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चैत्र नवसंवत्सर 2025 का महत्व और उत्सव

प्रकृति, भारतीयता एवं वैज्ञनिकिता से जुड़े है नवसंवत्सर

नवसंवत्सर का जुड़ाव हमारी प्रकृति से है, सृष्टि से है, ऋतुओं से है, जीवों से है, जीवमण्डल से है और धरती से है। ऋतु परिवर्तन प्रकृति का चक्र है। ऋतु का अर्थ है, जो सदा चलता रहे। यह लय और गति हमें संदेश देती है कि वर्षभर नए नूतन परिवर्तन की ओर सतत अग्रसर रहें। गति का जीवन से अटूट संबंध होता है। यह गति जहाँ ऋतु से जुड़ी है, वहीं ऋतु का अभिन्न जुड़ाव नवसंवत्सर से है।

पौराणिक है संवत्सर की अवधारणा - 


पौराणिक उल्लेखों के अनुसार -  सर्वर्तुपरितस्तु स्मृतः संवत्सरौ बुधै।  
(किसी ऋतु से प्रारंभ करके ठीक उसी ऋतु के पुनः आने तक जितना समय लगता है, वह संवत्सर कहलाता है।)

यह संवत्सर एकप्रकार से पूरा वर्ष है और इसमें 'नव' शब्द जुड़ने से नवसंवत्सर हो जा ता है। यह सृष्टि की वर्षगांठ का नववर्ष है, इसका वर्णन यजुर्वेद के 27 वें तथा 30 वें अध्याय के मंत्र  क्रमांक 47 और 15 में अंकित है।  

भारतीय संस्कृति में हिंदू नववर्ष का शुभारंभ चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से माना गया है। पौराणिक आख्यानों के अनुसार इस तिथि को ब्रह्मा जी ने सृष्टि - सर्जना आरंभ की थी। इसकी पुष्टि ब्रह्म पुराण के निम्नलिखित श्लोक से होती है -   
चैत्र मासि जगद् ब्रह्मा ससर्ज प्रथमोहनि।   
शुक्ल पक्षे समग्रे तु सदा सूर्योदये सति।।   
अर्थात चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से तिथि के सूर्योदय से ब्रह्माजी ने सृष्टि का निर्माण का कार्य आरंभ किया था। इसी दिन सूर्य देव का उदय हुआ था तथा इसी दिन भगवान राम ने बालि का वध किया था। इसी दिन भगवान राम का राज्याभिषेक हुआ था।

धर्मग्रंथों में इसे 'नवसंवत्सरोत्सव' के रूप में  मनाए जाने का विधान है। कालपुरुष के सभी अवयवों के साथ इस दिन मुख्य रूप से स्रष्टा ब्रह्माजी के पूजन का विधान है। अथर्ववेद में उल्लेख के अनुसार वैदिककाल से इसे एक महापर्व के रूप में मनाया जाता रहा है। इससे इसकी प्राचीनता एवं भव्यता का पता चलता है। एक पौराणिक आख्यान के अनुसार सृष्टि निर्माण के समय सर्वप्रथम भगवान विष्णु ने अवतार लिया था और वह उनका मत्स्यावतार था, जो जल में हुआ था। यह कथानक जल की महत्ता को दर्शाता है, इसकी पुष्टि वैज्ञानिकों द्वारा भी की गई है कि सृष्टि का पहले जीव का उद्भव जल में हुआ था।  

नवसंवत्सर हिंदू-धर्म-दर्शन पर आधारित महोत्सव है। हमारे धर्म में ब्रह्माजी सृष्टि के रचयिता हैं, विष्णु पालनहार हैं और शिव संहारक देव हैं। यह वर्गीकरण कितना वैज्ञानिक है। सृष्टि आवश्यक है, उसका पालन-पोषण भी आवश्यक है और नव- नूतन-सृजन के लिए प्राणी की आयुपूर्ति पर संहार भी आवश्यक है। यह परिवर्तन क्रम सृष्टि का नियम है, जो कि शाश्वत है। नवसंवत इसी कालक्रम का सूचक है।



       

 

