Bhartiya Parmapara

माँ के अटूट प्रेम को सलाम

माँ - मातृ दिवस 


"माँ" इस शब्द में पूरी सृष्टि समाई हुई है, क्या एक ही दिन माँ को याद करने का होता है  या बिना माँ को याद किए कोई दिन गुजरे ही नही ऐसा होता है??  
जब हम छोटे होते है तो माँ का चेहरा हमारे लिए खास होता है जब बचपन में हम चलना सीखते तो माँ का हाथ उनकी बाहों का हमे जो सहारा मिलता वो किसी जन्न्त से कम नही होता। जैसे-जैसे हम बड़े होते हैं हम माँ से दूर होते जाते हम भूल जाते की जिस माँ से हमने जीना सीखा हमे लगता है कि हम माँ से ज्यादा समझते हैं। जिस माँ की गोद में जाने के लिये हम तड़पते है उस माँ के लिये अब हमारे पास वो तड़प और वक्त है ही नहीं माँ से बात करनेका उसके पास बैठने का हमारे पास समय नही सब अपनी जिंदगी में व्यस्त है। माँ बाप को आज भी हमारी फ़िक्र है लेकिन हमें अपने आप से फुर्सत नही..    
मैं ये भी नही कहती की सब ऐसे होते हैं लेकिन जो ऐसे है उनको तो समझना होगा। वो आँखे जिनमे कभी तुम्हारे सपनो की चमक हुआ करती थीं अब धुंधला गई है उनको तुम्हारी परवाह (नजरो) की जरूरत है… आज भी उनकी धड़कनों को रफ्तार मिल जाती है जब तुम खुश होते हो। अभी भी वक्त है वरना कांधे पर रखकर जब छोड़ने उनको (माँ-पिता) जाओगे तो बड़ा पछताओगे। लेकिन तब बहुत देर हो चुकी होगी इस दुनिया में सब मिलते एक माँ और पिता का रिश्ता है जो दुबारा नही मिलता..।    
माँ जो कई रिश्तों से गुजरते हुए "माँ" के मुकाम पर ठहर जाती है, एक स्त्री जब माँ बनती है तब उसे पूरी कायनात मिल जाती है उसका जीवन पूर्ण हो जाता है। माँ कौन सा रिश्ता नही निभाती हमारे लिये..? जीवन भर हमारी ढाल बनती माँ ।   
माँ जिसे ईश्वर भी नमन करते है, ऐसी होती है माँ जिनके बिना हमारा कोई अस्तित्व नहीं आपको हर दिन हर पल नमन है माँ।  



       

 

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