Bhartiya Parmapara

धर्म और कर्म का सच्चा अर्थ – कर्तव्य, निष्काम कर्म और जीवन का उद्देश्य

कर्म ही धर्म है

धर्म वही है- जिसे धारण किया जा सके। नदी का धर्म- प्यासे को पानी पिलाना,  वृक्ष का धर्म है-राहगीर को छाया देना, और शिक्षक का धर्म है-विद्यार्थियों को सही ज्ञान की शिक्षा प्रदान करना अर्थात् कर्तव्य का ही दूसरा नाम है- धर्म।  
"कार्य ही पूजा है" इसका आशय भी यही है,  कि व्यक्ति अपने कर्म का निर्वहन निष्ठापूर्वक, कर्तव्य भावना के साथ करे तो यह भी धर्म से कम नहीं है।  
कर्म को पूजा या उपासना समझकर करना ही सच्चा धर्म है।  
जो भी काम (कर्म) आपको मिला है, हो सकता है आपकी रुचि के अनुरूप न हो परन्तु काम के अनुरूप यदि आप अपनी रुचि बना लेंगे तो उसमें आनंद प्राप्त होगा।

एक सफाई  कर्मी- उसका नाम संतोष है, से पूछा गया, "तुम नहा-धोकर यह सफाई का काम क्यों करते हो। बाद में नहा लिया करो” संतोष ने जवाब दिया- "आप बिना नहाएं पूजा कर सकते है? नहीं न, तो यह काम ही मेरी पूजा है।" कितनी सुन्दर बात है। काम को ही पूजा मान लिया तो फिर उसका सुफल भी अवश्य मिलेगा, काम को पूरे मन से करने में भी आनंद है। जो संतोष मिलता है वह अनुपम है। आधे-अधुरे मन से किया गया कार्य कभी सफल नहीं होता है। अपने मन से काम में खो जाने पर ही सच्चे सुख से आनंद आता है।

हर कोई हर काम नहीं कर सकता। लोहार सुनारी नही कर सकता है, न सुनार लोहारी कर सकता है। सही व्यक्ति को सही काम ही मिलना चाहिए। हर काम को करने का समय होता है। अलग-अलग समय पर अलग-अलग कर्म अलग-अलग धर्म का निर्माण करते हैं।

काम एक ही होता है, उसको करने के तरीके अनेक होते हैं। हर व्यक्ति अपना काम अपने ढंग से करता है। कोई तेजी से करता है, तो कोई धीरे-धीरे काम करता है, कोई कुशलता से करता है, तो कोई बेगार टालता है, अतः कर्म अच्छे करेंगे तो मन शांत रहेगा, बल्कि आपकी सेहत भी सही रहेगी। इसलिए आपको जो काम पसंदीदा है, वही कर्म आपका धर्म बनता है, अपने कर्म करने के दौरान नकारात्मक विचार ना लाए। जब हम किसी कार्य को करते हैं, तब किसी के प्रति द्वेष भाव नहीं रखे, जब सच्चे वह ईमानदारी से काम करते हैं, तो यही हमारा धर्म है।

निष्काम भाव से कर्म करते रहना ही सबसे बड़ा धर्म है। गीता में कहा गया है, "कर्म करते रहो फल की इच्छा मत करो।" पर ऐसा होता कहाँ है ? सारे काम फल की इच्छा से ही किए जाते है। दान-पुण्य इसलिए कि स्वर्ग में सीट आरक्षित रहेगी। नेकी का काम इसलिए कि उससे लोकप्रियता मिले, प्रचार,  यश-कीर्ति, प्रशंसा मिले। धर्म की रक्षा करना और उसको धारण करना श्रेष्ठ माना गया है, क्योंकि जीवन का ध्येय धर्म व कर्म होना चाहिए। सारे संसार में सनातन धर्म ही एक ऐसा धर्म है, जिसमें विश्व कल्याण की भावना छुपी हुई है।

राम ने जात-पात नहीं मानकर मानवता का संदेश दिया है। लेकिन कुछ विधर्मी ताकते जात-पात के नाम पर धर्म को तोड़ने का प्रयास कर रही है। ऐसे में हमें जातिवादी नहीं राष्ट्रवादी बनना होगा। दूसरी और यह भी शाश्वत सत्य है, कि व्यक्ति कितना भी धन कमाले, वह केवल धरती पर ही चलता है। मृत्यु के बाद साथ केवल धर्म जाता है- धन नहीं। इसलिए जीवन में अच्छे कर्मो से धर्म इकट्‌ठा करें, धन नहीं। धर्म सुरक्षित है तो राष्ट्र और समाज सुरक्षित है। मानव जीवन दुर्लभ है, इसलिए सदैव श्रेष्ठ और अच्छे कर्म करना ही धर्म हैl

- डॉ.बी. आर. नलवाया जी, मंदसौर (म. प्र.)



          

 

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