
एक दिन भगवान श्रीकृष्ण की आठों रानियाँ—रुक्मिणी, जाम्बवती, सत्यभामा, कालिंदी, मित्रविंदा, सत्या, भद्रा और लक्ष्मणा—सभी ने राधा से जिज्ञासा की:
"राधा, कृष्ण से विवाह तो हमारा हुआ, लेकिन सदा उनका नाम तुम्हारे साथ ही क्यों जुड़ा रहता है?"
राधा मुस्कुराईं और बोलीं,
"यही मेरी प्रेम-साधना का फल है।"
रुक्मिणी ने कहा,
"प्रेम तो हमने भी किया है, लेकिन भारतीय संस्कृति में पत्नी को ही स्थान मिलता है, न कि प्रेमिका को। तुम तो केवल कृष्ण की प्रेमिका रही हो।"
राधा शांत स्वर में बोलीं,
"आप सबने विवाह करके कृष्ण से देह से संबंध जोड़ा, मैंने बिना विवाह आत्मा से जुड़ाव पाया।"
जाम्बवती ने पूछा,
"पर तुम तो जीवनभर वियोग में ही रहीं। कृष्ण को पा तो नहीं सकीं। इसे कैसे प्रेम की पराकाष्ठा कहा जाए?"
राधा का उत्तर था,
"मेरे लिए उन्हें पाना आवश्यक नहीं था, उनके होने का अनुभव ही मेरा सत्य था।"
कालिंदी ने पूछा,
"तो तुम्हारे प्रेम को क्या नाम दें?"
राधा ने उत्तर दिया,
"मेरा प्रेम है — समर्पण। पूर्ण समर्पण।"
मित्रविंदा बोलीं,
"लेकिन तुम्हें क्या मिला इस प्रेम में? जीवनभर एक परित्यक्ता की तरह रहीं।"
राधा मुस्कुराईं,
"जब कृष्ण ब्रज छोड़ने लगे थे, मैंने उनसे पूछा था — क्या हमारा विवाह नहीं होगा?
तो उन्होंने कहा — विवाह दो भिन्न आत्माओं का होता है, हम तो एक ही हैं। फिर विवाह कैसा?"
सत्या ने पूछा,
"मतलब, तुम स्वयं कृष्ण हो?"
राधा का उत्तर था,
"हां, मैं कृष्णमयी हो चुकी हूं। मेरे तन-मन, हृदय और आत्मा में बस कृष्ण ही कृष्ण हैं।"
भद्रा बोलीं,
"ये रिश्ता हमारी समझ से परे है।"
राधा ने उत्तर दिया,
"यह संबंध समझ से नहीं, अनुभूति से जाना जाता है। सांसें कृष्ण लेते हैं, एहसास मुझे होता है। मैं सोचती हूं, और वो बिना कहे समझ जाते हैं। दर्पण में मुझे उनकी छवि दिखती है, गीतों में उनकी रागिनी सुनाई देती है — यही है एकत्व।"
राधा की गहराई से भरी वाणी सुनकर आठों रानियाँ स्तब्ध रह गईं। उनके हृदय से निकला:
"राधा, तुम्हारा प्रेम धन्य है। तुम्हारी साधना को हमारा प्रणाम!"
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