नवसंवत का ऐतिहासिक महत्व - 


नवसंवत से जुड़े एक प्राचीन अध्याय के अनुसार महाकाल (शिव) की नगरी अवंतिका (उज्जैन) के सम्राट विक्रमादित्य ने विदेशी आक्रांता शकों पर विजय प्राप्त की थी। इस स्मृति को चिरस्थायी बनाने के लिए, चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से विक्रमीय संवत का प्रवर्तन किया था। उत्तर भारत में इसी दिन वासंतिक नवरात्र  प्रारंभ होता है तथा लोग माँ आदिशक्ति की घटस्थापना कर नौ दिन पूजा-अर्चना करते हैं और घर वालों की सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। इसी दिवस स्वामी दयानंद ने आर्य समाज की स्थापना की थी।  गणितज्ञ भास्कराचार्य जी ने इसी दिन सूर्योदय से सूर्यास्त तक दिन, मास और वर्ष की गणना करते हुए पंचांग की रचना की। द्वापर में धर्मराज युधिष्ठिर का राज्याभिषेक दिवस होने के अतिरिक्त कलयुग के प्रथम सम्राट परीक्षित के सिंहासनारूढ़ होने का दिवस भी यही है।   
       
इस दिवस का उल्लास महापर्व के रूप में  देश के सभी भागों में देखने को मिलता है।, भले ही पर्व के नाम अलग-अलग हों। इस दिवस को महाराष्ट्र में 'गुड़ी पड़वा', कर्नाटक में 'युगादि', आंध्र प्रदेश में 'उगादी', गोवा- केरल में संवत्सर, कश्मीर में 'नवरेह', मणिपुर में 'सजिबु नोंगमा पानबा' तथा सिंधु प्रांत में भगवान झूलेलाल के अवतरण दिवस के रूप में 'चेती चंद्र' (चैत्र का चंद्र) नाम से मनाया जाता है।



       

 

नवसंवत्सर का प्रकृति से है गहरा संबंध - 


चंद्र संवत्सर का शुभारंभ चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से होता है। ऋग्वेद में ऋतुओं का निर्माता चंद्रमा को माना गया है। चैत्र का चंद्र संवत्सर अगले वर्ष के चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या तक चलता है। इस प्रकार यह कालचक्र अनवरत चलता रहता है, जो हमें प्रकृति से जोड़े रखता है और जीवन के तत्त्वों से परिचित करवाता है। नवसंवत्सर का हमारी प्रकृति से गहरा संबंध है।

वसंत ऋतु को “ऋतुराज” कहा जाता है, जिसमें नवसं-वत्सर का प्रारंभ होता है। यह समय शीतकाल की शीतलता और ग्रीष्मकाल की ऊष्णता का मध्य विंदु होता है। इसकारण जलवायु समशीतोष्ण होती है। यही समय है, जब फसलें पककर तैयार रहती हैं और कृषक को अपने परिश्रम का परिणाम प्रत्यक्ष देखकर अपार प्रसन्नता होती है। वातावरण उल्लास और उमंग से भर उठता है और जन - मन नववर्ष का पर्व मनाने को उत्सुक हो उठता है। नवसंवत के आधार पर पंचांग तैयार किया जाता है। लोग इससे शुभ मुहूर्तों की जानकारी प्राप्त करते हैं और नए शुभ कर्म पूर्ण करते हैं।  



       

 


      
दो कैलेंडर के रूप में प्रचलित है भारतीय नववर्ष -

 हिंदी नववर्ष, जिसे प्रायः हिंदू नववर्ष या भारतीय नववर्ष भी कहा जाता है, दो कैलेंडर के रूप में प्रचलित है। एक है शक संवत और दूसरा विक्रम संवत। दोनों में वर्ष का शुभारंभ एक ही दिन, एक ही महीने में होती है, चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से। शक संवत कैलेंडर, ग्रेगेरियन कैलेंडर से लगभग 78 वर्ष नया है और विक्रमी संवत कैलेंडर, ग्रेगेरियन कैलेंडर से 57 वर्ष पुराना है।

धूमधाम से मनाएँ भारतीय नववर्ष - 


अँग्रेजी नववर्ष 2024 को 31 दिसंबर 2023 की रात को या 1 जनवरी 2024 को हम मना चुके हैं, किंतु हमें अपना हिंदू नववर्ष या भारतीय नववर्ष बड़ी धूमधाम से मनाना चाहिए, जो 9 अप्रैल 2024 अर्थात चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से प्रारंभ हो रहा है। यह विक्रम संवत 2081 होगा।

