रुक्मिणी मंदिर, द्वारका (गुजरात) में स्थित एक अत्यंत प्राचीन और पवित्र मंदिर है, जो भगवान श्रीकृष्ण की पत्नी माता रुक्मिणी को समर्पित है।
माना जाता है कि यह मंदिर लगभग 12वीं शताब्दी का है। शिखर शैली (नागर शैली) में निर्मित यह मंदिर प्राचीन भारतीय वास्तुकला का सुंदर उदाहरण है। यह एक बेहद खूबसूरत नक्काशीदार मंदिर है, जिसके बाहरी हिस्से में देवी-देवताओं की मूर्तियां उकेरी गई हैं और गर्भगृह में रुक्मिणी की मुख्य प्रतिमा स्थापित है। मीनार के आधार पर बने पैनलों में नरथारों (मानव आकृतियां) और गजथारों (हाथी) की नक्काशी की गई है।
मंदिर के गर्भगृह में देवी रुक्मिणी की संगमरमर की एक सुंदर प्रतिमा है, जिनके चार हाथों में शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण किए हुए हैं। मंदिर की देवी को "राज राजेश्वरी" के रूप में पूजा जाता है।
कहा जाता है कि ऋषि दुर्वासा के अनुरोध पर, कृष्ण और रुक्मिणी एक रथ खींचकर ऋषि दुर्वासा को अपने घर भोजन के लिए ले जा रहे थे। रास्ते में, जब रुक्मिणी जी ने प्यास बुझाने के लिए पानी मांगा, तो भगवान कृष्ण ने अपने पैर के अंगूठे से जमीन को कुरेदकर गंगाजल निकाला और उन्हें पीने को दिया। रुक्मिणी ने गंगाजल से अपनी प्यास बुझाई। माता ने पहले पानी पी लिया और ऋषि को नहीं पूछा तो ऋषि दुर्वासा को अपमानित महसूस हुआ क्योंकि रुक्मिणी ने पहले उन्हें पानी नहीं पिलाया। इसलिए उन्होंने रुक्मिणी को श्राप दिया कि वह अपने पति से अलग रहेंगी और द्वारका में पानी कभी मीठा नहीं होगा। दुर्वासा के श्राप के कारण रुक्मिणी और कृष्ण 12 वर्षों तक अलग रहे। रुक्मिणी ने अपना समय रुक्मिणी देवी मंदिर के इसी स्थान पर ध्यान में बिताया।
इस श्राप के कारण आज भी द्वारका का पानी खारा ही है और जिस जगह पर भगवान ने धरती से पानी निकाला था वहां कुएं का पानी मीठा है जो मंदिर में प्रसाद के रूप में आता है। इसलिए यह मंदिर जलदान (जल अर्पण) की प्रथा के लिए भी जाना जाता है, जिसमें भक्तों से मंदिर में जल दान करने का अनुरोध किया जाता है।
द्वारका की यात्रा तभी पूरी मानी जाती है जब आप द्वारकेश्वरी रुक्मिणी महारानी मंदिर के दर्शन कर लेते हैं।

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