विरासत की अनोखी पहल
"विरासत को संजोए रखने की अनोखी पहल"
उत्तराखंड को यों ही देवभूमि नहीं कहा जाता, बल्कि यहां के लोकाचार, परम्परायें एवं रीति रिवाज इसको देवभूमि कहलाने की पुष्टि करते हैं।
उत्तराखंड के बहुत से गाँवों में ज्येष्ठ माह (जून माह) में रवि की फसल से प्राप्त अनाज (गेहूं) को अपने इष्ट देवताओं को भोग लगाने के बाद ही अपने प्रयोग में लाने की परम्परा है। इसी परंपरा के तहत रुद्रप्रयाग जनपद के विकासखंड अगस्त्यमुनि के धारकोट, निर्वाली गाँव में पिछले पांच सौ से भी अधिक सालों से स्थानीय चण्डिका मन्दिर व ईशानेश्वर महादेव मन्दिर में, गेंहू को पीसकर आटे से भोग लगाने की परम्परा का निर्वहन होता चला आ रहा है।
इस काम में गांव के युवाओं द्वारा सेवित ग्राम के प्रत्येक परिवार से लगभग 100 ग्राम गेहूं का आटा इकट्ठा किया जाता है, साथ ही भोग व भोजन की अन्य सामग्री को जुटाने के लिए कुछ धनराशि (जो 100 परिवारों में बीस रुपये होती है) इकट्ठा की जाती है। विशेषता वाली बात यह है कि "यह आटा हाल में ही खेती से प्राप्त गेहूं से बना होता है।” यदि कोई परिवार अभी तक पुराने साल के ही गेहूं के आटे या बाजार से खरीदकर लाये गये आटे का ही प्रयोग कर रहा हो, तो वह पड़ोसी परिवार से नये गेहूं का आटा पैंछा (उधार) लेता है, और बाद में नये गेहूं पिसा कर, उस उधार को वापस कर लेता है।
गाँव के प्रत्येक परिवार से इकट्ठे किये गये इस आटे को भोग व भोजन की क्रय की गई अन्य सामग्री के साथ, स्थानीय चण्डिका मन्दिर परिसर तक पहुँचाया जाता है, जहाँ ग्राम समाज की ओर से नियत पांच व्यक्ति (पंचजन) यजमान के रूप में देवी के पूजन अर्चन का कार्य करते हैं। पूजन के विधि विधान की तैयारी मंदिर का रख रखाव कर रहे, गाँव के सेमवाल परिवार करते हैं, तो वहीं पूजन कार्य में मुख्य पुरोहित की भूमिका चौकियाल जाति के ब्राह्मणों द्वारा निभाई जाती है।
पूजन में गाँव की अधिष्ठात्री देवी व देवाधिदेव महादेव ईशानेश्वर से सुख एवं आरोग्यता की कामना की जाती है।
इस अवसर पर गाँव के प्रत्येक परिवार का एक सदस्य इस पूजन में भाग लेता है। युवाओं द्वारा मन्दिर परिसर में ही स्थित विशाल बरगद के वृक्ष के नीचे विभिन्न पकवान बनाये जाते हैं, जबकि देवी को भोग चढ़ाये जाने वाले वाले व्यंजन, मन्दिर की ही भोगशाला में बनाये जाते हैं।
इस अवसर पर भक्तों की प्रार्थना पर अपने नर पश्वा पर मां चण्डिका अवतरित होकर भक्तों को आशीर्वाद प्रदान करती है।
लेखक - हेमंत चौकियाल जी, रुद्रप्रयाग (उत्तराखंड)

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