पश्चिमी सभ्यता के अंधानुकरण में फँसे हम आँग्ल नववर्ष तो अत्यंत हर्षोल्लास से मनाते हैं, यहाँ तक कि असंयम का अतिरेक कर देते हैं, टनों शराब गटागट पी जाते हैं, मित्रों के साथ झूमते, नाचते हैं, गाते हैं, हो-हल्ला मचाते हैं, आतिशबाजी करते हैं, महंगे होटलों में या पर्यटन स्थलों पर पार्टियां करते हैं। इसमें भोंड़े प्रदर्शन के अतिरिक्त कहीं भी भारतीयता या शुभ संस्कारों की झलक नहीं मिलती। यह स्थिति अत्यंत दुर्भाग्य पूर्ण है।

हम अपनी प्राचीन गौरवशाली परंपराओं के साथ भारतीय नववर्ष को भी भूल गए हैं। यह नवसंवत्सर का पर्व हमें भारतीय संस्कृति को पुनः अपनाने के लिए प्रेरित और प्रोत्साहित करता है। अपनी जड़ों की ओर लौटने का यह शुभ अवसर प्रदान करता है। आओ! भारतीय नववर्ष को हम सब मिलजुल कर सादगी और शालीनता से मनाएँ, इसके लिए कुछ इस प्रकार के आयोजन किए जा सकते हैं –   
- घरों की छत पर भगवा ध्वज फहराएँ, घरों को कागज की झंडियों और गुब्बारों से सजाएँ, रंगोली बनाएँ तथा दरवाजे पर वंदनवार लगाएँ।

- प्रातःकाल स्नान कर घरों में देव - पूजन करें। मंदिरों में जाकर पूजा-अर्चना, संकीर्तन एवं धर्मग्रंथों का सामूहिक पाठ करें । सायंकाल घरों में एवं देवस्थलों में दीपक जलाएँ।

- भारतीय गणवेश धारण करें, मस्तक पर तिलक - चंदन लगाएँ तथा कलाई में मौली  - कलाबा बाँधें।

- एक-दूसरे से मिलने पर हाथ जोड़कर नमस्ते करें तथा जय श्रीराम या वंदेमातरम बोलें।

- मोबाइल से वार्ता के पूर्व हैलो कहने के स्थान पर 'हरि ओम' बोलें ।वृद्धजन के चरण स्पर्श करके आशीर्वाद लें तथा छोटों को स्नेह - दुलार करें ।

- वृद्धाश्रम जाकर वृद्धजन से मिलें, उनका हालचाल पूछें तथा मिठाई खिलाएँ। निर्धनों को भोजन कराएँ। गोशालाओं में गायों को चारा दान करें तथा गुड़ खिलाएँ।

- घर और विद्यालयों में बच्चों को नवसंवत्सर से संबंधित कथाओं और महा पुरुषों के चरित्रों से अवगत कराएँ।

- देवस्थलों, पार्कों, विद्यालयों और विशिष्ट स्थानों पर संगोष्ठी, वार्ता, कवि गोष्ठी आदि सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाए। बच्चों के द्वारा साज-सज्जा एवं बाल छवियाँ  प्रस्तुत करने की प्रतियोगिताएं की जाती हैं।

- अपने इष्ट-मित्रों को एक-दूसरे से मिल कर या मोबाइल से मंगलमय नववर्ष की शुभकामना एवं बधाई प्रेषित करें।

- हम सभी दुर्गुणों को त्यागकर सद्गुणों तथा भारतीय संस्कृति को अपनाने का संकल्प लें।

भारतीय नववर्ष भारत के नव राष्ट्रवाद के उदय के आलोक में अत्यंत महत्वपूर्ण एवं प्रासंगिक है। यह पर्व नई ऊर्जा, नई ज्योत्स्ना, नव आराधना, नवशक्ति और नई परिकल्पना का है। यह पावन  हिंदू पर्व है, जिस पर हमें गौरव और गर्व करते हुए 'वसुधा ही कुटुंब है' अवधारणा के अनुसार जीवमण्डल के सभी जीवधारियों के लिए मंगलकामना करनी चाहिए।

स्वामी विवेकानंद ने कहा था - ''यदि हमें गौरव से जीने का भाव जगाना है, अपने अंतर्मन में राष्ट्रभक्ति के बीज को पल्लवित करना है, तो राष्ट्रीय तिथियों का आश्रय लेना होगा। गुलाम बनाए रखने वाले परकीयों की दिनांकों पर आश्रित रहने वाला अपना आत्मगौरव खो बैठता है।''

लेखिका - नमिता वैश्य जी (शिक्षिका), मसकनवा, गोण्डा (उ.प्र.)



       

 

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