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वरुथिनी एकादशी का महत्व, नियम व कथा

वरुथिनी एकादशी

हमारी भारतीय संस्कृति में हिंदू धर्म में एकादशी या ग्यारस एक महत्वपूर्ण तिथि है। हिंदू धर्मालम्बी श्रद्धा और निष्ठा के साथ एकादशी का व्रत करते हैं। एकादशी एक देवी थी, जिन्हे भगवान विष्णु के द्वारा प्रकट किया था। इसके कारण ही एकादशी के व्रत में भगवान विष्णु की पूजा होती है।

एकादशी व्रत क्या है? 

एक ही दशा में रहते हुए अपने आराध्य देव का पूजन एवं वंदन करने की प्रेरणा देने वाला व्रत एकादशी व्रत कहलाता है। पद्म पुराण में भी उल्लेखित है कि एकादशी महा पुण्य प्रदान करने वाली है। कहा जाता है जो व्यक्ति इस व्रत को करता है उसके पितृ तथा पूर्वज बुरी योन को त्याग स्वर्ग लोक चले जाते हैं।

संक्षेप में हम कह सकते हैं हिंदू पंचांग की 11वीं तिथि को एकादशी कहते हैं। एकादशी संस्कृत भाषा से लिया शब्द है। यह माह में 2 बार आती है, पूर्णिमा के बाद तथा दूसरी अमावस्या के बाद। इस तरह से एकादशी साल में 24 होती हैं लेकिन अधिक मास को मिलाकर इनकी संख्या 26 हो जाती है।

एकादशी का महत्व - 

पुराणों के अनुसार एकादशी को हरि दिन और हरि बासर भी कहते हैं। यह व्रत वैष्णव तथा गैर वैष्णव भी करते हैं। ऐसा कहा जाता है एकादशी का व्रत हवन, यज्ञ, वैदिक कर्मकांड आदि से अधिक फल देता है। स्कंद पुराण में भी इसके महत्व का वर्णन है।

वरुथिनी एकादशी - 

शास्त्रों के अनुसार वैशाख माह कृष्ण पक्ष की एकादशी को वरुथिनी एकादशी होती हैं। साथ ही इसे "वरुथन" भी कहते हैं। वरुथिनी का अर्थ "बख्तरबन्द या सुरक्षित करना होता है"। यह व्रत करने वाले बुराई से सुरक्षित रहते है। वरुथिनी एकादशी भी भगवान विष्णु को ही समर्पित होती है। हिंदू मान्यता के अनुसार एकादशी फलदायी होती है। इसके व्रत करने से पाप नष्ट होते हैं तथा मृत्यु के बाद मोक्ष प्राप्त होता है।

नियम - 

वरुथिनी एकादशी का व्रत करने के लिए एक दिन पहले अर्थात दशमी के दिन उबला हुआ भोजन करना चाहिए। एकादशी के दिन परिवार सहित पूजा अर्चना तथा एक समय भोजन करना चाहिए अर्थात दशमी के दिन सूर्यास्त के बाद व्रत शुरू हो जाता है तथा द्वा-  
-दशी को समाप्त होता है। उस दिन उड़द की दाल, चना, सुपारी, पालक खाना वर्जित है तथा दूसरे के घर भी भोजन नहीं करना चाहिए।

एकादशी के दिन सुबह दातून का इस्तेमाल ना करें इसके स्थान पर नींबू, जामुन या आम के पत्ते चबाकर उंगली से दांत साफ करें इस दिन पत्ते तोड़ना वर्जित है गिरे पत्ते प्रयोग में लाए जाते हैं। स्नानादि के पश्चात मंदिर जाकर गीता का पाठ करें, 'ॐ भगवते वासुदेवाय' मंत्र का जाप करें तथा यथाशक्ति दान करें।

दूसरे दिन अर्थात द्वादशी के दिन आम दिनों की तरह कार्य करें। सुबह उठकर भगवान विष्णु की पूजा करें तथा उसके पश्चात सामान्य भोजन लेकर व्रत समाप्त करें। इस बात का ध्यान रखें कि त्रयोदशी लगने से पहले ही व्रत का पारण कर ले। ध्यान रखें...एकादशी के दिन चावल नहीं खाते लेकिन पारण करने के लिए चावल का प्रयोग आवश्यक है।



       

 

वरुथिनी एकादशी की कथा - 

नर्मदा नदी के तट पर मांधाता नामक राजा राज करता था। मांधाता दानशील तथा तपस्वी था। एक दिन वह जंगल में तपस्या कर रहा था। तभी वहाँ जंगली भालू आया और राजा मांधाता का पैर चबाने लगा। राजा तपस्या में लीन थे इसलिए उन्हें इस बात का आभास नहीं हुआ। पैर चबाते-चबाते भालू उन्हें जंगल के बीच में ले गया। राजा की तपस्या टूटी और राजा घबराने लगे, लेकिन राजा ने ना कोई हिंसा की ना क्रोधित हुए। उन्होंने भगवान विष्णु से प्रार्थना की, भगवान विष्णु प्रसन्न हुए और उन्होंने अपने सुदर्शन चक्र से भालू को मार डाला। पर तब तक भालू राजा के पैर को चबा चुका था। अपना अंग भंग देखकर राजा बहुत दुखी हुए। तब भगवान विष्णु बोले राजा आप मथुरा जाओ और वहाँ पर वरुथिनी एकादशी का व्रत कर मेरे वराह अवतार की पूजा करना। पूजा करने के कारण तुम्हारे अंग सृदृण हो जाएंगे। राजा ने वैसा ही किया। जिससे उनके अंग ठीक हो गए। मृत्यु होने पर राजा को मोक्ष की प्राप्त हुई।

जो व्यक्ति भयभीत रहता है या अपने को असुरक्षित महसूस करता है उसे यह व्रत अवश्य करना चाहिए। भगवान विष्णु की आराधना, पूजा, अर्चना करके तथा तुलसी और आंवला चढ़ाने से व्यक्ति भय से मुक्त हो जाता है। वरुथिनी एकादशी का व्रत करने से पापों का नाश होता है। इस दिन तिल का दान स्वर्णदान से भी अधिक शुभ होता है। मोक्ष की प्राप्ति होती है। 10 सहस्त्र वर्ष तक तप करने से जो फल प्राप्त होगा वो सौभाग्य वरुथिनी एकादशी के व्रत से प्राप्त होता है।



       

 

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