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डोम्लुर का सूर्य नारायण मंदिर – परंपरा और परिवार भाव को संजोता जीवंत मंदिर

परंपराओं एवं परिवार भाव को पोषित करता : सूर्य नारायण मंदिर

 

बेंगलुरु शहर के डोम्लुर क्षेत्र में स्थित सूर्य नारायण मंदिर भारत के सूर्य देव मंदिरों में अनुपम है। मैंने सबसे पहले कोणार्क के सूर्य मंदिर की अत्यधिक प्रशंसा सुनी थी और अभी कुछ समय पूर्व उसे देखा भी। निस्संदेह वहां का वास्तुशिल्प, नक्काशी और परिकल्पना उच्च कोटि की रही है तथा क्षेत्रफल भी बहुत अधिक है पर अब वह खंडहर में बदल रहा है। कई वर्षों से वहाँ पूजा नहीं होती है।

ग्वालियर का सूर्य मंदिर कोणार्क की प्रतिलिपि कहा जाता है, वहाँ भी मैं वर्षों तक दर्शन का सौभाग्य प्राप्त करती रही हूँ। इंदौर के सुंदर सूर्य मंदिर में भी सूर्यदेव का आशीर्वाद लिया है। किन्तु बेंगलुरु के सूर्य मंदिर जैसी भव्यता, पवित्रता और जीवंतता दुर्लभ ही रही है। यह मंदिर बेंगलुरु के मुख्य बाजार के निकट बना है, बस्ती के बीच में है फिर भी शांति का दिव्य अनुभव होता है। भगवान सूर्य नारायण (सूर्य देव) के इस मंदिर का निर्माण वर्ष 1995 में श्री पटेल डी. आर. कृष्णा रेड्डी द्वारा किया गया है, और इसका उद्घाटन तुमकुर के सिद्ध गंगा मठ के परम पूज्य श्री श्री श्री शिवकुमार स्वामीजी ने किया था- यह वहाँ के शिलालेख में अंकित है।

लाखों मंदिरों की इस भूमि में डोम्लुर का सूर्य नारायण मंदिर भारत के सबसे खूबसूरत आधुनिक मंदिरों में से एक है! यह समृद्ध चोल मंदिर वास्तुकला शैली में विशेषज्ञ कारीगरों द्वारा निर्मित किया गया है। सूर्यनारायण की भव्य मूर्ति बद्रीनाथ से खरीदी गई है। प्रभावली के साथ इसकी ऊंचाई 3.25 फीट है। आधार पर सूर्यदेव के पिताश्री कश्यप ऋषि और माता अदिति की मूर्तियाँ हैं, अर्थात यहाँ सूर्यदेव अपने माता-पिता के साथ पूजित हैं।

गर्भगृह के बाहर, वैष्णवी, ब्रह्मा, नागराज, उग्र नरसिम्हा, सरस्वती, पंचमुखी गणेश के अलावा सूर्य और आदि शेषशायी के दर्शन होते हैं, जो भक्तों पर अपनी कृपा बरसा रहे हैं। मंदिर परिसर में एक अद्भुत उद्भव हत्था (पवित्र स्तंभ) मौजूद है, जो मंच के निर्माण के बाद बनाया गया है। मंदिर हर समय एकदम साफ-सुथरा दिखता है - मैं यदि यह कहूँ कि यह देश के सबसे स्वच्छ मंदिर परिसरों में से एक है, तो ग़लत नहीं होगा।  
साफ़-सफ़ाई यहाँ की दैनिक दिनचर्या लगती है। सफाई के आधुनिक उपकरणों से सफाई होती है मैंने मंदिर परिसर की गहन सूक्ष्म सफाई और धुलाई होते देखी है।  मंदिर के कोने कोने और हर स्तंभ की सफाई प्रतिदिन होती है।

सूर्य देव मंदिर के चारों ओर के परिक्षेत्र में ऊपर 46 सुंदर मूर्तियों में विविध देवी देवता सुशोभित है। 22 बड़े भित्ति चित्र लगे हैं। इस मंदिर का गोपुरम 325 फीट ऊंचा अत्यंत सुंदर और विविध कलात्मक देव मूर्तियों से सुसज्जित है।

