे अवसाद के शिकार हो जाते हैं। बच्चे अपने साथियों के आक्रामक व्यवहार की नकल करते हैं।

सोशल मीडिया से खतरे में है किशोरों का दिमाग -  
सोशल मीडिया की बढ़ती आदत और चकाचौंध, सीधे तौर पर बालकों के मानसिक स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचा रही है। एक अध्ययन से पता चला है कि जो बच्चे एक दिन में तीन बार सोशल मीडिया साइट का प्रयोग करते हैं, वे हिंसक वीडियो गेम्स देखते हैं, इससे उन्हें मानसिक रोग होने की संभावना रहती है। इस कुचक्र में लड़के और लड़कियाँ दोनों सम्मिलित हैं। वे लोकप्रिय सोशल साइटों तथा डिजिटल प्लैटफॉर्म पर रात और दिन में कई घंटे बिताते हैं। धीरे-धीरे वे अश्लील वीडियो भी देखने लगते हैं और वे साइबर बुलिंग के शिकार होकर अनिद्रा, चिंता, गुस्सा, यौन हिंसा और मानसिक विकारों से ग्रस्त हो जाते हैं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन का अनुमान है कि किशोरवय के एक अरब बच्चे एक ही वर्ष में शारीरिक, यौन या भावनात्मक हिंसा एवं बाल अपराध या उपेक्षा का अनुभव करते हैं। किशोरों में आपराधिक प्रवृत्ति विकसित होने से रोकने के लिए कुछ आवश्यक कदम यथाशीघ्र उठाने की आवश्यकता है -   
- किशोरों में अनुशासन की भावना लाने हेतु माता-पिता को अपेक्षित नियंत्रण रखने की आवश्यकता है तथा स्वयं भी आचरण और व्यवहार से आदर्श प्रस्तुत करें। घर का वातावरण शांत, सरस और मित्रतापूर्ण होना चाहिए।   
- विद्यालयों को छात्रों की गतिविधियों पर ध्यान रखना होगा। शिक्षकों को अपने भावी कर्णधारों को सुधारने की दृष्टि से आदर्श बनना होगा। बच्चों को साक्षर बनाने के साथ ही उनका चरित्र निर्माण करना भी प्रमुख उद्देश्य होना चाहिए।   
- परिवार के सदस्यों को बच्चों के साथ अधिक से अधिक समय व्यतीत करने, उनमें संस्कारों का पोषण करने, उन्हें संघर्ष समाधान कौशल सीखने, संचार कौशल विकसित करने तथा सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित करने पर ध्यान देने की आवश्यकता है।   
- किशोरों की अनियमित जीवन शैली पर अंकुश लगाया जाए। मोबाइल, कंप्यूटर, लैपटॉप पर काम करने के लिए स्क्रीन टाइम को संयमित किया जाए। देर रात तक जागने की प्रवृत्ति पर रोक लगायी जाए जिससे उन्हें अपेक्षित नींद मिल सके।   
- घर के बाहर खेलों में भाग लेने के लिए प्रेरित किया जाए। इसके लिए अच्छे मित्र बनाने के लिए सलाह दें। घर और स्कूल के बीच समय में अनावश्यक आवारागर्दी, मौज मस्ती या फास्ट फूड सेवन पर नियंत्रण रखा जाए। बच्चे के शारीरिक व मानसिक व्यवहार में परिवर्तन को गंभीरता से लिया जाए तथा उसका समुचित समाधान किया जाए।   
- किशोरों को कला-कौशल, शिल्प, आध्यात्मिक ज्ञान, तकनीक आदि विषयों की शिक्षा अनिवार्य रूप से दी जाए, जिससे उन्हें भविष्य में जीवन की दिशा तय करने में मार्गदर्शन मिल सके।

भारत में बाल अपराधियों की समस्या की रोकथाम के लिए सर्वप्रथम 1876 में एक कानून बना, जिसे 1897 में संशोधित किया गया। बाल अपराधियों के अलग से कारागार बनाए गए जिन्हें सुधारगृह का रूप दिया गया।

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद 1960 में भारतीय संसद ने 'बाल अधिनियम' पारित किया। इस अधिनियम में सात वर्ष की आयु से लेकर सोलह वर्ष तक की आयु के बालक और 18 वर्ष तक की बालिका को बच्चा माना गया। इसके उपरांत संसद द्वारा 1986 में बनाए गए कानून में भी 16 वर्ष तक के लड़के तथा 18 वर्ष तक की लड़कियाँ को अपराध करने पर बाल अपराधी माना गया। यह व्यवस्था उन्हें कारागार में अन्य अपराधियों से अलग रखने हेतु की गई। अब समय परिवर्तन के साथ 10 वर्ष का बालक भी युवा जैसे अपराध करने लगे हैं। अतः बाल अपराधी की आयु को पुनः परिभाषित करने पर विचार किया जाना चाहिए।

आज का बालक ही कल का नागरिक है। अतः देश के भविष्य को उज्जवल बनाने के लिए हमें आज के बालक को आदर्श बनाना होगा। 

 

   

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