समाज का सबसे गहरा संकट तब जन्म लेता है, जब उसकी सबसे मूल इकाई - परिवार अपने ध्येय और दायित्व को विस्मृत करने लगती है। आज यह स्थिति हमें समाज में दृष्टिगोचर हो रही है। भारतीय जीवन-दृष्टि में परिवार केवल एक सामाजिक संरचना मात्र नहीं है, वरन् वह एक जीवंत, स्पन्दनशील और आध्यात्मिक संस्था के रूप में स्थापित रहा है। पर आज जिस गति से परिवार की धुरी अपने अक्ष से डिग रही है, वह केवल सामाजिक संकट नहीं, सांस्कृतिक अवसाद है।
आधुनिकता की आंधी ने जहाँ अधिकारों और स्वतंत्रता की भाषा को स्वर दिया, वहीं उत्तरदायित्व और सह-अस्तित्व जैसे मौलिक तत्व चुपचाप नेपथ्य में चले गए हैं। इस विस्थापन का सर्वाधिक मार्मिक प्रभाव उस पीढ़ी पर पड़ा है जिसने परिवार की अवधारणा को निष्ठा, समर्पण और परंपरा से सींचा है।
पहले बेटे का विवाह घर में उत्सव का वातावरण रच देता था- माता पिता के मन में नई आशा और सुरक्षित भविष्य की रोशनी भर देता था। अब स्थितियां तेजी से बदल रही हैं। आज पुत्र का विवाह माता पिता के मन में आशंका, भय और असुरक्षा भाव लेकर आता है। कई माता-पिताओं के लिए तो अघोषित संकटकाल तक बन जाता है। यह बदलाव केवल माता-पिता की स्थिति में ही नहीं आया है बेटा भी उतना ही प्रभावित हुआ है।
विवाहोपरांत जब बेटा पत्नी के साथ एक स्वतंत्र इकाई के रूप में खड़ा होता है, तो यह स्वाभाविक सामाजिक विकास प्रतीत होता है। किंतु जब उस इकाई के घेरे उसके लिए अपने मूल परिवार के प्रति एक उदासीनता, संकोच या परोक्ष अपराधबोध का कारण बनने लगते हैं, तो यह एक गहरे आंतरिक द्वंद्व का संकेत बन जाता है।
यह द्वंद्व अकेले बेटे का या अकेले माता पिता का नहीं होता, दोनों ही इसमें पिसते हैं। पुत्र एक ओर तो अपने जीवनसाथी की अपेक्षाओं और ससुराल पक्ष की अघोषित निगरानी के नीचे होता है और दूसरी तरफ माता-पिता की मौन आकांक्षाओं और स्नेह की स्मृतियों से जकड़ा होता है। इस दोहरे संघर्ष में फंसा उसका मन असमर्थता को चुप्पी में ढाल लेता है, और वह चुप्पी धीरे-धीरे रिश्तों के दरवाज़े बंद कर देती है। कई प्रकरण में हमने इसे आत्महत्या बनते भी देखा है।
माता-पिता अपना बेटा सुखी रहे और सामाजिक प्रतिष्ठा बनी रहे के भाव से चालित बहू से मिलने वाली अवमानना और उपेक्षा का कड़वा घूंट पीकर जीने की विवशता को स्वीकार कर लेते हैं। तनाव और दुःख के कारण अनेक बीमारियों से ग्रस्त भी हो जाते हैं, पर किसी से कुछ कहते नहीं।
इसी तारतम्य में हम यदि आज के विधिक परिदृश्य को देखते हैं तो वह पूरी लड़की के पक्ष में है तथा पुरुष और उसके परिवार के लिए उत्पीड़न के जोखिम से भरा है। जिस समाज ने वर्षों तक स्त्री को दबाया था, वही समाज अब क्षतिपूर्ति की ऐसी प्रवृत्तियों में उलझ गया है। वह पुनर्संतुलन की जगह एक नया असंतुलन जन्म दे चुका है। यह भय कि कोई भी बात शिकायत बन सकती है, और कोई भी मतभेद अपराध की श्रेणी में आ सकता है - यह एक मनोवैज्ञानिक असुरक्षा का भयावह संकेत बन गया है। इससे न केवल रिश्तों में संदेह आया है, बल्कि परिवार की सहजता, संवाद और आपसी विश्वास का क्षरण हो रहा है।
