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वंदे मातरम्: राष्ट्रहित की आध्यात्मिक प्रेरणा | भारतीय स्वतंत्रता का प्रतीक

वंदे मातरम्: राष्ट्रहित की आध्यात्मिक प्रेरणा

“वंदे मातरम्” भारत के स्वतंत्रता संग्राम का आध्यात्मिक आधार था। बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित यह गीत मातृभूमि को देवी के रूप में पूजने की भावना से ओतप्रोत था। इसने राष्ट्रवाद को केवल एक राजनीतिक विचार नहीं, बल्कि भक्ति-भावना में परिवर्तित कर दिया। बंग-भंग आंदोलन से लेकर क्रांतिकारी संघर्षों तक यह गीत स्वतंत्रता सेनानियों की प्रेरणा बना। आज भी यह राष्ट्रीय सम्मान, एकता और स्वाभिमान का प्रतीक है। “वंदे मातरम्” ने भारत की आत्मा को जागृत किया और यह सदा हमारी राष्ट्रीय चेतना की धड़कन बना रहेगा।

“वंदे मातरम्” केवल एक गीत नहीं था, बल्कि यह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दौरान राष्ट्र की आत्मा का स्वर बन गया। बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय की प्रसिद्ध कृति आनंदमठ (1882) में सम्मिलित इस गीत ने भारत माता को देवी के रूप में प्रस्तुत किया। इस भाव ने औपनिवेशिक दमन से त्रस्त भारतीय समाज को आध्यात्मिक और सांस्कृतिक एकता के सूत्र में बाँध दिया। इस गीत ने स्वतंत्रता की माँग को केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि नैतिक और धार्मिक अधिकार के रूप में स्थापित किया।

गीत की आरंभिक पंक्तियाँ—“सुजलां सुफलां मलयजशीतलाम् शस्यश्यामलाम् मातरम्”—भारत की भौगोलिक सुंदरता और समृद्धि का चित्रण करती हैं। यहाँ भूमि केवल मिट्टी नहीं, बल्कि एक माता के रूप में देखी गई है, जो अपने संतानों को जीवन देती है। जब देश को माँ के रूप में देखा गया, तब देशभक्ति स्वाभाविक रूप से भक्ति में परिवर्तित हो गई। यही भाव “वंदे मातरम्” को एक साधारण गीत से आध्यात्मिक आंदोलन बनाता है।

1905 के बंग-भंग आंदोलन में “वंदे मातरम्” जन-जन का नारा बन गया। विद्यार्थी, महिलाएँ, व्यापारी और किसान—सभी इसके स्वर में एकजुट हो गए। ब्रिटिश शासन को यह गीत इतना भयावह लगा कि इसे प्रतिबंधित कर दिया गया, किंतु यह प्रतिबंध इसके प्रभाव को रोक न सका। यह गीत प्रतिरोध, स्वाभिमान और एकता का प्रतीक बन चुका था।

भारत जैसे विविधताओं से भरे देश में “वंदे मातरम्” ने सभी भाषाओं, क्षेत्रों और वर्गों को एक साझा भाव—मातृभूमि—से जोड़ा। इस गीत ने राष्ट्रीय एकता की नींव रखी, जो स्वतंत्रता संग्राम की सबसे बड़ी शक्ति बनी।



       

 

इस गीत ने भारतीय राष्ट्रवाद को एक नई भाषा और अभिव्यक्ति दी। यह केवल विदेशी शासन के विरोध का स्वर नहीं था, बल्कि मानसिक गुलामी से मुक्ति का आह्वान भी था। जब मातृभूमि देवी बनी, तब स्वतंत्रता एक राजनीतिक लक्ष्य नहीं, बल्कि आध्यात्मिक कर्तव्य बन गई।

“वंदे मातरम्” ने श्री अरविंदो घोष, नेताजी सुभाष चंद्र बोस और भगत सिंह जैसे महान राष्ट्रनायकों को गहराई से प्रभावित किया। इसे इंडियन नेशनल आर्मी का गीत बनाया गया और यह युवाओं में वीरता और बलिदान की भावना जगाने का माध्यम बना।

सांस्कृतिक रूप से भी यह गीत भारतीय पुनर्जागरण का प्रतीक बना। साहित्य, चित्रकला, संगीत और नाट्यकला में मातृभूमि की अवधारणा को सशक्त रूप देने में “वंदे मातरम्” की महत्वपूर्ण भूमिका रही।

स्वतंत्रता के बाद “वंदे मातरम्” को राष्ट्रीय गीत का सम्मान दिया गया। आज भी जब यह गीत गूंजता है, तो उसमें वही जोश, श्रद्धा और मातृभाव झलकता है। यह हमें स्मरण कराता है कि राष्ट्र केवल सीमाएँ नहीं, बल्कि एक जीवंत संस्कृति और साझा आत्मा है।

अंततः कहा जा सकता है कि “वंदे मातरम्” भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का केवल गीत नहीं, बल्कि भारतीय आत्मजागरण का स्वर था। यह हमें सिखाता है कि राष्ट्र की सच्ची शक्ति उसकी एकता, आस्था और स्वाभिमान में निहित है। जब तक “वंदे मातरम्” की भावना जीवित है, भारत की आत्मा अमर है।

लेखक - डॉ सत्यवान सौरभ जी, भिवानी (हरियाणा)



       

 

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