उत्सव के दिनों में सड़क मार्ग से मंदिर तक सुंदर विद्युत सज्जा होती है और मंदिर की सज्जा तो अति कलात्मक और अद्भुत होती है। गोपुरम की विद्युत सज्जा ऐसी प्रतीत होती है जैसे मंदिर पर प्रकाश का अभिषेक हो रहा हो। प्रति रविवार को भी मंदिर पर बहुत सुन्दर विद्युत सज्जा होती है। सज्जा में अनेक पारंपरिक उपादानों का प्रयोग होता है। रथ सप्तमी को सूर्यदेव का जन्मदिन बहुत ही धूमधाम से आठ दिन तक विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों के साथ मनाया जाता है। रथ सप्तमी के दिन यहां एक वार्षिक मेला लगता है इस उत्सव के दौरान यहां 32 फीट लंबा सूर्य देव का रथ सजा कर निकाला जाता है और हजारों भक्त जिसे खींचते हैं। वैसे तो मंदिर में बड़ी संख्या में भक्त प्रतिदिन दर्शन करते हैं किन्तु माघ मास सुधा तृतीया से दशमी तक 8 दिवसीय उत्सव (जिसे यहां ब्रह्मोत्सव कहा जाता है) के दौरान भक्तों का सैलाब उमड़ता है। सभी सूर्य मंदिरों की तरह ही यहाँ प्रतिदिन सूर्योदय और सूर्यास्त के समय भव्य आरती का आयोजन होता है। इसके अतिरिक्त जब भी भक्त आते हैं तब भगवान की आरती करके आरती दी जाती है और पुजारी जी प्रत्येक नाम कुल गोत्र पूछकर सिर पर शडारी (पीतल का सुंदर टोपनुमा आकृति जिस पर भगवान के चरण अंकित होते हैं। यह दक्षिण भारत के विष्णु मंदिर में प्रयुक्त होता है। यह सूर्य नारायण मंदिर होने से यहाँ प्रयुक्त होता है)  रखकर आशीर्वाद देते हैं, यह मुझे बहुत ही विशिष्ट और भावमय अनुभव देता है।

यहाँ का प्रसाद भी विशिष्ट होता है - कभी केसरिया भात, कभी हलवा और कभी चावल के दक्षिण भारतीय व्यंजन दोने में हर भक्त को दिए जाते हैं। यहां मंदिर परिसर में अनेक सुंदर कलात्मक चित्रकारी युक्त मंदिरों के साथ नवग्रह मंदिर अति आनंददायी अनुभूति देता है। इसकी विशेषता यह है कि यहां सभी नवग्रह अपनी पत्नियों के साथ प्रतिष्ठित हैं।

ऐसा मंदिर मैंने अन्यत्र नहीं देखा है। सूर्यदेव अपने माता-पिता के साथ भी तथा अपनी पत्नियों और पुत्र के साथ भी यहाँ दर्शन देते हैं। इस तरह यह मंदिर भारतीय सांस्कृतिक परंपराओं के साथ परिवार भाव को विशेष रूप से पोषित करता है जो आज के समाज की प्रथम आवश्यकता है। धार्मिक समारोहों के साथ-साथ, मंदिर आम लोगों के लिए कई तरह की सेवा भी देता है जिसमें बच्चों को भरतनाट्यम नृत्य सिखाना भी है। हम जब भी बेंगलुरु में होते हैं, तब प्रतिदिन सूर्योदय के समय इस मंदिर के दर्शन करना और प्रभात वेला में मंदिर परिसर की पवित्र शांति में बैठकर आनंद का अनुभव करना हमारी दिनचर्या में सम्मिलित होता है। मेरे साथ इस मंदिर के दिव्य अनुभव जुड़े हैं। आप जब भी बेंगलुरु जाएँ तो इस मंदिर के दर्शन अवश्य कीजिए।

                                    

                                      

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