Bhartiya Parmapara

पीयूष की कहानी: घर, ऑफिस और रिश्तों का सच्चा एहसास

ऑफिस से आते ही पीयूष माधुरी पर झुंझलाने लगा — 
“दिन भर क्या करती रहती हो? खुद कोई काम नहीं कर सकती? ऑफिस से आते ही शुरू हो जाती हो!”

आख़िर तंग आकर माधुरी बोली — 
“अब तुम ही संभालो, तब समझ में आएगा कि घर में कितना काम होता है!”

“हाँ, मैं संभाल लूँगा, मेरी बेटी कहीं नहीं जाएगी,” पीयूष ने कहा। 
ऑफिस से लौटते ही घर का काम, फिर चीना की देखभाल — सब कुछ एक साथ।

“पापा, चोटी कर दो,” चीना ने कहा। 
“चीना बेटा, आज पोनीटेल बाँध लो,” पीयूष बोला। 
“मैडम डाँटती हैं, कहती हैं — चोटी बाँधकर आओ,” चीना रुआँसी हो गई।

“कल सुबह नाई से बाल कटवा दूँगा, रोज़-रोज़ का झंझट खत्म,” पीयूष बोला। 
चीना भुनभुनाई — “मैं नहीं कटवाऊँगी अपने बाल! पापा, कितनी मेहनत से तो बड़े किए हैं।”

पीयूष परेशान था — ऑफिस जाए या घर संभाले? 
घड़ी पर नज़र डाली — ऑफिस का समय हो गया था, पर टिफ़िन अभी तक नहीं आया था। 
वो सोच ही रहा था कि तभी डोरबेल बजी।

“चीना, कौन है?” “पापा, टिफ़िन वाले अंकल हैं।”

तब तक पीयूष भी वहाँ पहुँच गया। 
“कितने बजे हैं? घड़ी देखो! इससे अच्छा तो बंद ही कर दो, तुम्हारी वजह से ऑफिस देर हो जाती है।” 
टिफ़िनवाला बोला — “साब, गैस सिलेंडर खत्म हो गया था।” 
“इसमें मेरी क्या गलती?” पीयूष झल्लाया। 
“साब, सुनिए तो…” 
“क्या सुनूँ? अगर समय पर नहीं ला सकते तो बंद कर दो!”


जल्दी से चीना का टिफ़िन लगाया और उसे स्कूल छोड़कर ऑफिस पहुँचा। 
थोड़ी देर बाद चपरासी आया — “पीयूष सर, बड़े साब बुला रहे हैं।” “आता हूँ,” पीयूष बोला।

“साब, नमस्ते,” उसने विनम्रता से कहा। 
“देखो पीयूष, यह रोज़-रोज़ लेट आना ठीक नहीं है। बेटी की कुछ व्यवस्था करो, उसे होस्टल में रख दो,” बड़े साब बोले। “यस सर।” “अब मुझे टोकना न पड़े।” “यस सर।”

शाम को ऑफिस से लौटा तो देखा, चीना चादर ओढ़े लेटी है। 
“क्या हुआ बेटा?” “पापा, पेट दर्द कर रहा है,” चीना डरते हुए बोली। 
“चलो, डॉक्टर को दिखा देता हूँ,” पीयूष बोला।

क्लिनिक में बैठा वह अतीत में खो गया — मन भारी हो गया। “पापा, चलो,” चीना ने कहा। 
डॉक्टर से पूछा — “क्या हुआ डॉक्टर?” 
“कुछ नहीं, यह नेचुरल है, प्रकृति का नियम है। डरने की कोई बात नहीं है। मैंने बेटी को सब समझा दिया है,” डॉक्टर बोला।

पीयूष को जिसका डर था, वही हुआ। 
चीना बताती भी कैसे? बीच में बेटी और पिता की मर्यादा थी।

उसके मन में एक अजीब-सी खुशी भी थी — बेटी बड़ी हो गई! 
सोचने लगा, “माधुरी होती तो मिलकर खुश होते हम दोनों…”

अब समझ आया — पत्नी का महत्व क्या होता है। 
मन में बड़ी उलझन थी। पत्नी से हर बात कह सकता था, अब वही बातें भीतर घुट रही थीं। 
उसे अपनी गलती का अहसास हुआ — ऑफिस के तनाव का गुस्सा पत्नी पर निकालना, हर बात पर झुँझलाना — सब व्यर्थ था।

पीयूष ने मन ही मन निर्णय लिया — वह घर जाकर माँ और माधुरी, दोनों को वापस लाएगा। 
आज वही पीयूष समुद्र की तरह शांत था — न कोई लहर, न कोई ज्वार।

                                              

                                                

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