ट्रेन रफ्तार से दौड़ी जा रही थी और उसके साथ ही मेरे विचारों ने भी रफ्तार पकड़ ली अतीत में छुट्टियों के दौरान की गई यात्राओं के सुखद पल मानस पटल पर अंकित होते ही एक मीठी सी मुस्कान चेहरे पर बिखर गई। अगले ही स्टेशन पर एक सुशिक्षित दंपति और उनका दस वर्षीय बेटा ट्रेन में चढ़े और मेरे सामने वाली सीट पर बैठ गए, वह तीनों ही इस स्लीपर क्लास में बड़े ही असहज महसूस कर रहे थे। "औपचारिक बातचीत के दौरान उन्होंने कहा भी वातानुकूलित डिब्बे में रिजर्वेशन न मिलने से उन्हें मजबूरन स्लीपर कोच में बैठना पड़ा।"
बच्चा भी पहली बार ही स्लीपर कोच में बैठा था यहां की भीड़ में वह बहुत चिड़चिड़ा रहा था जब की संध्या समय सूर्य देव अपनी माया समेट अस्त होने में थे और हल्की पुरवाई अपने पंख पसार रही थी। बच्चा लगातार भनभना रहा था तो तंग आकर उसकी मम्मी ने ऊपर की बर्थ पर बिठाकर उसे टैब पकड़ा दिया वह उसमें आँखे गड़ाए मग्न हुआ तो उसके मम्मी पापा ने चैन की सांस ली।
यह देख मुझे मेरा बचपन याद आ रहा था सफर के दौरान खिड़की के पास बैठ कुदरत का अनुपम दृश्य देखने के लिए मेरा मन कितना लालायित रहता सूरज की लालिमा, चांद की अलग-अलग छटाएं उस बालमन को कितना सुकून देती अपने साथ साथ मानों चांद भी सफर कर रहा हो ऐसा प्रतीत होता, दौड़ते हुए पेड़-पौधे, नदियां, पहाड़ों को देख कल्पनाओं को पंख लग जाते। घर का बना हुआ भोजन, नाश्ता सब मिलजुल करते। खिड़की से बाहर मोटे कपड़े की थैली टंगी रहती जिसमें पूरे समय जल ठंडा रहता उसका माधुर्य आज भी याद है। भाई बहनों संग ताश, सांप-सीढ़ी और न जाने कितने ही खेल खेला करते जिससे समय का पता ही नहीं चलता और हम पूरी ताजगी से भरपूर हो गंतव्य तक पहुंच जाते।

कुछ ही देर में उस बच्चे की मम्मी ने उसे बिसलेरी पकड़ा दी, जिसे उसने गर्म पानी हो गया कहकर बिना पिए ही लौटा दी। अगले ही स्टेशन पर उसके पापा ने ठंडी बिसलेरी की बोटल, कुरकुरे, फ्रुटी आदि खरीदकर उसे दे दी जिसे वह शौक से खाने लगा।
यह दृश्य देख मुझे बरबस ही अपने पापा की याद आने लगी उनके द्वारा लिया हर निर्णय हमारे लिए सर्वोपरि होता वहां जिद पूरी होने की कोई गुंजाइश ही नहीं रहती वह भी पूरी तरह हर व्यवस्था पूर्ण करने में सक्षम थे किंतु उनका कड़ा अनुशासन अब याद आता है तो लगता है उनके द्वारा हम बच्चों को जीवन का जरूरी पाठ पढ़ाने का ही उनका मकसद रहा होगा। "आज हर स्थिति में हम भाई-बहन बड़े ही खुश रहते हैं न कोई अभाव महसूस होता है, ना ही कभी निराशा हमें कैद कर पाती है।"
छोटी छोटी बातों में आज की पीढ़ी, बच्चे जो समस्या महसूस करते है, हर बात का तनाव लेते हैं सच तो वह समस्या होती ही नहीं है, वक्त होता है जो ठहरता नहीं मुश्किल घड़ी भी निकल ही जाती है किंतु अत्याधिक लाड़-प्यार उन्हें कमजोर करने के साथ ही उनका भविष्य भी खराब करता है। इस यात्रा दौरान इतना तो मैं समझ ही गई। तभी आजकल बच्चे जरा जरा सी बात में डिप्रेशन में जाते हैं, हताश हो जाते हैं, जीवनलीला समाप्त करने तक सोच लेते हैं।
एक रात का सफर मनचाहा न होने पर जो असुविधा महसूस करते हैं उनके लिए जीवन सफर में आने वाले उतार चढ़ाव में सामंजस्य स्थापित करते हुए खुशी से चलना मुश्किल ही होगा ऐसे जीवन की डोर ही कमजोर रहती है जो आर्थिक, मानसिक, पारिवारिक किसी भी असंतुलन को सहज रूप से स्वीकार नहीं कर पाती, यह सोच ही रही थी, तभी खिड़की से आ रही शीतल पुरवाई से मेरी आंखों में नींद भरने लगी वह बच्चा अब तक टैब में ही मशगूल था।

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