लड़की के माता-पिता जब अपनी बेटी के विवाहित जीवन में निरंतर उपस्थिति बनाए रखते हैं, तो यह ‘संरक्षण’ के नाम पर एक गुप्त आक्रामकता का रूप ले लेता है। यह आक्रामकता बेटी को तो यह विश्वास देती है कि वह सही है, भले ही उसकी दृष्टि कितनी ही सीमित, विकृत या स्वार्थ ग्रस्त हो। इसके विपरीत यह भाव लड़के के आत्मविश्वास को भीतर ही भीतर क्षीण करता है। धीरे-धीरे वह एक आत्म-संदेह की स्थिति में पहुँचता है - जहाँ न वह अपने निर्णयों पर भरोसा कर पाता है, न अपनी भावनाओं पर। यह आत्म-संदेह, मनोवैज्ञानिक रूप से एक व्यक्ति को निष्क्रिय, तनावग्रस्त और अवसादग्रस्त बनाता है। इन स्थितियों का सबसे गहरा, आघात होता है उन पर जिन्हें हमने 'वरिष्ठ नागरिक' कहकर सम्मानित तो किया, पर व्यावहारिक जीवन में उन्हें जीवन की देहरी पर अकेला छोड़ दिया।
वृद्धावस्था, जो भारतीय परंपरा में अनुभव, आशीर्वाद और मार्गदर्शन का काल था, आज एक मौन निर्वासन में परिवर्तित हो गया है। जिन्होंने अपने जीवन के सबसे अच्छे वर्ष संतान की परवरिश में लगाए, वे अब दरकिनार कर दिए गए हैं - ना शिकायत कर सकते हैं, ना समीप आ सकते हैं। उनकी पीड़ा एक ‘अस्वीकृत प्रेम’ की तरह है - यह उन्हें भीतर से तोड़ देती है। कई वृद्ध इस अस्वीकार्यता को मनोवैज्ञानिक अपमान की तरह झेलते हैं। वे अपने को आत्मसम्मान हीन और अस्तित्वहीन मानने लगते हैं। कुछ के लिए यह दुःख इतना तीव्र होता है कि वे जीवन से मुँह मोड़ने को विवश हो जाते हैं।
यह स्थिति केवल परिवारों के लिए ही नहीं, पूरे समाज के भावात्मक ढाँचे के विघटन की ओर संकेत है। हमारे यहां परिवार वह स्थान होता था जहाँ व्यक्ति स्वयं को बिना शर्त स्वीकृत पाता था, और आज वही स्थान भय, संकोच, अस्वीकार और संघर्ष की भूमि बन गया है—तो यह मात्र सामाजिक संकट नहीं, एक गहरा मनोवैज्ञानिक शून्य है। इस शून्य को अधिकारों से नहीं, केवल उत्तरदायित्व की पुनर्स्थापना से भरा जा सकता है।
आज जरूरत इस बात की नहीं कि हम स्त्री-पुरुष के अधिकारों का तुलनात्मक विश्लेषण करें, बल्कि इस बात की है कि हम संबंधों की भाषा को पुनः मानव केंद्रित, भावना केंद्रित और दायित्व-केंद्रित बनाएँ।
वरना आने वाले समय में परिवार केवल एक सामाजिक ढांचा मात्र रह जाएगा, जिसमें न ऊष्मा होगी, न आत्मीयता—सिर्फ एक अनाम विधिक समझौता, जो भीतर से सबको संवेदनहीन और खोखला बना देगा।

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