संवाद संस्कृति: बच्चों को गलत निर्णय लेने से रोक सकती है
हाल ही में दिल्ली के एक 16 वर्षीय किशोर द्वारा आत्महत्या की दुखद घटना समाज में संवादहीनता की बढ़ती समस्या की ओर गंभीर संकेत देती है। यदि शिक्षक, माता-पिता या परिवार के सदस्य बच्चों की बातों को धैर्यपूर्वक सुनें और संवाद का खुला वातावरण बनाएं, तो ऐसी अनेक घटनाओं को रोकना संभव है। बाल मनोविज्ञान स्पष्ट रूप से बताता है कि बच्चों की भावनाओं, दुविधाओं और आंतरिक संघर्षों को समझने के लिए संवाद संस्कृति अत्यंत आवश्यक है।
बच्चे अत्यंत संवेदनशील होते हैं। वे अनेक अच्छे-बुरे अनुभव चाहकर भी अक्सर अभिव्यक्त नहीं कर पाते। भय, संकोच या डांट की आशंका के कारण वे अपने मन की बात छुपा लेते हैं। ऐसे में परिवार और शिक्षक की जिम्मेदारी है कि वे बच्चों के लिए ऐसा वातावरण तैयार करें, जहाँ वे बिना डर, झिझक या मूल्यांकन की चिंता के अपनी समस्या, गलती, पीड़ा या अनुभव स्वतंत्र रूप से साझा कर सकें।
ध्यान रखने योग्य बात है कि बच्चे ‘उपदेश’ से कम और ‘पर्यावरण’ से अधिक सीखते हैं। यदि घर में संवाद को एक नियमित आदत के रूप में अपनाया जाए, परिवार के सदस्य एक-दूसरे की बात ध्यानपूर्वक सुनें, तो बच्चे स्वाभाविक रूप से अपना सुख-दुख आगे बढ़कर साझा करने लगते हैं। घर में प्रतिदिन 10–15 मिनट का “फैमिली-टाइम” बच्चों में विश्वास, सुरक्षा और आत्मीयता की भावना विकसित करने में अत्यंत प्रभावी हो सकता है।
जब बच्चा कुछ बताता है, तो तुरंत प्रतिक्रियाएँ देना, जैसे “तुमने ही किया होगा”, “यह तो गलत है”, “ऐसा क्यों किया?” - उसके आत्मविश्वास पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है। बेहतर है कि बच्चों को धैर्यपूर्वक अपनी बात पूरी करने दें। इससे उनमें निष्पक्ष संवाद, भरोसा और खुलापन बढ़ता है। जो बड़े हैं, मार्गदर्शक की भूमिका में हैं, उन्हें ‘पहले सहानुभूति, फिर सलाह’ के सिद्धांत पर चलना चाहिए। सामान्यतः भावनात्मक समर्थन के बाद दिया गया मार्गदर्शन अधिक प्रभावी और स्वीकार्य होता है। इससे बच्चा सच बोलने में सहजता महसूस करता है और परिवार पर उसका भरोसा मजबूत होता है। बच्चों की निजता का सम्मान अत्यंत महत्वपूर्ण है। बच्चा जो भी व्यक्तिगत बात साझा करता है, उसे परिवारजनों, रिश्तेदारों या दोस्तों के बीच चर्चा या मजाक का विषय न बनाएं। बच्चे की बातों की गोपनीयता बनाए रखना ही विश्वास की वास्तविक नींव है। जब बच्चा देखता है कि उसकी निजी भावनाएँ सुरक्षित हैं, तो वह आगे भी परिवार के साथ खुलकर संवाद करना सीखता है।
सिर्फ गलतियों पर ध्यान देने से संवाद कमजोर होता है; इसलिए आवश्यक है कि ईमानदारी, साहस, प्रयास, मित्रता, सत्य बोलने जैसी सकारात्मक बातों पर तुरंत प्रशंसा दी जाए। सराहना बच्चे की आत्म छवि को मजबूत बनाती है और भविष्य में भी संवाद के लिए प्रेरित करती है।
आज के डिजिटल युग में संवाद की आवश्यकता और बढ़ गई है, क्योंकि मोबाइल, इंटरनेट, सोशल मीडिया और डिजिटल गैजेट्स बच्चों के जीवन में गहराई से प्रवेश कर चुके हैं। माता-पिता को सहज शैली में समय-समय पर पूछना चाहिए- “क्या ऑनलाइन कुछ उलझन भरा देखा?”, “किसी का बुरा बोलना या मैसेज परेशान करता है क्या?”, “स्कूल में किसी दोस्त या शिक्षक ने कुछ ऐसा कहा जो तुम्हें अच्छा या बुरा लगा हो?” ऐसे सौम्य प्रश्न बच्चों को बाहरी दुनिया के सकारात्मक और नकारात्मक दोनों पहलुओं को साझा करने के लिए प्रेरित करते हैं। वस्तुतः संवाद एक ऐसा पुल (ब्रिज) है जो माता-पिता और बच्चों के बीच प्रेम, सुरक्षा, भरोसा और पारदर्शिता को मजबूत करता है। जब हर बच्चा यह विश्वास पूर्वक कह सके- “मम्मी-पापा, मुझे आपसे एक जरूरी बात करनी है…” - तब समझिए कि संवाद संस्कृति ने अपनी भूमिका सफलतापूर्वक निभा दी है।
अतः आत्महत्या जैसी गंभीर समस्याओं की रोकथाम में परिवार, शिक्षक और मित्रों के बीच विकसित संवाद-संस्कृति सबसे बड़ा, सबसे प्रभावी और सबसे मानवीय अस्त्र है।

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